क्या इस चुनाव में देश से लेफ्ट का सफाया हो जाएगा ?

दिल्ली ब्यूरो: लेफ्ट की राजनीति इस बार क्या होगी इस पर मंथन जारी है। कांग्रेस और बीजेपी के बीच फसी राजनीति में लेफ्ट की राजनीति अब ज्यादा असरदार नहीं दिख रही है। लेफ्ट को लेकर अब इस बात की चर्चा हो रही है कि शायद इस चुनाव में उसकी जमीन शायद ही बच पाए। पिछली बार लेफ्ट मोर्चे को पश्चिम बंगाल में दो सीटें मिली थीं और केरल में सात सीटों पर जीत हासिल हुई थी। केरल की 20 में से 12 सीटें कांग्रेस के मोर्चे ने जीती थीं।

कुल मिला कर 16वीं लोकसभा में समूचे लेफ्ट मोर्चे को सिर्फ नौ सीटें थीं। 2004 का चुनाव लेफ्ट की सफलता का चरम था, जब पूरे देश में मोर्चे को 60 सीटें मिली थीं। उस समय अमेरिका के साथ परमाणु संधि का विरोध करके मनमोहन सिंह सरकार से समर्थन वापस लेना लेफ्ट के लिए आत्मघाती साबित हुआ। 2009 में ही उसकी संख्या आधी रह गई और 2014 में वह दहाई में नहीं पहुंच सकी। इस बार उतनी भी सीटें मिलने में मुश्किल दिख रही है।

पश्चिम बंगाल में सीपीएम ने जो दो सीटें जीती थीं उन पर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं। लाख प्रयास के बावजूद इन सीटों पर कांग्रेस से तालमेल नहीं हो सका। कांग्रेस, सीपीएम, भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के बीच चारकोणीय मुकाबला है और माना जा रहा है कि इस मुकाबले में सीपीएम सबसे कमजोर विकेट पर है। इसी तरह केरल में लेफ्ट को निपटाने के लिए खुद राहुल गांधी चुनाव लड़ने चले गए हैं।

उनके चुनाव लड़ने की वजह से कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूडीएफ मजबूत हुआ है। भाजपा भी हर सीट पर मजबूती से लड़ रही है, जिससे वोटों का बंटवारा तीन हिस्से में हो रहा है। बिहार की बेगूसराय और ओड़िशा की आस्का सीट पर लेफ्ट उम्मीदवार मजबूती से लड़ रहे हैं पर दोनों जगह जीत की गारंटी नहीं है।

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