क्या मोदी अब देश के ‘खुले में शौच से पूर्ण मुक्ति’ का दावा कर पाएंगे?

खुले में शौच जाने पर दो दलित बच्चों की निर्मम हत्या मध्य प्रदेश और पूरे देश को शर्मसार करने वाली घटना है। देश को भी शर्मसार करने वाली इसलिए कि एक जब हफ्तेी बाद ही बापू की डेढ़ सौ वीं जयंती पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी (मप्र सहित) पूरे देश को खुले में शौच मुक्त घोषित करने वाले हैं, उसके पहले ही दरिंदगी ने एक बड़ा अट्टहास किया है। जिन बच्चों की लाठियों से जानें ली गईं, वे शायद कभी नहीं समझ पाएंगे कि खुले में शौच करने का अपराध सजा-ए- मौत की वजह कैसे बन सकती है? अफसोस इस बात का भी कि इंसानियत का मुंह काला करने वाली इस घटना पर भी सियासत की पूरी कोशिश हो रही हैं। जो हुआ, इसके मूल में कारण कुछ और भी हो सकते हैं, लेकिन जो बेनकाब हुआ, वह है समाज में अभी भी दलितों के प्रति घृणा और राक्षसीपन का नंगा नाच। क्योंकि उन मासूम बच्चों को बचाने के लिए भी कोई नहीं आया।

इस घटना ने यह बात फिर रेखांकित कर दी कि देश अभी खुले में शौच से पूरी तरह मुक्त होने से कोसों दूर है और दलितों के लिए शौच जाना तक कितना कठिन है। यह बात भी सामने आई है कि दबंगों ने शासकीय योजना के तहत पीडि़त दलित परिवार के घर में शौचालय नहीं बनने दिया। और जब गांव के बाल्मिकी परिवार के दो बच्चे पंचायत भवन के सामने खुले में शौच जाने लगे तो उनकी जान ले ली गई। ‍मप्र के शिवपुरी जिले के गांव भावखेड़ी के उन दो बच्चों की मां अभी भी बेसुध सी है। उसे समझ नहीं आ रहा कि उसके परिवार के एक बालक और बालिका को सरेआम क्यों मार दिया गया और उन्हें कोई बचाने क्यों नहीं आया। इन दो बच्चों की हत्या के आरोप और एट्रोसिटी एक्ट के तहत पुलिस ने गांव के दो दंबगों को गिरफ्तापर किया है। ये यादव समाज से हैं। पकड़े जाने पर उन्होंने खुद को ‍विक्षिप्त बताने की कोशिश की। कहा कि उन्हें राक्षसों के नाश का भगवान से सपने में आदेश दिया है। इसीलिए उन्होंने दोनो बच्चों को खत्म कर दिया और इस निर्दयी कृत्य पर उन्हें कोई पश्चाताप नहीं है। ऐसा लगता है कि खुले में शौच तो एक तात्कालिक कारण था। दबंग और पीडि़त दलित परिवार के बीच कोई पहले से विवाद भी था, जिसका बदला इस तरह राक्षसी ढंग से लिया गया। क्योंकि खुले में शौच जाना गांवों में ऐसी अनहोनी नहीं है कि इसके लिए किसी की जान ले ली जाए।

इस घटना के दो पक्ष हैं। पहला तो खुले में शौच से मुक्ति की जमीनी हकीकत और दूसरे, दलितों के प्रति नफरत की गहरे तक पैठी भावना। जहां तक खुले में शौच से मुक्ति का दावा है तो वह कागजी ज्यादा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भले इसकी दुनिया भर में कुशल मार्केटिंग करें, वास्तव में शौचालय निर्माण बहुत बड़ा फर्जीवाड़ा है। मोदी ने पीएम के रूप में अपने पहले कार्यकाल की शुरूआत में गांधी जयंती पर देश में खुले में शौच जाने की शर्मनाक प्रथा को समाप्त करने तथा गांव-गांव में शौचालय बनाने की एक अच्छी और महत्वाकांक्षी योजना की शुरूआत की। इसके लिए सरकार हर परिवार को शौचालय बनाने के लिए 12 हजार रू. प्रोत्साहन राशि भी देती है। लेकिन जब कोई सामाजिक आंदोलन भी ‘सरकारी योजना’ का बाना पहन लेता है तो उसका हश्र वही होता है, जो स्वच्छता मिशन के तहत शौचालय निर्माण योजना का हुआ है।

