खूब लड़ीं मर्दानी…

जब हम आजादी की लड़ाई में उत्तर प्रदेश की महिलाओं के बारे में बात करते हैं, तो हमारा ध्यान तुरंत रानी लक्ष्मीबाई और बेगम हजरत महल की ओर जाता है। लेकिन इस संघर्ष में सिर्फ इन्हीं दो स्त्रियों का योगदान नहीं था, बल्कि इस संघर्ष में दलित समुदायों से आने वाली महिलाएं थीं, कई भटियारिनें या सराय वालियां थीं, जिनके सरायों में विद्रोही योजनाएं बनाते थे। कई कलावंत और तवायफें भी इसमें मददगार थीं, जो समाचार और सूचनाएं पहुंचाने का काम करती थीं।

आजादी की लड़ाई में उत्तर प्रदेश की कई महिलाओं ने घर की चहारदिवारी को लांघ कर अंग्रेजी हुकूमत से लोहा लिया। इनमें बेगम हजरत महल और रानी लक्ष्मीबाई का नाम तो लिया ही जाता है, कई ऐसे नाम भी हैं जो गुमनाम हैं। यूपी की किन महिलाओं ने अग्रेजों के दांत खट्टे किए, इस पर एक नजर।

बेगम हजरत महल : 10 मई 1857 को मेरठ के ‘सिपाहियों’ ने अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ विद्रोह का झंडा बुलंद किया था। जल्द ही कई और लोग इस विद्रोह में शामिल हो गए। इस दौरान अवध में गद्दी से बेदखल किए गए नवाब वाजिद अली शाह की पत्नी बेगम हजरत महल ने ईस्ट इंडिया कंपनी की शक्ति का मुकाबला किया। हालांकि वह कामयाब होते-होते रह गईं।

झांसी की रानी : लक्ष्मीबाई का जन्म वाराणसी के एक पुरोहित के घर में हुआ था। मई, 1842 में झांसी के महाराज गंगाधर राव के साथ विवाह के बाद उनका नाम बदल कर लक्ष्मीबाई कर दिया गया। 1853 में उनके पति की मृत्यु के बाद अंग्रेजों ने डलहौजी की कुख्यात हड़प नीति के सहारे झांसी का विलय कर लिया। लक्ष्मीबाई को झांसी के किले से बाहर कर दिया गया और उन्हें रानी महल में पेंशनयाफ्ता होकर रहने के लिए मजबूर किया गया। इस पर लक्ष्मीबाई ने एक सेना बनाई। मार्च, 1958 में अंग्रेजी फौज ने जब झांसी पर हमला किया, तब उनका पूरे दमखम के साथ मुकाबला किया। हालांकि अंग्रेजों से लोहा लेते हुए रानी वीरगति को प्राप्त हो गईं।

झलकारी बाई : झलकारी बाई झांसी के दुर्गा दल या महिला दस्ते की सदस्य थीं। झलकारी तीरंदाजी और तलवारबाजी में प्रशिक्षित थीं। लक्ष्मीबाई से उनका इस्तेमाल झांसी की सेना को अंग्रेजों को चकमा देने के लिए किया था। अंग्रेजों को धोखा देने के लिए झलकारी बाई ने रानी की तरह पोशाक पहनी और झांसी की सेना की सेनापति बन गईं। इससे लक्ष्मीबाई बिना किसी को शक हुए बाहर निकल सकीं। जब झलकारी को कैद किया गया तब अंग्रेज झटका खा गए।

वीरांगना ऊदा देवी : लखनऊ में हुई सबसे भीषण लड़ाइयों में से एक नवम्बर, 1857 में सिकंदर बाग में हुर्ह थी। सिकंदर बाग में खूनी लड़ाई हुई जिसमें हजारों भारतीय सैनिक शहीद हुए। युद्ध के दौरान अंग्रेजों को आवाज से लगा कि कोई पेड़ पर चढ़कर धड़ाधड़ गोलियां दाग रहा है। जब उन्होंने पेड़ को काट कर गिराया, तब पता चला कि फायरिंग करने वाला कोई आदमी नहीं, बल्कि एक औरत है। जिसकी पहचान बाद में ऊदा देवी के तौर पर की गई। ऊदा देवी पासी समुदाय से ताल्लुक रखती थीं। उनकी मृत्यु आज भी लखनऊ के सिकंदर बाग के बाहर स्थित चौक की शोभा बढ़ा रही है।

