क्यों न भाजपा ये ‘वर्चुअल रैलियां’ पूरी तरह रद्द कर दे

भोपाल: हर घड़ी चुनावी मोड में जीने वाली विश्व की सबसे बड़ी और देश में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने लद्दाख के गलवान घाटी में शहीद हुए सैनिकों के सम्मान में अपनी डिजीटल (वर्चुअल) रैलियां दो दिन के लिए स्थगित कर दी हैं। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने गुरूवार को ट्वीट कर बताया कि पार्टी ने रैलियों के साथ-साथ अपने सभी राजनीतिक कार्यक्रम भी स्थगित कर दिए हैं।

पार्टी के इस फैसले से सबसे ज्यादा राहत की सांस उन समर्पित भाजपा कार्यकर्ताअों ने ली है, जो इस कठिन देशकाल में भी पार्टी के इस ‘आत्ममुग्ध अभियान’ के औचित्य को लेकर परेशान थे। यूं पार्टी ने यह अभियान शहीदों के सम्मान में रोका है, लेकिन देश के वर्तमान हालात इस बात का साफ इशारा कर रहे हैं कि फिलहाल भाजपा को अपना चुनावी मूड ट्रेश में डाल कर देश की सुरक्षा और जन हित की रक्षा पर ध्यान ज्यादा केन्द्रित करना चाहिए। यही वक्त की पुकार है। आज भारत अपने निकट इतिहास के सबसे गहरे और व्यापक संकट से गुजर रहा है। यह संकट आंतरिक भी है और बाहरी भी। कोरोना महामारी ने हमारी अर्थव्यवस्‍था की चूलें हिला दी हैं। केन्द्र सरकार टुकड़ों-टुकड़ो में समाज के अलग-अलग वर्गों के लिए पैकेज घोषित कर रही है। इसी से अंदाज लगा लें कि हालात कितने गंभीर हैं। अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने में बहुत वक्त और दृढ़ संकल्प शक्ति लगेगी। देश में लाखों लोगों के रोजगार जा चुके हैं। उद्योग लड़खड़ा गए हैं। काम धंधे ठप से हैं। बाजार खुल गए हैं, लेकिन खरीदार नदारद हैं। कोरोना की दहशत और देश में संक्रमितों और कोरोना मृतकों की संख्या तमाम कोशिशों के बाद भी बढ़ती जा रही है। अनलाॅक 2.0 में भी जनजीवन पटरी पर शंका-कुशंकाअों के साथ लौटने की कोशिश कर रहा है। ज्यादातर लोग अपने में ही सिमटे हैं। जिनके आर्थिक स्रोत लाॅकडाउन हो गए हैं, उनकी आंखों में अंधेरा है। क्या करें, कैसे करें। चौतरफा असमंजस है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लाॅकडाउन के हर विस्तार के समय कोरोना को लेकर सावधानी बरतने और लोगों को मानसिक संबल देने की कोशिश करते रहे हैं।

उसी दौरान जब भाजपा ने मोदी सरकार 2.0 के पहले साल के कार्यकाल की उपलब्धियां बताने का महाअभियान घोषित किया तो लोगों ने उसे कौतुहल से ज्यादा हैरानी के साथ देखा। फर्क इतना था कि यह कामयाबियों का यह प्रचार ‘एक्चुअल’ से ज्यादा ‘वर्चुअल’ है। मोदी सरकार के केन्द्र में दूसरी बार सत्तारूढ़ होने की पहली सालगिरह पर जो कार्यक्रम घोषित हुआ, वह राजनीतिक दृष्टि से बहुत महत्वाकांक्षी है। इसके तहत पार्टी के वरिष्ठ नेता विभिन्न राज्यों में डिजीटल रैलियों के माध्यम से कार्यकर्ताअों और लोगों को सम्बोधित कर रहे हैं। इनमें गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, खुद पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा आदि शामिल हैं। 25 जून तक चलने वाले इस अभियान में पार्टी वर्चुअल रैलियों के जरिए देश के 10 करोड़ परिवारों (लगभग 50 करोड़ लोग) को अपनी सरकार के एक साल में ‍िकए गए असाधारण कामों को गिना रही है। कोरोना की वजह से यह व्यापक जन सम्पर्क सोशल मीडिया के जरिए‍ किया जा रहा है। लिहाजा हर वर्चुअल रैली को कामयाब बनाने हजारों एलईडी स्क्रीन लगाए जा रहे हैं। बताया जाता है कि मप्र में तो 62 हजार बूथों पर कार्यकर्ताअों को सरकार की उपलब्धियों के पेम्फलेट बांटने का टारगेट दिया गया है। सरकार की उपलब्धियों में कश्मीर में धारा 370 हटाने, तीन तलाक कानून खत्म करने, कोरोना से लड़ने 20 लाख करोड़ का मेगा पैकेज और आत्मनिर्भर भारत अभियान शामिल हैं।

