क्या मरते समय बादशाह अकबर मुश्लिम नहीं थे ?

दिल्ली ब्यूरो: यह भारत ही जहां कुछ भी संभव हो सकता है। किसी भी मसले पर कोई बयान दे सकता है और बयां देकर फिर उलट भी सकता है। माफ़ी भी मांग सकता है। अब एक नयी राजनीति सामने आयी है। संघ नेता इंद्रेश कुमार ने एक नया खुलासा किया है। उन्होंने कहा है कि मरते समय अकबर न मुस्लिम था और न हिंदू। वो अपना एक नया धर्म चलाना चाहता था इसलिए उसने इस्लाम छोड़ दिया, मस्जिद छोड़ दी, रसूल छोड़ दिया, कुरान छोड़ दिया, नमाज छोड़ दिया। जब वो जन्मा था तो मुगल था लेकिन मरने से चार साल पहले इस्लाम छोड़ दिया था।

संघ के प्रचारक इंद्रेश कुमार के इस बयान के बाद राजनीति शुरू हो गयी है। बता दें कि इंद्रेश कुमार ने ये बातें दिल्ली यूनिवर्सिटी नॉर्थ कैंपस में न्यू भारत फाउंडेशन की ओर से राम मंदिर पर आयोजित एक डिबेट में कही है।इंद्रेश कुमार ने कहा “अकबर ने नए मजहब की घोषणा की, जिसे दीन-ए-इलाही कहते हैं। इस्लाम में रहते हुए वह नया मजहब नहीं चला सकता था। क्योंकि उसके पास मजहब पहले से था। उसके सामने यह सवाल खड़ा था कि उसे इसका पैगंबर मानेगा कौन? लोगों ने उससे कहा कि दुनिया को पता लग गया है कि आपने इस्लाम छोड़ दिया है, एक नया धर्म चला दिया है। “

संघ के वरिष्ठ नेता कुमार ने कहा “अकबर ने इसे मान्यता देने के लिए मौलियों को बुलाया लेकिन उन्होंने मना कर दिया। वे चले गए. फिर पंडित और संत बुलाए गए उन्होंने भी मना कर दिया. फिर अकबर की तलवार बाहर निकली। तब मौलाना, पंडित सब आए और उन्होंने अकबर को इस नए मजहब का पैगंबर घोषित किया। लेकिन उस समय उसके खिलाफ पूरी दुनिया से 723 फतवे आए थे कि अकबर को इस्लाम से निष्कासित किया जाता है। “उस समय अगर छोटी सी तकलीफ कर लेते हिंदू लोग तो वो हिंदू बनने को तैयार था. उसे स्वीकार कर लिया होता तो भारत का इतिहास बदल चुका होता। मैं इसे बोलता हूं, मेरे खिलाफ किसी ने बगावत नहीं की. प्रदर्शन नहीं किया, धरना नहीं किया। ”

बता दें कि इंद्रेश कुमार मुस्‍लिम राष्‍ट्रीय मंच के मार्गदर्शक हैं। उनका काम मुस्लिमों को आरएसएस से जोड़ना है। बताया गया है कि मंच का गठन 2002 के गुजरात दंगों के बाद किया गया था। इसका उद्देश्‍य मुसलमानों से करीबी बढ़ाना था. इसकी शुरुआत पूर्व आरएसएस चीफ केएस सुदर्शन ने की थी।

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