क्या सहानुभूति लहर पर सवार कांग्रेस फतह कर पायेगी रीवा

पूरी दुनिया में सफेद बाघ के लिए विख्यात रेवांचल में लोकसभा चुनाव की सरगर्मी पूरे शबाब पर पहुंच गयी है और पांच माह पूर्व हुए विधानसभा चुनाव में रीवा सहित पूरे रेवांचल में भाजपा के पक्ष में चली एकतरफा लहर का मुकाबला करने के लिए कांग्रेस उम्मीदवार सिद्धार्थ तिवारी सहानुभूति लहर पर सवार होकर भाजपा के उम्मीदवार सांसद जनार्दन मिश्रा को कड़ी टक्कर देने की कोशिश कर रहे हैं। यहां कुछ सवाल उठना स्वाभाविक है जिनका उत्तर 23 मई को मतगणना के साथ ही मिल सकेगा। क्या सहानुभूति लहर पर सवार होकर कांग्रेस रीवा सीट को फतह कर पायेगी। 1989 से लेकर अभी तक आठ लोकसभा चुनाव हुए हैं और इनमें कोई भी सांसद दुबारा लोकसभा की दहलीज पर नहीं पहुंच पाया है तो क्या इस मिथक को भाजपा के जर्नादन मिश्रा ध्वस्त कर नई लोकसभा में नजर आयेंगे। वैसे बहुजन समाज पार्टी ने भी काफी उम्मीदें लगा रखी हैं क्योंकि दोनों उम्मीदवार ब्राह्मण जाति के हैं इसलिए उसे इन दोनों की लड़ाई में अपनी राह आसान लग रही है, लेकिन जिस ढंग से इस इलाके में कांग्रेस और भाजपा ने बहुजन समाज पार्टी में सेंध लगाई उसे देखते हुए इस प्रश्‍न का उत्तर भी मतगणना से ही मिल सकेगा कि बहुजन समाज पार्टी का आधार और सिकुड़ता है या फिर उसे कुछ मजबूती मिलती है।

रीवा क्षेत्र में हो रहे बहुकोणी मुकाबले को जातिगत समीकरणों के चलते बसपा उम्मीदवार विकास पटेल कांग्रेस-भाजपा की इस लड़ाई में तीसरा कोण बनने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन 27 अप्रैल को बसपा सुप्रीमो मायावती की चुनावी सभा के बाद भी कोई विशेष राजनीतिक माहौल बसपा के पक्ष में साफतौर पर नजर नहीं आ रहा। ऐसे में देखने की बात यही होगी कि बसपा इस त्रिकोणात्मक लड़ाई में जीत का परचम फहरायेगी या कांग्रेस और भाजपा में से किसी एक को लोकसभा चुनाव जिताने में मददगार होगी। जहां तक कांग्रेस प्रत्याशी सिद्धार्थ तिवारी का सवाल है एक नया एवं युवा चेहरा होने के कारण कांग्रेस को भरोसा है कि क्षेत्र के लगभग 10 लाख से ज्यादा युवा मतदाताओं का समर्थन उसे आसानी से मिल जायेगा। चूंकि राजनीति के मैदान में अभी वे कोरी स्लेट हैं इसलिए किसी से उनका कोई पूर्वाग्रह नहीं है और जो भी अच्छा-बुरा होगा वह वे स्वयं ही लिखेंगे। एक संयोग यह भी है कि कांग्रेस खेमे में चुनाव संचालन के सारे सूत्र विनोद शुक्ला के हाथों में हैं जो हाल ही कांग्रेस में आये हैं, जबकि भाजपा ने चुनाव प्रबंधन का सारा दारोमदार शुक्ला के भाई पूर्व मंत्री राजेंद्र शुक्ल को दे रखा है। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के जनार्दन मिश्रा ने कांग्रेस उम्मीदवार और सिद्धार्थ तिवारी के पिता सुंदरलाल तिवारी को 1 लाख 68 हजार 726 मतों के अन्तर से पराजित किया था। हाल के विधानसभा चुनाव में इस लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली आठों सीटों पर भाजपा ने अपनी जीत दर्ज कराई। कांग्रेस के तिवारी को अपनी विरासत का भरोसा है और कांग्रेस पार्टी ने भी उस पर ही अपना विश्‍वास जताया है। सिद्धार्थ के दादा स्वर्गीय श्रीनिवास तिवारी प्रखर समाजवादी नेता और अनेक बार विधानसभा सदस्य रहे हैं, दस साल तक वे राज्य विधानसभा के अध्यक्ष भी रहे। सिद्धार्थ के पिता सुंदरलाल तिवारी लोकसभा सदस्य एवं विधायक दोनों ही रह चुके हैं।

जहां तक भाजपा उम्मीदवार जर्नादन मिश्रा का सवाल है उनकी सबसे बड़ी ताकत इस क्षेत्र में भाजपा की मजबूत पकड़ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे पर पड़ने वाले वोट हैं। भाजपा संगठन भी यहां मजबूत है और पूर्व मंत्री राजेंद्र शुक्ला जो स्वयं रीवा शहर से भाजपा विधायक हैं, की भी इस क्षेत्र में मजबूत पकड़ है और चुनाव प्रबंधन में उन्हें महारत हासिल है। भले ही बतौर सांसद मिश्रा की सक्रियता को लेकर सवाल उठ रहे हों लेकिन उनकी इस कमी को इस अंचल में चल रही भाजपा की मजबूत लहर ढक सकती है। जहां तक इस क्षेत्र के पुराने रिकार्ड का सवाल है कोई भी उम्मीदवार लगातार दूसरी बार पिछले आठ लोकसभा चुनावों में जीत नहीं पाया है। क्रमश: यमुनाप्रसाद शास्त्री जनता दल, भीमसिंह पटेल बसपा, बुद्धसेन पटेल बसपा, चन्द्रमणि त्रिपाठी भाजपा, सुंदरलाल तिवारी कांग्रेस, चन्द्रमणि त्रिपाठी भाजपा, देवराज सिंह पटेल बसपा और जनार्दन मिश्रा भाजपा विजयी रहे हैं। ऐसे में यह परम्परा मिश्रा के लोकसभा में पुन: पहुंचने में अनुकूल परिस्थितियों के बावजूद भी कहीं रोड़ा न बन जाये, यह नतीजों से ही पता चल सकेगा। कांग्रेस उम्मीदवार सिद्धार्थ के पिता सुंदरलाल तिवारी का हाल ही में निधन हुआ है इसलिए कांग्रेस को उम्मीद है की सहानुभूति लहर उनकी पार्टी की जीत को आसान बना सकती है, लेकिन वंशवाद का मुद्दा भी विपक्षी दलों द्वारा उठाया जा रहा है क्योंकि इस क्षेत्र से पिछले सात लोकसभा चुनावों की टिकट तिवारी परिवार को ही मिलता आया है।

सुबह सबेरे से साभार

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