बेशक, किसी भी सत्तारूढ़ पार्टी को अपनी सरकार की कामयाबियों को जताने का पूरा हक है। लेकिन सवाल यह कि किन परिस्थितियों में? जब पूरा देश वैश्विक महामा‍री से जूझ रहा हो, खुद सरकार इससे निपटते-निपटते हलकान हो, देश की सीमाअों पर गहरा तनाव हो, तब कोई सियासी पार्टी अपनी उपलब्धियों का नगाड़ा इस तरह कैसे पीट सकती है? बल्कि उसे ऐसा क्यों करना चाहिए ? वह भी तब, जब बार-बार सोशल डिस्टेसिंग बनाने, भीड़ न करने, घर से बाहर न‍ निकलने की हिदायतें खुद पीएम दे रहे हों। जब कोरोना से लड़ने के लिए देश में पाई-पाई बचाने की बात हो रही हो, तब ऐसी ‘वर्चुअल’ रैलियों के लिए ‘एक्चुअल’ पैसा खर्च करने से क्या हासिल है? आजकल आत्मनिर्भरता की बात बहुत की जा रही है। उससे शायद ही कोई असहमत हो। लेकिन बीते 6 साल में हर दृष्टि से जितनी आत्मनिर्भर भारतीय जनता पार्टी हुई है, उतना शायद ही कोई दूसरा हुआ हो। यकीनन पार्टी का आदेश मानना हर कार्यकर्ता से अपेक्षित है। लेकिन जमीनी वास्तविकता और खयाली दुनिया के बीच भी तो कोई संतुलन होना चाहिए। 2015 में देश में मोदी सरकार के कार्यकाल की पहली सालगिरह भी पार्टी ने धूमधाम से मनाई थी। तब भी हर बूथ पर कार्यकर्ताअों ने सरकार की साल भर की उपलब्धियों के पर्चे लोगों को बांटे थे। लेकिन तब कोरोना जैसा कोई भय नहीं था। न देश की अर्थव्यवस्था वेंटीलेटर पर थी और न ही सरहदों पर मुट्ठियां तनी हुई थीं। यह बात अलग है कि तब भी इस उपलब्धि अभियान के पेम्फलेट छपाई के ठेकों पर कई सवाल उठे थे। चर्चा रही कि पेम्पलेट छपाई का पौने दो करोड़ का ठेका एक बड़े मीडिया हाउस को मिला था। पर्चे इस बार भी बंट रहे हैं। वो भी किसी ने छापे ही हैं। इसके अलावा सोशल मीडिया पर हिट्स, व्यूज आदि का ‘खेल’ तो अलग ही है। इस ‘वर्चुअल दुनिया’ में असल में क्या हो रहा है, क्या हुआ है और हुआ तो कितनों ने देखा, ऐसे सवालों की ज्यादा गुंजाइश नहीं होती। अब तो लोगों का आमना- सामना भी मास्क की आड़ में होता है, ऐसे में ग्राउंड लेवल पर क्या हो रहा है, किसी को ठीक-ठीक पता नहीं होता। डिजीटल की दुनिया दावों पर तैरती रहती है। दरअसल वीडियो कांफ्रेंसिंग, वेबीनार आदि के जरिए वाहवाही लूटना वैसा ही है कि जैसे चरणोदक को च्यवनप्राश मान लेना।

भाजपा के आम कार्यकर्ता की दुविधा यह है कि वो इस कोरोना काल में लोगों तक पहुंचे तो कैसे? खुद की जान खतरे में कैसे डाले और अगले को निरापद होने का भरोसा कैसे दिलाए? यूं दिक्कतें और आशंकाएं तो पहले भी थीं, लेकिन गलवान घाटी प्रकरण और चीन की दादागिरी ने देश के माहौल को और चिंताजनक बना दिया है। कोरोना से हलाकान हर भारतीय के मन में एक ही सवाल है कि यह मामला सुलझेगा या नहीं और सुलझेगा तो कैसे और किस कीमत पर? देश की सेना पर सभी को भरोसा है, लेकिन कुलमिलाकर जो हालात हैं, वो इस वक्त युद्ध की तुताड़ी बजाने के नहीं हैं। घोर अनिश्चितता और आशंका के इस माहौल में राजनीतिक उपलब्धियों का कीर्तन भी अकाल के बीच हल जोतने जैसा ही है। और फिर ये उपलब्धियां आखिर बताई किसको जा रही हैं? उस जनता को जो असलियत पहले ही जानती है या उस विपक्ष को, जिसे खुद ही अपना होश नहीं है? जनता वो जानना सुनना चाहती है, जिससे उसका और देश का आत्मविश्वास लौटे न कि किसी पार्टी भर का। भाजपा ने जो वर्चुअल रैलियां दो दिन के लिए स्थगित की हैं, उन्हें वह अगले चुनाव तक ही रद्द कर दे तो बेहतर होगा।

वैसे भी मोदी सरकार ने जो ऐतिहासिक काम कर दिए हैं, उनका राजनीतिक अंकन लोगों के मन पर पहले ही हो चुका है। उजली कमीज की तरह उन्हें बार बार बताना गैरजरूरी है। देशहित का तकाजा यही है कि इस ‘उपलब्धि अभियान’ का बजट अगर समाज हित में खर्च हो तो भाजपा को दोहरा लाभ होगा। वोटों के साथ गरीबों की दुआएं भी मिलेंगी। यह संदेश भी जाएगा कि पार्टी हर वक्त शहनाई बजाने के मूड में नहीं रहती। खासकर तब, जब देश के अधिकांश हिस्सों में और सीमाअो पर व्यथा और आक्रोश के कर्कश स्वर सुनाई पड़ रहे हों।

अजय बोकिल/सुबह सबेरे से साभार

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