क्या नोटबंदी महज एक तुगलकी फरमान था ?

दिल्ली ब्यूरो: नोटबंदी के 15 महीने बीत चुके हैं। सरकार की तरफ से खबर मिल रही है कि नोटबंदी के दौरान 500 और 1000 के नोट जो बैंकों में जमा हुए थे ,आज तक उसकी गिनती चल रही है। यह गिनती कब तक चलती रहेगी किसी को पता नहीं। इधर कुछ महीने यह भी सरकारी खबर ही सामने आयी कि नोटबंदी के दौरान जितने नोट जमा हुये थे उससे ज्यादा की रकम अर्थव्यवस्था में आ गयी है। ऐसे सवाल उठता है कि आखिर नोटबंदी के अभिप्राय क्या थे?

इससे जुड़े सवाल यह भी उठते हैं कि क्या सरकार ने बिना किसी से कोई विचार किये ही नोटबंदी का ऐलान कर दिया था। जो तथ्य सामने आ रहे है उससे तो यही लगता है कि नोटबंदी तुगलकी फरमान से ज्यादा कुछ भी नहीं थी। आपको बता दें कि नोटबंदी करने के पीछे पीएम मोदी ने कहा था कि इस नोटबंदी से कालाधन और भ्रष्टाचार समाप्त हो जाएगा। अर्थव्यवस्था कैशलेस हो जायेगी और सारा लेन देन डिजिटल हो जाएगा। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। पहले से ज्यादा कैश आज भी बाजार में जब पहुँच चुका है तह कैशलेस बाजार की बात बेमानी हो गयी है। बता दें कि नोटबंदी की घोषणा 8 नवम्बर 2016 को की गयी थी।

इसीलिए अब इस तरह के सवाल भी उठ रहे हैं कि क्या केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने नोटबंदी का फ़ैसला करने से पहले को विस्तृत शोध अध्ययन किया था। क्योंकि इसका मूल प्रस्ताव ताे पुणे, महाराष्ट्र के छोटे स्तर के वैचारिक संगठन ‘अर्थ क्रांति’ ने तैयार किया था। यह फरवरी-2016 के आसपास की बात है। बताते हैं कि जब अर्थ क्रांति की ओर से यह प्रस्ताव आया तो मध्य प्रदेश और हरियाणा की भारतीय जनता पार्टी की सरकारों ने नेशनल इंस्टीट्यूट आॅफ़ पब्लिक फायनेंस एंड पॉलिसी (एनआईपीएफ़पी) ने इसका अध्ययन करने को कहा।

एनआईपीएफ़पी को केंद्रीय वित्त मंत्रालय से ही आर्थिक सहयोग मिलता है। इस संस्थान की रिपोर्ट जून-2017 में जारी की गई थी। यानी तब जबकि नोटबंदी का फ़ैसला हुए सात महीने बीत चुके थे। रिपोर्ट में साफ़ कहा गया कि ज़मीनी हालात के हिसाब से देखें तो नोटबंदी जैसे फ़ैसले की ज़रूरत ही नहीं है। इसमें नोटबंदी का फ़ैसला लेने से पहले दो सवालों पर विचार करने का मशविरा दिया गया था। पहला- क्या देश की अर्थव्यवस्था में बहुत ज़्यादा नगदी हो गई है? और दूसरा- क्या बड़े नोटों की तादाद ज़रूरत से ज़्यादा हो गई है?

