गांधी जी बनाम लक्ष्मी जी

भाजपा के वरिष्ठ नेता और सांसद सुब्रमण्यम स्वामी का भारतीय अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए दिया गया एक ‘देसी’ सुझाव सुर्ख़ियों में है। मध्यप्रदेश के खंडवा में विवेकानंद व्याख्यान माला के तहत भाषण देने के मौके पर मीडिया से चर्चा में उन्होंने सलाह दी कि भारतीय रुपए पर लक्ष्मीजी की फोटो छापने से बदहाल रुपया अपने आप तंदुरुस्त होता जाएगा। इसके पक्ष में उन्होंने इंडोनेशिया की मुद्रा रूपियाह का हवाला दिया, जिसमें कुछ नोटों पर बाईं ओर भगवान गणेश का चित्र छपा होता है। स्वामी के सुझाव पर सरकार या भाजपा की ओर से अभी कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन उनके सुझाव पर बहस चल पड़ी है कि अगर अर्थव्यवस्था में सुधार का इतना आसान और शर्तिया उपाय मौजूद है, तो केंद्र सरकार काहे को हाथ-पैर मारे जा रही है?

सुब्रमण्यन स्वामी भाजपा के बुजुर्ग नेता हैं। वह कट्टर हिंदूवादी और बयानों में प्रयोगवादी हैं। देश का वित्त मंत्री बनने की हसरत वह दशकों से पाले हुए हैं, लेकिन किसी ने भी हार्वर्ड में शिक्षित इस अर्थशास्त्री को देश का खजान्ची बनाने का जोखिम नहीं उठाया। इसका मलाल स्वामी को हमेशा रहता है। अर्थव्यवस्था ही क्यों, वह दूसरे कई मुद्दों पर विवादित बयान देते रहते हैं। लेकिन कोई सीरियसली नहीं लेता। हालांकि यह बात भी सही है कि स्वामी को भीतर की जानकारियां होती हैं। यह मानना गलत नहीं होगा कि स्वामी ने अभी जो बयान दिया, उसके पीछे भी भारतीय अर्थव्यवस्था की दिनोंदिन होती खस्ताहालत है। आगामी वित्तीय वर्ष के पहले जो जानकारियां लीक हुई हैं, उसे मानें, तो चालू वित्तीय वर्ष में ही सरकार को 1.71 खरब का राजस्व घाटा हो रहा है। इसकी भरपाई कैसे और कहां से हो, यह सरकार की समझ नहीं आ रहा। केंद्र ने पहले रिजर्व से बैंक से 1 लाख 76 हजार करोड़ रुपए लिए, अब सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों से डिविडेंड के रूप में 19 हजार करोड़ रुपए मांगे जा रहे हैं। तेल कपंनियां परेशान हैं। उधर, सरकार और कर्ज उठाने की तैयारी में है। मुद्दा यही है कि पैसा कहां से आए। अपेक्षित कर वसूली हो नहीं रही, विदेशों से निवेश आ नहीं रहा। देसी उद्योगपति भी अंटी ढीली नहीं कर रहे हैं। यानी एक तरफ अपेक्षाओं और वादों का बुर्ज खलीफा है, तो दूसरी ओर जमीनी सच्चाई भाटे की है। सरकार कोशिशें कर रही है, पर रंग चोखा नहीं आ रहा है।

बहरहाल, स्वामी ने जो कहा, उसके पीछे दुनिया का आबादी के हिसाब से सबसे बड़े मुस्लिम राष्ट्र इंडोनेशिया द्वारा अपनी मुद्रा ‘रूपियाह’ पर हिंदू देवता गणेश की तस्वीर छापा जाना है। गणेशजी का यह चित्र इंडोनेशियाई करंसी पर बाईं ओर छोटे आकार में छापी जाती है। उनकी मान्यता है कि भगवान गणेश की तस्वीर छापने से इंडोनेशिया की रसातल में जा रही अर्थव्यवस्था पटरी पर आ गई और तेजी से दौडऩे लगी। हालांकि इसके पीछे इंडोनेशियाई सरकार द्वारा किए गए कई कारगर उपाय भी थे। इंडोनेशिया के अलावा दुनिया में केवल संयुक्त राज्य अमेरिका की मुद्रा डॉलर पर एक ध्येय वाक्य छापा जाता है ‘इन गॉड वी ट्रस्ट’ अर्थात हमें भगवान पर भरोसा है। लेकिन उस पर किसी देवी-देवता की तस्वीर नहीं होती। लेकिन स्वामी ने भंडार भरपूर रहने वाला सुझाव दिया है, उसके कई निशाने हैं। पहला तो लक्ष्मी की तस्वीर छापने से रुपया ‘हिंदू’ दिखाई देगा। दूसरा, रुपए पर से बरसों से छप रही महात्मा गांधी की तस्वीर अपने आप ही हट जाएगी।

