क्या बेटी होना गुनाह था?

अखिलेश अखिल

महिला कल्याण के नाम पर पूरा मंत्रालय और बेटी बचाने के नाम पर भाषणबाजी के बाद भी बेटियां हवस की शिकार होती जा रही है। शर्म है ऐसी व्यवस्था और सरकार पर। और हाँ ऐसा कोई पहली बार तो नहीं हुआ। आजादी के बाद से भारत में गरीबी और बेवसी के साथ महिलाओं पर जुल्म की लम्बी सूची है। पाखंडी समाज ने ऐसे जुल्म को कई श्रेणियों में बाँट रखे हैं। याद रखिये सबसे ज्यादा गरीबो, असहायों और मजलूमों के साथ ही होते हैं और सत्ता और सरकार ले लोग इस पर राजनीति करते हैं लेकिन बच्चियों और महिलाओं की अस्मत लूटने वालों को कोई दंड नहीं देता। और दंड तब तो और नहीं मिलते जब बलात्कारी और हत्यारा कोई रसूखवाला या फॉर राजनीति से जुड़ा बन्दा हो। उन्नाव की नाबालिग पीड़िता की पुकार गूंगी-बहरी सरकार के कानों तक पहुंचने में एक साल लग गया और कठुआ की मासूम बच्ची का क्या दोष था उसका जो उसने महज़ 8 साल की उम्र में ये दर्द, यातना और नर्क भोगा…बस उसकी यही गलती थी ना कि उसने एक लड़की के रुप में जन्म लिया! या फिर उसने ऐसे समुदाय में जन्म लिया जिसे कुछ पाखंडी पसंद नहीं करते थे।

सदियों से यही तो होता आया है रावण की नज़रों से सीता नहीं बच पाई, द्रोपदी का चीर हरण करने की चाल देवर दुर्योधन और दुष्शासन ने चली। निर्भया की सौम्यता दिल्ली के दरिंदों से बर्दाशत नहीं हुई। सच तो यही है बेटियों के उत्थान में दिए जाने वाले सारे नारे अब जुमले हो चले हैं। उपवास की छिछोरी राजनीति जिसमें पक्ष-विपक्ष रोटियां सेक रहा है। उपवास के नाम पर दावतें उड़ाई जा रही हैं तो वहीं रेप की वारदातों पर राजनेताओं की बदजुबानी और विपक्ष की राजनीतिक भूख उभर कर सामने आ रही है।

कठुआ बलात्कार-हत्या मामले में जो कुछ हो रहा है, वो हमारी इंसानियत पर सवाल खड़ा करता है। जम्मू कश्मीर के कठुआ में आठ साल की मासूम से सामूहिक बलात्कार और जघन्य हत्या के मामले में पुलिस, वकील और राजनेताओं की भूमिका ने संवेदनहीनता के नए कीर्तिमान स्थापित कर दिए। इस जघन्य हत्याकांड के घटनाक्रम की शुरुआत 10 जनवरी को होती है इस दिन कठुआ ज़िले की हीरानगर तहसील के रसाना गांव की 8 साल की बच्ची गायब हो जाती है। पीड़िता बकरवाल समुदाय की थी जो एक ख़ानाबदोश समुदाय है। परिवार के मुताबिक ये बच्ची 10 जनवरी को दोपहर क़रीब 12:30 बजे घर से घोड़ों को चराने के लिए निकली थी और उसके बाद वो कभी घर वापस नहीं लौट पाई। क्योंकि उसे ऐसे लोगों ने अगवा किया जिनका मकसद बच्ची से रेप तो करना तो था ही, साथ ही एक ऐसी दहशतगर्दी मचाना था जिससे की बकरवाल समुदाय के लोग डर जाएं और ज़मीन के उस हिस्से से पीछे हट जाएं जहां से वे दरिंदे उन्हें हटाना, धमकाना और डराना चाहते थे।

