क्या विपक्ष को ख़त्म करने की चाल है वन नेशन वन इलेक्शन

दिल्ली ब्यूरो: मोदी सरकार चाहती है कि लोकसभा चुनाव और विधान सभा चुनाव एक साथ हो ताकि चुनाव खर्च पर पावंदी लगे लेकिन विपक्ष ऐसा नहीं चाहता। इस खेल में उसे मोदी सरकार की कूटनीति दिखाई पड़ती है। देश के कई थिंक टैंक भी कुछ ऐसा ही सोचते हैं। आईडीएफसी इंस्टीट्यूट के अध्ययन से मिले आंकड़ों पर भरोसा करें तो ‘एक देश, एक चुनाव’ के परिणाम बेहद गंभीर हो सकते हैं। लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ होने पर विपक्ष का अस्तित्व समाप्त हो सकता है। इसके अनुसार, केंद्र में जिस पार्टी की सरकार होगी राज्यों में भी 77 फीसद तक उसी पार्टी की सरकार बनने की संभावना होगी। लिहाजा केंद्र के साथ राज्यों में भी एक ही दल का शासन होगा।

ऐसे में पूरे देश से विपक्ष का वजूद खत्म हो सकता है। बता दें कि देश में हर साल औसतन छह राज्यों में चुनाव होते हैं।उधर , थिंक टैंक सीएसडीएस के निदेशक संजय कुमार ने कहा, ‘इससे देश का संघीय ढांचा तबाह हो जाएगा। लोकसभा चुनाव से विधानसभा के चुनाव प्रभावित होंगे जो क्षेत्रीय दलों के हितों के खिलाफ होगा।’ पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई. कुरैशी लोकसभा और विधानसभा चुनावों को एक साथ कराने की योजना को कठिन मानते हैं। उन्होंने कहा, ‘क्षेत्रीय पार्टियां जिस तरह से अपनी संघीय स्वायत्तता और राजनीतिक स्वच्छंदता की लगातार तसदीक कर रहे हैं, उसे देखते हुए वर्ष 2019 में एक साथ चुनाव (लोकसभा और विधानसभा) कराने में दिक्कत पेश आएगी। इस मसले पर राजनीतिक सहमति बनाना भी बहुत मुश्किल होगा।’

पीएम मोदी की ‘एक देश, एक चुनाव’ की योजना का विरोध भी किया जा रहा है। आलोचक इस कदम को लोकतंत्र और देश के संघीय ढांचे के लिए खतरा मानते हैं। उनका कहना है कि ऐसा होने से किसी भी राज्य की सरकार को सत्ता से बेदखल करना आसान हो जाएगा। बता दें कि भारत में बहुदलीय पद्धति को अपनाया गया है, ऐसे में देश भर में एक चुनाव कराने के लिए सरकार को संविधान में संशोधन करना पड़ेगा। इसके लिए संसद के साथ दो तिहाई राज्यों की विधानसभाओं का समर्थन भी अनिवार्य होता है। यह सरकार के लिए कतई आसान नहीं होगा।

हालांकि ‘एक देश, एक चुनाव’ के पीछे मोदी सरकार धन, समय और ऊर्जा बचत की भी दलील देती है। चुनाव आयोग के आंकड़ों के आधार पर नीति आयोग का आकलन है कि पूरे देश में लोकसभा और विधानसभा का चुनाव एक साथ कराने पर 45 अरब रुपये का खर्च आएगा। यहां यह उल्लेखनीय है कि वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में 38.7 अरब रुपये खर्च हुए थे। ऐसे में तकरीबन 7 अरब रुपये और खर्च कर देश भर में एक साथ चुनाव कराया जा सकता है। बता दें कि वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में तकरीबन 11 अरब रुपये खर्च हुए थे जो 2014 में अचानक से बढ़ गया था। आईडीएफसी की रिपोर्ट के अनुसार, प्रत्येक विधानसभा चुनाव में औसतन 3 अरब रुपये का खर्च आता है। भारत में कुल 29 राज्य हैं। इसके अलावा दो केंद्र प्रशासित क्षेत्रों दिल्ली और पुडुचेरी में भी विधानसभा के चुनाव होते हैं। ऐसे में कुल मिलाकर सिर्फ विधानसभा चुनावों में ही तकरीबन 90 अरब रुपये खर्च हो जाते हैं। एक साथ चुनाव कराने पर इसमें से 45 अरब रुपये की बचत की जा सकेगी।

नोट: अगर आपको यह खबर पसंद आई तो इसे शेयर करना न भूलें, देश-विदेश से जुड़ी ताजा अपडेट पाने के लिए कृपया The Lucknow Tribune के  Facebook  पेज को Like व Twitter पर Follow करना न भूलें... --------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- --------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- ---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
Loading...
E-Paper