क्या धरती पर नहीं रह जाएगा दिन और रात का फर्क?

वॉशिंगटन: दिन और रात, पृथ्वी की दो सबसे भहत्वपूर्ण गतिविधियां हैं। पृथ्वी पर रहने वाले विभिन्न प्राणियों के लिए इनका अलग-अलग महत्व हैं। उल्लेखनीय है कि मौजूदा समय में धरती पर दिन और रात का अंतर कम होता जा रहा है। एक ताजा शोध में पता चला है कि धरती के सबसे ज्यादा आबादी वाले इलाकों में रातें खत्म होती जा रही हैं। इसका कारण है लगातार बढ़ रही कृतिम रोशनी। इसके मानव व अन्य जीवों के शरीर पर बेहद खतरनाक नतीजे सामने आए हैं।

साइंस एडवांसेज नाम की पत्रिका में छपे इस शोध के अनुसार पिछले कुछ सालों में धरती पर आर्टिफिशल रोशनी काफी बढ़ गई है। रिपोर्ट की मानें तो सन 2012 से सन 2016 के बीच हर साल धरती पर आर्टिफिशल लाइटों से जगमग होने वाले इलाकों में 2.2 प्रतिशत की दर से इजाफा हो रहा है। क्रिस्टोफर काएबा नाम के वैज्ञानिक की टीम द्वारा किए गए इस शोध में टीम ने सैटेलाइट की मदद से रात के वक्त धरती पर बल्ब, ट्यूबलाइट जैसे चीजों से विभिन्न इलाकों में होने वाली रौशनी को मापा। इसके बाद उन्होंने पाया कि चार सालों के भीतर (2012-2016) धरती के ज्यादातर इलाके रात के समय अधिक जगमगाते हैं और ये हर साल 2.2 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है।

इस शोध के नतीजों में ऐसा देखा गया है कि रात के समय रौशनी में हो रहा इजाफा मध्य पूर्वी देशों और एशिया में ज्यादा है। शोध के अनुसार ये प्रक्रिया हर साल और बढ़ती जाएगी जिसके चलते धरती के उन इलाकों पर बुरा असर पड़ेगा जहां प्राकृतिक रूप से दिन और रात की रौशनी में फर्क देखने को मिलता है। शोध से जुड़े वैज्ञानिक किप हॉजिस का कहना है कि इस प्रक्रिया से हम इस नीले ग्रह पर होने वाली रात जैसी गतिविधि को ही खोते जा रहे हैं।

वैज्ञानिकों का नया खुलासा: मंगल पर जीवन है कि नहीं? इस रिसर्च में वैज्ञानिकों ने ऐसा पाया है कि पिछले कुछ सालों में भारत समेत दुनिया बाकी देशों में एलईडी लाइट की बिक्री में भारी इजाफा हुआ है। हालांकि एलईडी लाइटें आम बल्ब, सीएफएल और ट्यूबलाइट के मुकाबले कम बिजली की खपत करती हैं। यानि एक 20 वॉट का एलईडी बल्ब 100 वॉट की दूसरे लाइटों के बराबर होता है और उनके मुकाबले उसकी 10 से 20 गुना ज्यादा लाइफ भी होती है। लेकिन वैज्ञानिकों ने कहा कि सस्ती होने के कारण लोग ज्यादा मात्रा में एलईडी लाइटें खरीद रहे हैं।

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