क्या बालाकोट हमले में जैश के 300 आतंकवादी मारे गए थे?

दिल्ली ब्यूरो: क्या बालाकोट में जैश के 300 आतंकी मारे गए थे ? यह सवाल अब सबकी जुबान पर तैरने लगा है। इसकी चर्चा हमकरेंगे लेकिन पहले भारत पाक के बीच के द्वन्द पर एक नजर। भारत -पाकिस्तान के बीच चल रही तनातनी के बीच सबसे सुखद खबर यही है कि हमारे विंग कमांडर अभिनन्दन सकुशल देश लौट गए हैं। भारत की यह एक बड़ी कूटनीतिक जीत है। इसकी जितनी भी सराहना की जाय कम है। लेकिन इसके बीच यह कहना कठिन है कि पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज आ गया है। प्रमाण यह है कि शुक्रवार को दिन भर विंग कमांडर अभिनन्दन के भारत आगमन की खबरे चलरही थी तो दूसरी तरफ कश्मीर की घाटी में आतंकी हमले हो रहे थे। हमारी सेना डटकर मुकाबला कर रही थी। शांहोते होते हमारे चार जवान शहीद हो गए। ऐसे में यह कहना कठिन है कि पाकिस्तान कोई शान्ति चाहता है। लेकिन इतना जरूर है कि भारत -पाकिस्तान के बीच चल रहे द्वन्द में पाकिस्तान शक के घेरे में है और दुनिया से अपमानित होता जा रहा है।

अब ऐसे में सवाल है कि क्या भारतीय वायु सेना के हमले में जैश-ए-मुहम्मद के 300 आतंकवादी वाक़ई मारे गए थे? इस मामले पर गहरा विवाद खड़ा हो गया है। अंतरराष्ट्रीय थिंक टैंक और दूसरी एजेंसियाँ सैटेलाइट तसवीरों के आधार पर दावे कर रही हैं कि बम तो गिराए गए हैं, पर उससे किसी को कोई नुक़सा नहीं हुआ है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया भी इस दावे की पुष्टि करता है। पर वायु सेना और रक्षा विभााग से जुड़े दूसरे लोगों ने अपना दावा दुहराया है कि हमले में जैश को भारी नुकस़ान हुआ है। रक्षा विभाग से जुड़े लोग रडार की तसवीरें दिखा कर कह रहे हैं कि उनके पास इस बात के पुख़्ता सबूत हैं कि हमले में बालाकोट का आतंकवादी शिविर नष्ट हो गया।

इधर समाचार एजेन्सी ‘रायटर’ और खाड़ी के चैनल ‘अल जज़ीरा’ के संवाददाताओं ने घटनास्थल तक जा कर जो देखा, उसके मुताबिक़ बालाकोट की जाबा पहाड़ी पर चार बम तो गिरे, लेकिन उन बमों से जानमाल का कोई नुक़सान नहीं हुआ। ‘अल जज़ीरा’ के संवाददाता का कहना है कि पहाड़ी पर बनी जिस इमारत को जैश का आतंकी शिविर बताया जाता है, वह वहाँ जस की तस खड़ी है और बम उससे काफ़ी दूर ख़ाली ज़मीन पर गिरे हैं। जबकि ‘रायटर्स’ संवाददाता का कहना है कि जिस इमारत में मदरसा यानी जैश के आतंकी शिविर के चलने की बात कही जाती है, उसे या उसके आसपास कोई नुक़सान हुआ हो, ऐसा नहीं लगता।

ऑस्ट्रेलिया स्थित इंटरनेशनल साइबर पॉलिसी सेंटर का कहना है कि उसने प्लानेट लैब इंक से मिली 27 फ़रवरी की सुबह की सैटेलाइट तस्वीरों का अध्ययन किया और पाया कि जिस जगह बम गिराने की बात कही जा रही है, उस जगह किसी तरह के नुक़सान होने का कोई लक्षण नहीं है। उसने यह भी कहा है कि तीन जगह बम गिराए जाने के संकेत मिलते हैं, बम का असर दिखता है। पर उस बम गिरने से कोई नुक़सान हुआ हो, यह नहीं दिखता है। सेंटर ने ज़ोर देकर कहा है कि लगता है कि 300 लोगों के मारे जाने की बात झूठी है।

उधर, सुरक्षा मामलों के अमेरिकी थिंक टैंक अटलाँटिक काउंसिल की डिजिटल फ़ॉरेन्सिक रिसर्च लैब (डीएफ़आर लैब) ने भी सैटेलाइट इमेजरी के ज़रिये इसकी पड़ताल की कि बम कहाँ गिरे। डीएफ़आर लैब ने अपनी पड़ताल के बाद इस पर हैरानी जतायी कि बम जैश के आतंकी ठिकाने से इतनी दूर क्यों गिरे? उसने कहा कि यह वाक़ई बड़ा रहस्यमय है। कुल मिला कर इसमें कोई सन्देह नहीं है कि भारतीय वायुसेना ने बड़ी बहादुरी से जाबा पहाड़ी पर धावा बोला और बम गिराये, लेकिन वहाँ से लौटे विदेशी पत्रकारों और डीएफ़आर लैब सभी का कहना है कि बम असली लक्ष्य से काफ़ी दूर गिरे।

डीएफ़आर लैब का कहना है कि मौक़े पर पड़े बमों के टुकड़ों से साफ़ पता चलता है कि भारतीय वायु सेना ने इज़रायल निर्मित स्पाइस-2000 प्रिसीज़न बम का इस्तेमाल किया। इस बम की ख़ूबी यह है कि इसे इस्तेमाल करने से पहले इसमें अक्षांश और देशांतर की सटीक जानकारी डाल दी जाती है। यह बम जीपीएस सिस्टम पर काम करता है और इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल प्रणाली का इस्तेमाल करता है। यानी यह बम छोड़े जाने के बाद ठीक उसी अक्षांश और रेखांश पर पहुँचता है, जो इसकी प्रणाली में फीड किया गया हो। साथ ही जिस जगह को निशाना बनाना है, उस जगह की तसवीर भी इसमें पहले से फ़ीड कर दी जाती है और बम अपने निश्चित निशाने पर पहुँच कर इसमें फ़ीड की गयी तसवीर का मिलान निशाना बनाये जाने वाली जगह के वास्तविक दृश्य से करता है और दोनों का मिलान हो जाने पर निशाने पर वार करता है।

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