क्या अमित शाह की जगह अब शिवराज सिंह लेंगे ?

दिल्ली ब्यूरो: संघ और बीजेपी के भीतर से जो खबरे आ रही है उसके मुताविक मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और बीजेपी के वरिष्ठ नेता शिवराज सिंह बीजेपी के अगले अध्यक्ष हो सकते हैं। माना जा रहा है कि चुनाव से पहले ही शिवराज सिंह को पार्टी अध्यक्ष का पद दिया जा सकता है ताकि पार्टी आगामी चुनाव के लिए पिछड़ी जाति के वोटबैंक को गोलबंद कर सके। संघ भी कुछ यही सोच रहा है। 2019 के बारे में संघ की अपनी ग्राउंड रिपोर्ट भी एक महत्वपूर्ण बात कहती है। संघ के एक प्रचारक बताते हैं, ‘इस वक्त परिवार के अंदर भी मत विभाजन है। अगर पति-पत्नी एक पार्टी को वोट देते हैं तो बेटा-बेटी दूसरी पार्टी को। इसलिए बहुत जरूरी है कि अगले चुनाव से पहले परिवारों को जोड़ने का सूत्र तैयार हो जाए। ऐसे में संघ को लगता है कि अब सिर्फ किसी लहर और हिंदू कार्ड भरोसे रहने से काम नहीं चलेगा। जहां तक हिंदू कार्ड की बात है तो इसे राहुल गांधी अब भाजपा से ज्यादा अच्छे तरीके से चल रहे हैं। वे खुद को जनेऊधारी ब्राह्मण कहने से भी गुरेज नहीं कर रहे हैं। इसलिए संघ एक नई सोशल इंजीनियरिंग के फॉर्मूले को बनाने में जुटा है। राहुल गांधी जनेऊधारी ब्राह्मण हैं तो भाजपा को एक ऐसा नेतृत्व तैयार करना है जो पिछड़ी जाति का हो। नरेंद्र मोदी पिछड़ी जाति के हैं ही और संघ को लगता है कि अगर भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष भी पिछड़ी जाति से हो तो यह रामबाण राम मंदिर से ज्यादा कारगर साबित हो सकता है। इसलिए संघ ने अंदरखाने ही सही शिवराज को अमित शाह की कुर्सी पर बिठाने की बात छेड़ दी है।

अब ज़रा शिवराज सिंह पर नजर डाल लेते हैं। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ के शपथ ग्रहण समारोह में सबसे ज्यादा चर्चा पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की रही। तेरह साल तक मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री बने रहने के बाद जिस अदा के साथ उन्होंने अपनी कुर्सी छोड़ी उसे भाजपा के अंदर और बाहर बेहद पसंद किया गया। शपथ ग्रहण समारोह में जिस आत्मीयता के साथ उन्होंने राहुल गांधी से हाथ मिलाया और कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया का हाथ ऊंचा किया उसकी उम्मीद कांग्रेस के धुरंधर नेताओं तक को नहीं थी। इसलिए शिवराज सिंह चौहान की तारीफ कश्मीर के उमर अब्दुल्ला से लेकर मुंबई के मिलिंद देवड़ा तक सभी ने की।भोपाल में जो हुआ उसका गहरा असर दिल्ली में भी महसूस किया रहा है।