अजीजन बाई : सबसे ज्यादा दिलचस्प कहानियां कानपुर की तवायफ अजीजन बाई की हैं। वह पुरुषों के लिबास पहना करती थीं। एक जोड़ी बंदूक रखती थीं और सैनिकों के साथ घोड़े की सवारी करती थीं। वह नाना साहेब की शुरुआती जीत पर कानुपर में झंडा फहराने वाले जुलूस में शामिल थीं। उन्होंने औरतों का एक दस्ता भी बनाया, जो निडरतापूर्व सशस्त्र जवानों की हौसला अफजाई करता था।

बहादुर महिलाएं और भी : उत्तर प्रदेश का मुजफ्फरनगर इलाका स्त्रियों की सक्रिय भागीदारी का प्रत्यक्षदर्शी बना। कुछ स्त्री विद्रोहियों में आशा देवी, बख्तावरी देवी, भगवती देवी त्यागी, इंद्र कौर, जमीला खान, मन कौर, रहीमी, राज कौर, शोभना देवी और उम्दा के नाम शामिल हैं। इन सभी ने लड़ते हुए अपने प्राणों की कुर्बानी दी। असगरी बेगम के अपवाद को छोड़कर ये सभी महिलाएं अपनी उम्र के तीसरे दशक में थीं। इन्हें फांसी पर चढ़ा दिया गया और कुछ मामलों में तो इन्हें जिंदा जला दिया गया। दो और रानियां थीं, जिनकी रियासत हड़प नीति का शिकार हुई थी और जिन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ बगावत का झंडा उठाया था। इनमें रायगढ़ की अवंतिबाई लोधी और धार की रानी द्रौपदी का नाम प्रमुख है।

विजयलक्ष्मी पंडित : एक संपन्न, कुलीन घराने से ताल्लुक रखने वाली और जवाहरलाल नेहरू की बहन विजयलक्ष्मी पंडित भी आजादी की लड़ाई में शामिल थीं। सविनय अवज्ञा आंदोलन में भाग लेने के कारण उन्हें जेल में बंद किया गया था। वह एक पढ़ी-लिखी और प्रबुद्ध महिला थीं और विदेशों में आयोजित विभिन्न सम्मेलनों में उन्होंने भारत का प्रतिनिधित्व किया था। भारत के राजनीतिक इतिहास में वह पहली महिला मंत्री थीं। वह संयुक्त राष्ट्र की पहली भारतीय महिला अध्यक्ष थीं।

दुर्गा भाभी : चंद्रशेखर आजाद के अनुरोध पर ‘दि फिलॉसफी ऑफ बम’ दस्तावेज तैयार करने वाले क्रांतिकारी भगवतीचरण वोहरा की पत्नी ‘दुर्गा भाभी’ नाम से मशहूर दुर्गा देवी बोहरा ने भगत सिंह को लाहौर जिले से छुड़ाने का प्रयास किया। वर्ष 1928 में जब अंग्रेज अफसर सांडर्स को मारने के बाद भगत सिंह और राजगुरु लाहौर से कलकत्ता के लिए निकले, तो कोई उन्हें पहचान न सके, इसलिए दुर्गा भाभी की सलाह पर एक सुनियोजित रणनीति के तहत भगत सिंह उनके पति, दुर्गा भाभी और राजगुरु नौकर बनकर वहां से निकल लिए। 1927 में लाला लाजपतराय की मौत का बदला लेने के लिए लाहौर में बुलाई गई बैठक की अध्यक्षता दुर्गा भाभी ने की।

बैठक में अंग्रेज पुलिस अधीक्षक जेए स्कॉट को मारने का जिम्मा वे खुद लेना चाहती थीं, पर संगठन ने उन्हें यह जिम्मेदारी नहीं दी। तत्कालीन बम्बई के गर्वनर हेली को मारने की योजना में टेलर नामक एक अंग्रेज अफसर घायल हो गया, जिस पर गोली दुर्गा भाभी ने ही चलाई थी। इस केस में उनके विरुद्ध वारंट भी जारी हुआ और दो वर्ष से ज्यादा समय तक फरार रहने के बाद 12 सितम्बर 1931 को दुर्गा भाभी लाहौर में गिरफ्तार कर ली गईं।

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