7 दिन तक बच्ची को ये दरिंदे नशे की डोज दे रहे और उस भूखी-प्यासी बच्ची के साथ अपनी हवस की प्यास बुझाते रहे, जैसे वो कोई इंसान नहीं मांस का लोथड़ा है जिसे चील-कौए हर दिन, हर घड़ी, हर पल नोच रहे हैं। इससे भी जब उनका मन नहीं भरा तो फोन करके न्यौता दिया गया कि आओ, खाओ…दावत है! ये सोच कर रुह कांप जाती है कि जघन्य अपराध को अंजाम देने वालों में बड़े-बड़े आला अधिकारी शामिल हैं। गिरफ़्तार किए जाने वालों में स्पेशल पुलिस ऑफिसर (एसपीओ) दीपक खजुरिया, पुलिस ऑफिसर सुरेंद्र कुमार, रसाना गांव का परवेश कुमार, असिस्टेंट सब इंस्पेक्टर आनंद दत्ता, हेड कॉन्स्टेबल तिलक राज, पूर्व राजस्व अधिकारी का बेटा विशाल और उसका चचेरा भाई, जिसे नाबालिग बताया गया था, शामिल हैं।

आपको ये जानकर हैरानी होगी कि बलात्कार देश में बेटियों के खिलाफ होने वाला चौथा सबसे बड़ा क्राइम है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक भारत में हर दिन करीब 92 महिलाओं के साथ रेप होते हैं। एनसीआरबी द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक भारत में साल 2012 में रेप के 24,923 दर्ज हुए, जो 2013 में बढ़कर 33,707 हो गए। 2013 में 15,556 केस में पीड़‍िता की उम्र 18 से 30 साल के बीच थी। एनएसआरबी के आकंडों के मुताबिक साल 2013 में सभी राज्‍यों के मुकाबले मध्‍य प्रदेश में सबसे ज्‍यादा रेप केस दर्ज हुए। यहां हर दिन औसत 11 रेप केस दर्ज हुए। वहीं, राजस्‍थान में रेप के 3,285, महाराष्‍ट्र में 3,063 और उत्तर प्रदेश में 3,050 केस दर्ज हुए.

आंकड़ों से ये भी सामने आया कि 2012 के रेप केस में 9,082 नाबालिग लड़कियां थीं और 2013 में नाबालिगों की संख्‍या 13,304 हो गई। इसके अलावा अधिकांश रेप केस में आरोपी जानने वालों में से ही निकला है। एनसीआरबी के आंकड़े ये भी बताते हैं कि 94 प्रतिशत केस में आरोपी आरोप लगाने वाले को अच्‍छे से पहचानता है। इनमें 539 केस में अपराधी अभिभावक रहे, 10782 केस में पड़ोसी, 2315 केस में रिश्‍तेदार और 18171 दूसरे जानने वाले ऐसा करते हैं। महिलाओं के खिलाफ होने वाले इस अपराध में सबसे ज्यादा इज़ाफा उत्तर प्रदेश में हुआ है। साल 2016 में महिलाओं के प्रति होने वाले अपराध की कुल संख्या 3,38,954 है। जिसमें यूपी, वेस्ट बंगाल, बिहार, राजस्थान और शामिल है।

लेकिन इन आंकड़ों का क्या करेंगे आप ? आँकड़े तो वे हैं जो सामने आते हैं। दूसरा सच तो इससे भी भयावह है। अधिकतर मामले तो सामने आते ही नहीं। लोग लोक लाज के चलते बलात्कार ,और महिला शोषण की बात को छुपा जाते हैं ताकि यही समाज बाद में उसे प्रताड़ित ना कड़े। ऐसे में देश की राजनीति सबसे घटिया दिखती रही है। वोट बैंक के लिए राजनेता इसे खेल बना देते हैं। जाति -समाज में इसे बांटकर देखते हैं। वोट के असर को तौलते रहते हैं जो आज भी उन्नाव और कठुआ मामले में देखने को मिल रहे हैं। प्रधानमंत्री को सबसे पहले वोट की राजनीति से हटकर पीड़िता को न्याय दिलाना होना चाहिए। उन्हें अपनी चुप्पी तोड़नी चाहिए और नजीर पेश करनी चाहिए ताकि बलात्कारी इस तरह के कदम उठाने से भय खा जाय।

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