बता दें कि शिवराज सिंह को केंद्र में लाने की चर्चा की धुरी में मूलत: तीन प्रकार के लोग हैं। पहले, संघ के वे नेता और पदाधिकारी जो नरेंद्र मोदी और अमित शाह को सर्वशक्तिमान होने से रोकना चाहते हैं और भाजपा में ‘पावर बैलेंस’ करने की वकालत करते हैं। दूसरे, भाजपा के वे नेता जो लालकृष्ण आडवाणी के करीबी थे और बाद में सुषमा स्वराज को उनकी उत्तराधिकारी मानने लगे। तीसरे, वे पत्रकार जो भाजपा से संबंध रखते हैं या रखना चाहते हैं लेकिन इस वक्त के दिल्ली दरबार में ऐसा संभव नहीं है। संघ से जुड़े एक नेता बताते हैं कि भाजपा की सबसे ताकतवर कमेटी संसदीय बोर्ड में दिल्ली की राजनीति करने वाले नेताओं के अलावा सिर्फ शिवराज सिंह चौहान ही ऐसे हैं जिनका अपना जनाधार है। ऐसे में वे भी खुद को दिल्ली से ज्यादा दूर नहीं रख पाएंगे। एक बात और है। संघ के कुछ बड़े अधिकारी चाहते हैं कि ऐसा नहीं दिखना चाहिए कि भाजपा में सिर्फ दो नेताओं की ही चलती है। इन्हीं नेता ने कुछ पत्रकारों को बताया, ‘भाजपा पूरे देश की पार्टी है सिर्फ गुजरात की नहीं। इसलिए गुजरात से मोदी-शाह के अलावा, मध्य प्रदेश से शिवराज सिंह, उत्तर प्रदेश से राजनाथ सिंह-योगी। आदित्यनाथ, राजस्थान से वसुंधरा राजे जैसे नेताओं की एक कोर टीम दिखनी चाहिए।

उधर ,शिवराज सिंह चौहान भी फिलहाल कमलनाथ की सरकार को गिराने या अस्थिर करने के झंझट में नहीं पड़ना चाहते। उनके करीबी एक अफसर ने भोपाल में कुछ प्रभावशाली लोगों को बताया कि येदियुरप्पा जैसी कोशिश वे नहीं करेंगे क्योंकि उनकी उम्र भले येदियुरप्पा से कम है लेकिन मुख्यमंत्री पद का अनुभव उनसे कहीं ज्यादा है।शिवराज सिंह चौहान के पक्ष में तीन बातें हैं जिनसे उम्मीद बनती है कि वे अगले कुछ महीनों में भाजपा में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। पहली, वे पिछड़ी जाति के लोकप्रिय नेता हैं। नरेंद्र मोदी के अलावा भाजपा के ज्यादातर पिछड़ी जाति के नेता मास लीडर नहीं माने जाते। इसलिए भाजपा में नरेंद्र मोदी- अमित शाह की जोड़ी की जगह संघ मोदी-शिवराज की जोड़ी को फिट करना चाहता है।

दूसरी बात, शिवराज सिंह हिंदी भाषी राज्य के नेता हैं जो भाजपा का कोर वोट बैंक है। अगर शिवराज खुलकर केंद्रीय नेतृत्व में आएंगे तो इसका असर मध्य प्रदेश के अलावा उत्तर प्रदेश से लेकर छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र तक हो सकता है। तीसरी बात यह कि मोदी-शाह की जोड़ी के बारे में संघ को बार-बार यह शिकायत मिलती है कि यह जोड़ी मैनेजमेंट में ‘मास्टर’ है लेकिन अपने हों या विरोधी इनसे मेल-जोल बनाए रखने में ‘डिजास्टर’ हैं। संघ के एक सूत्र बताते हैं कि न चाहते हुए भी भाजपा की छवि एक ऐसी पार्टी की हो गई है जो दो लोगों के इर्द-गिर्द घूम रही है। अगर 2019 से पहले संवादहीनता की यह स्थिति बदली नहीं गई तो इससे बड़ा नुकसान हो सकता है। इसके उलट शिवराज सिंह चौहान की ताकत ही संवाद स्थापित करना है। उन्हें नाराज़ होते हुए लोगों ने देखा ही नहीं। अपने हों या विरोधी, गांव हो या शहर, शिवराज भीड़ में आम बन जाते हैं। आम लोगों से सीधा रिश्ता जोड़ना, बहन-भाई, मामा-भांजा-भांजी जैसे संबंध बोलचाल में ले आना, शिवराज की सबसे बड़ी खासियत है।

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