यूं भी हिंदू मिथकों में लक्ष्मी धन की देवी हैं। उन्हें प्रसन्न करने में लोग जिंदगी बिता देते हैं, लेकिन वह कम पर ही मेहरबान होती हैं। यह भी कहा जाता है कि झूठे और फर्जी लोगों पर लक्ष्मी प्रसन्न नहीं होतीं। बावजूद इसके लोग लक्ष्मी की पूजा पूरे मनोयोग से करते हैं। क्योंकि उसका एक क्लिक पूरा एटीएम ही खोल कर रख सकता है। यहां एक बात और। धन की देवी भले लक्ष्मी हों, लेकिन खजाने का जिम्मा कुबेर के पास ही होता है। कुबेर सभी देवताओं के कोषाध्यक्ष हैं। लक्ष्मी को साधने से पहले कुबेर को प्रसन्न करना जरूरी है। इसलिए शास्त्रों में कुबेर मंत्र के जाप का प्रावधान है। इस मंत्र का दिल से जाप कर लिया, तो समझिए कि रिजर्व बैंक के ताले भी खुल गए। दिलचस्प बात यह है कि राष्ट्रपिता कहलाने के बाद भी बापू को देश की मुद्रा पर आने के लिए पचास साल लग गए। 1969 में पहली बार गांधीजी की जन्मशती पर करंसी नोट पर बापू की बैठी तस्वीर छापी गई थी। उसके बाद 1996 में नोटों की गांधी सिरीज शुरू हुई। इसके पहले नोटों पर अशोक चिह्न छपा करता था। अगर स्वामी का सुझाव सरकार ने माना, तो नोटों पर बचा-खुचा गांधीवाद भी जाता रहेगा।

एक बात और। स्वामी ने सुझाव देते वक्त केवल लक्ष्मी के वैभव रूप को ही देखा। रुपए पर उसकी संभावित मेहरबानी को ही देखा। वह भूल गए कि लक्ष्मी का वाहन उल्लू है और बगैर वाहन वह विचरण नहीं करतीं। जहां तक रुपए की गिरती हालत के उठने का प्रश्न है, किसी ने सोशल मीडिया पर स्वामी से एक मासूम प्रतिप्रश्न कर डाला कि डॉलर पर तो लक्ष्मीजी की तस्वीर नहीं छपती, फिर वह इतना मजबूत क्यों बना रहता है?

इसका जवाब यही है कि अर्थव्यवस्थाएं टोटकों से नहीं, सही नीतियों और नीयत से चलती हैं। लक्ष्मीजी नोट पर भले विराजमान हो जाएं, आर्थिकी को सहारा देने वाली नीतियां और उपाय न होंगे, तो केवल धन की देवी को भजने से तो कुछ नहीं होगा। टोटकों में केवल अंधश्रद्धा होती है, जबकि उपायों में आस्था के साथ तर्क भी होते हैं। इसे गनीमत कहिए या देश का दुर्भाग्य कि स्वामी के सुझावों को किसी ने परखने का जोखिम अभी तक नहीं उठाया है। मोदी सरकार भी शायद ही उठाए, लेकिन देश में अर्थव्यवस्था की सेहत पौराणिक खुराक देकर सुधारने वाले भी हैं, यह खास बात है। फिलहाल तो आर्थिकी के जल्द पटरी पर आने के आसार कम दिखते हैं। हां, चश्मे का कोई नया प्रायोजित नंबर आ जाए तो बात अलग है। कहते हैं कि लक्ष्मी भी उसी जगह वास करती है, जहां पुरुषार्थी लोग बसते हैं। शोशेबाजी से मनोरंजन तो हो सकता है, रुपया डॉलर का हाथ नहीं पकड़ सकता।
अजय बी.

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