क्या तेलंगाना में होगा तीसरे मोर्चे का ऐलान ?

अखिलेश अखिल

दक्षिण के सुदूर राज्य तेलंगाना में इन दिनों राष्ट्रीय राजनीति बनती दिख रही है। तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव तीसरे मोर्चे को लेकर कुछ ज्यादा ही गंभीर हैं और वे चाहते हैं गैर बीजेपी और गैर कांग्रेस कोई ऐसा मोर्चा बने जो केंद्र की राजनीति कर सके और बीजेपी-कांग्रेस को दूर रखा जा सके। खबर के मुताबिक़, अप्रैल माह में चंद्रशेखर राव अपनी पार्टी तेलंगाना राष्ट्र समिति का महासम्मलेन करने जा रहे हैं जिसमे सामान विचार वाले सभी राजनीतिक दलों को बुलाया गया है।

इसी महासम्मेलन में तीसरे मोर्चे का ऐलान किया जाएगा। आपको बता दें के चंद्रशेखर राव कुछ उसी तरह से करते दिख रहे हैं जब 1988-89 में टीडीपी नेता अपनी पार्टी के सम्मलेन में सभी गैर कांग्रेसी नेताओं को बुलाया था और तीसरे मोर्चे की शुरुआत की थी। बाद में यह मोर्चा बना भी। जो जानकारी मिल रही है उसके मुताबिक़ के चंद्रशेखर राव अपनी पार्टी का महासम्मेलन 27 अप्रैल को करने वाले हैं और यह भी माना जा रहा है कि इसी दिन तीसरे मोर्चे की घोषणा हो सकती है।

लेकिन इस खेल में कई सवाल भी तैर रहे हैं। पहला सवाल तो यही है कि अगर तीसरा मोर्चा बनता है तो उसका कमान किसके हाथ होगा। यह एक बड़ा सवाल है क्यों कमान के चक्कर में ही देश की राजनीति अटकती भटकती रही है। मोटे तौर अपर अभी तीन नाम सामने आते दिखते हैं। एक नाम तो स्वयं के चंद्रशेखर राव का है। उनकी नजर दिल्ली की कुर्सी पर टिकी हुयी है। वे जरूर चाहेंगे की मोर्चे की कमान उनके हाथ हो। उधर चंद्रबाबू नायडू भी कुछ ऐसा ही सोचेंगे।

अब जब उनके सम्बन्ध बीजेपी से ख़त्म हो गए हैं तो अपनी राजनीति को और मजबूत करने के लिए उन्हें भी किसी के साथ गठबंधन करना जरुरी है। फिर नायडू देश के एक चर्चित राजनीतिक चेहरा भी हैं और राजनीति का लंबा अनुभव भी। जाहिर है कि नायडू चाहेंगे कि संभावित तीसरे मोर्चे की कमान उनके हाथ हों। उधर ममता बनर्जी भी देश की चर्चित राजनीतिक हस्ती हैं। उनके सरोकार भी तमाम राजनीतिक दलों से हैं और पहुँच भी। ऐसे में ममता भी छाएंगी की मोर्चे की कमान वे खुद सम्हालें। लेकिन ममता अभी दुविधा में भी है। वे कांग्रेस को भी छोड़ना नहीं चाहती।

जाहिर है कि मोर्चे की संभावना को देख कर देश की कई क्षेत्रीय पार्टियां इसे साथ लामबंद हो सकती है। और यह एक मजबूत गठबंधन हो सकता है लेकिन यह भी उतना ही सच है कि यूपीए की संभावना को भी इंकार नहीं किया जा सकता। इसके साथ कई बड़े दलों का जुड़ाव है और कांग्रेस से अलग होकर चुनाव लड़ने में कई दलों को भारी नुक्सान भी हो सकता है। ऐसे में लग रहा है कि अगर मोर्चे की बात सफल हो जाती है तो अगले लोक सभा चुनाव में त्रिकोणात्मक लड़ाई शुरू हो जायेगी। दक्षिण के राज्यों की राजनीतिक दलों को हो सकता है कि मोर्चा में रहकर लाभ मिल जाए लेकिन उत्तर भारत में मोर्चा सफल नहीं हो पाएगी। ऐसी हालत में बीजेपी को लाभ होगा और मोर्चा और यूपीए के घमासान में बीजेपी चुनाव जीत जायेगी।

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