कहते हैं कि ग्राम भावखेड़ी का दलित परिवार घर में शौचालय बनाना चाहता था, लेकिन दंबगो ने इसमें भी अपनी हेठी समझी। यानी एक दलित परिवार को शौचालय में जाकर भी नित्यकर्म करने का हक नहीं है। ऐसे में वाल्मिकि परिवार के बच्चों के सामने दैनिक कर्म के लिए खुली जगह के अलावा कोई पर्याय ही नहीं था। ऐसी कहानी कई गांवों की है। जहां छुआछूत का मामला नहीं था, वहां भी शौचालयों के नाम पर ज्यादातर अधकचरे स्ट्रक्चर खड़े किए गए। ऐसे अधिकांश शौचालयों में सफाई के लिए पानी का इंतजाम नहीं है। कुछ आदिवासी गांवों में तो स्थानीय लोगों ने शौचालयों का उपयोग अनाज भंडारण के लिए करना शुरू किया। कहने को शौचालय निर्माण के लिए सरकारों ने पैसा भी खूब दिया, लेकिन यह पैसा अफसर, नेता, ठेकेदारों और दलालों की जेबों में चला गया। ज्यादातर शौचालय कागजों पर ही बने। उनका सत्यापन भी कागजों पर ही हो गया और कागजों में आंकड़ों का वजन बढ़ता चला गया। चंद मामलों में जांच वगैरह भी हुई। लेकिन नतीजा सिफर रहा। गरीब और मजबूर लोग ‘वाॅश रूम’ की जगह ‘दिशा मैदान’ ही जाते रहे। इसका अर्थ यह नहीं कि शौचालय निर्माण का कहीं कुछ काम ही नहीं हुआ। कई जगह शौचालय बने भी, लेकिन या तो उनकी गुणवत्ता घटिया थी या वे उन मानको से कोसो दूर थे, जिसे सचमुच शौचालय कहा जाता है और जिसमे उपयोदगिता और कम्फर्ट का पूरा ध्यान रखा जाता है।

जमीनी हकीकत के बरखिलाफ सरकारी‍ रिकाॅर्ड में देश जितनी तेजी से खुले में शौच मुक्त होने जा रहा था, उसे उतनी गंभीरता से उन लोगों ने भी नहीं‍ लिया जिनके भले के लिए यह मिशन काम कर रहा था। संसद में आर्थिक सर्वेक्षण पेश करते हुए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन बता रही थीं कि स्वच्छता मिशन लागू किए जाने के बाद देश के 5 लाख 64 हजार 658 गांव खुले में शौच से मुक्ता (ओडीएफ) घोषित कर दिए गए हैं। इसमें मध्यप्रदेश भी शामिल है। लेकिन शिवपुरी जिले की घटना ने पिछले साल पूरे मप्र को कथित रूप से ‘खुले में शौच से मुक्त’ घोषित करने की कलई खोल दी है। यह भी उजागर हुआ कि समाज सुधार और समरसता के तमाम दावों के बाद भी दलितों और शोषितों के प्रति समाज के रवैए में कोई खास ‍परिवर्तन नहीं आया है। उन्हें आम इंसान की तरह जीने का भी हक नहीं और सिर्फ शौच जाने के लिए भी उनकी हत्या की जा सकती है।

शिवपुरी की यह घटना समाज में मूलभूत बदलाव लाने की उन तमाम कोशिशों और दावों पर पानी फेरने वाली है, जो सरकारें और खासकर भाजपा सरकारें करती रही हैं। हालां‍कि इस शर्मनाक मसले पर राजनीति करना भी ओछी मानसिकता है कि इसके लिए कौन सी सरकार या पार्टी दोषी है। एक दूसरे को कटघरे में खड़ा करने से अपराध की नृशंसता कम नहीं होती। जरूरत खुद हमे, हमारे समाज और हमारी सरकारों को समझने की है, जिनके लिए खुले में शौच जाना और न जाना भी एक अदद वोट का विषय है। शिवपुरी की घटना पर मुख्यमंत्री कमलनाथ ने दोषियों को कड़ी सजा दिलाने की बात कही है। लेकिन सवाल यह है कि इस लज्जास्पद घटना के बाद प्रधानमंत्री किस जोश और आत्मविश्वास के साथ बापू की डेढ़ सौ वीं जयंती पर ( भावखेड़ी सहित) पूरे देश के खुले में शौच मुक्त होने का ऐलान कर पाएंगे, यह देखने की बात है। क्योंकि उनके स्वच्छता मिशन की परि‍णति इस रूप में भी हो सकती है, यह उन्होंने भी न सोचा होगा।

सुबह सबेरे से साभार

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