बताते हैं कि ‘अर्थ क्रांति’ ने अपने प्रस्ताव में इनमें से पहले सवाल का जवाब देने की कोशिश की थी। उसने विभिन्न देशों में प्रचलित नगदी की तुलनात्मक तस्वीर पेश करते हुए यह बताया था कि हमारे देश में नगदी ज़रूरत से ज़्यादा हो गई है। लेकिन एनआईपीएफ़पी ने अपनी रिपोर्ट में इस तुलनात्मक निष्कर्ष को बहुत सतही आकलन बताया। रिपोर्ट के मुताबिक़ सिर्फ़ इसी एक बिंदु के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि देश में नगदी ज़रूरत से ज़्यादा है। बल्कि ऐसा निष्कर्ष देते समय आयात-निर्यात, मुद्रा स्फीति, ब्याज़ दरें, औद्योगीकरण की स्थिति जैसे दूसरे कारकों का ध्यान भी रखा जाना चाहिए।

’एनआईपीएफ़पी की रिपोर्ट में दूसरा सवाल बड़े नोटों का उठाया गया है। इसका आकलन करने के लिए एनआईपीएफ़पी ने करीब 15 विकसित और विकासशील देशों से भारत की तुलना की। और अंत में इन सवालों का जवाब भी एनआईपीएफ़पी के अध्ययन में ‘न’ में ही निकला। यानी इस हिसाब से बड़े नोट भी देश की अर्थव्यवस्था में ज़रूरत से ज़्यादा नहीं थे।

एनआईपीएफ़पी ने कुछ देशों की मुद्रा में बड़े नोटों की हिस्सेदारी को भी परखा। इसके लिए उसने दुनिया की क़रीब 25 अर्थव्यवस्थाओं से भारत की तुलना की। इसके बाद उसने रिपोर्ट में लिखा, ‘दूसरी अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में जब हम भारतीय मौद्रिक व्यवस्था में बड़े नोटों के हिस्से का आकलन करते हैं तो पाते हैं कि आनुपातिक रूप से भारत की स्थिति बेहतर ही है। ’फ़िर एनआईपीएफ़पी ने इस तरह की क़वायद बड़े नोटों के मूल्य के परिप्रेक्ष्य में की। तब पता चला कि नोटबंदी के समय देश की अर्थव्यवस्था में 86 फ़ीसदी बड़े नोट थे और अमेरिका तथा ब्रिटेन जैसे देशों की अर्थव्यवस्था में भी बड़े नोटों की हिस्सेदारी क़रीब-क़रीब इतनी ही थी। इस आकलन के बाद एनआईपीएफ़पी ने फ़िर यह निष्कर्ष दिया कि इस मोर्चे पर भी भारत की स्थिति दूसरे देशों से अलग नहीं है। ’

इन तमाम अध्ययनों के आधार पर एनआईपीएफ़पी की रिपोर्ट कहती है, ‘विभिन्न कारकों के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि भारत में बड़े नोटों की तादाद या उनका मूल्य ज़रूरत से ज़्यादा हो चुका है। ’ इसमें आगे की तार्किक बाधाओं का संकेत भी दिया गया। रिपोर्ट में बताया गया, ‘यह उल्लेख करना होगा कि मान लीजिए बड़े नोट अर्थव्यवस्था से, मौद्रिक तंत्र से हटा दिए जाते हैं। तब भी उस फ़ैसले के बाद जो बड़े नोट अर्थव्यवस्था में बच रहेंगे या लाए जाएंगे उनकी हिस्सेदारी फ़िर से कुल प्रचलित मुद्रा में ज़्यादा हो जाएगी। ’

यानी घूम-फिरकर मौद्रिक तंत्र फिर से नोटबंदी के पहले वाली स्थिति में ही पहुंच जाएगा। तो इस तरह से एनआईपीएफ़पी की रिपोर्ट की ही मानें तो ‘नोटबंदी के फ़ैसले का कोई तार्किक आधार मौज़ूद नहीं था। और न ही यह स्पष्ट था। ’ मगर अफ़सोस की बात है कि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने एनआईपीएफ़पी की रिपोर्ट का इंतज़ार भी नहीं किया और नोटबंदी का ऐलान कर दिया। और इस फ़ैसले के लिए उसने किन आर्थिक विशेषज्ञों से मशविरा किया यह भी आज तक स्पष्ट नहीं हो पाया है।

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