गुजरात मॉडल मोड में मोदी सरकार!

नई दिल्ली: ऐतिहासिक लाल किला दिल्ली में है। वहीं रहेगा भी। अलबत्ता लाल किले की रूह के दीदार कहीं पर भी संभव हैं। जैसे पहली बार 2013 में 15 अगस्त को इसके दीदार गुजरात में भुज के लालन कालेज में कराये गये थे। फिर, उसी साल सितम्बर में इसके दीदार अम्बिकापुर (छत्तीसगढ़) में कराये गये थे। दोनों जगहों पर नरेंद्ग मोदी ने ही इसकी रूह की प्राचीर से गर्जना की थी। भुज में जब बोले थे, तब गुजरात के मुख्यमंत्री थे, और बोलते वक्त प्रधानमंत्री की रूह ले ली थी। और, जब अम्बिकापुर में हुंकार भरी थी, तो भाजपा के पीएम पद के कैंडीडेट थे।

आशय यह कि रूह अपने मतलब के लिए इधर-उधर ले जायी जा सकती है, लेकिन देह टस से मस नहीं होती। लिहाजा दिल-दिमाग भी अपनी मूल जड़ों में ही बसता-रमता है। बेलाग कहें, तो मोदी सरकार बेशक दिल्ली में विराजमान है, पर उसके कार्य की स्टाइल गुजरात मॉडल के रूह में झिलमिल-झिलमिल करे, तो कोई शक-शुबहा नहीं क्योंकि रूपांतरकार तो मोदी जी ही हैं। इसी लिए, देश की राजधानी दिल्ली में तैनात गुजरात बेस्ड अफसर हों, मंत्री हों या पत्रकार, इनमें से किसी को भी मोदी की अगुवाई वाली सरकार की कार्यशैली को लेकर हैरानी-परेशानी नहीं होती क्योंकि उन्हें पता है कि सरकार संचालन का गुजरात मॉडल है क्या। जिन्हें इसका तर्जुबा नहीं है, अचम्भे में हैं। असहज महसूस कर रहे हैं। उनमें अधीरता की वजह यह है कि उन लोगों ने इससे पहले कभी भी समूचे देश की नुमाइंदगी करने वाली सेंट्रल सरकार की कार्य पद्यति को किसी राज्य विशेष के खांचे में देखा नहीं था।

सबसे कठिन डगर तो चौथे स्तम्भ मीडिया की है। विदेशों में प्रधानमंत्री के कार्यक्रमों के कवरेज के दिन तो मोदी सरकार में कल की बातें हो गई हैं। बतौर पीएम मोदी अब तक तीन दर्जन से ज्यादा बार विदेश यात्रा कर चुके हैं, पर एक बार भी पत्रकारों को पीएम संग जाने का न्योता नहीं मिला। संग में पत्रकार जाते थे, तो अमूमन प्रधानमंत्री या उनके संग जाने वाले अफसर या मंत्रियों से बातचीत हो जाती थी। प्राय: उड़ते-उड़ते ही आकाश में खबरें मिल जाती थीं, जो उसी दिन देश की जनता को मिल जाती थीं। इस तरह पत्रकार और सत्ता पक्ष की जनता के प्रति जवाबदेही का निर्वहन हो जाता था। शायद, यह सरकार पत्रकारों को संग ले जाने को फिजूलखर्ची समझती है। वैसे पत्रकार जहां भी ले जाये जाते थे, वहां पर वे अपने ठहरने व अन्य खर्च खुद ही वहन करते थे। उनकी विमान यात्रा का किराया जनता के टैक्स से पूरा होता था।

एक अहम बात यह भी कि पीएम मोदी से पहले जितने प्रधानमंत्री हुए, उनके प्रेस सलाहकार होते थे। ये या तो वरिष्ठ पत्रकार बनाये जाते थे या फिर किसी अधिकारी को यह जिम्मेदारी दी जाती थी। प्रेस सलाहकार पत्रकारों व सरकार के बीच कड़ी होते थे। इनके माध्यम से पत्रकारों की पहुंच अफसरों व मंत्रियों तक सहज हो जाती थी। इस सरकार में प्रेस सलाहकार की नियुक्ति ही नहीं की गई। ऐसी स्थिति में पत्रकार प्रधानमंत्री कार्यालय की पहुंच से दूर हुए ही, उन्हें पार्लियामेंट के सेंट्रल हाल में मंत्रियों-सांसदों से बातचीत के मिलने वाले अवसर पर भी ग्रहण लग गया है। यह ग्रहण इस रूप में लगा है कि सेंट्रल हाल के गेट पर ही गुजरात के एक अधिकारी की तैनात की गई है, जो पत्रकारों की मंत्रियों-सांसदों से हुई बातचीत की लिस्ट बनाते हैं। इस हालात में मंत्री हों या सांसद पत्रकारों से बातचीत करने में कतराते हैं क्योंकि उन्हें डर लगता है कि कहीं उनसे पार्टी द्वारा यह न पूछा जाने लगे कि क्या-क्या बातें हुईं।

पीआईबी (प्रेस इंफार्मेशन ब्यूरो) अधिकृत पत्रकार भी परेशान है। बेहिचक अफसरों-मंत्रियों से मिलते रहने वाले इन पत्रकारों को भी खुलासा करना पड़ता है कि उन्हें किनसे बात करनी है। ऐसे हालात में वे अफसर या मंत्री तक पत्रकारों से दूरी बना लिए हैं, जो पहले प्रेस फेंडली थे। इन सबके पीछे गुजरात मॉडल पर चल रहे पीएमओ का दबाव माना जा रहा है।

गुजरात में मुख्यमंत्री रहते हुए मोदी गांधीनगर में भी मीडिया से दूरी बनाये रहते थे। प्रधानमंत्री रहते हुए भी उस राह पर हैं। इसका प्रमाण है अब तक बतौर प्रधानमंत्री एक भी बार प्रेस कांफ्रेंस का आयोजन न करना। यह वही मोदी है जो इस पद पर पहुंचने से पहले तब के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को मौन मनमोहन सिंह करार देते थे। अब खुद मौन हो गये हैं। जिन्हें वह मौन मनमोहन सिंह करार देते थे, वह भी साल भर में दो बार प्रेस कांफ्रेंस करते थे। कभी भी प्रेस के सामने आने से पीछे हटे नहीं।

लोकतांत्रिक देशों की खासियत होती है कि उनकी सरकारों के रहनुमा प्रेस के जरिए अपनी सरकार की गतिविधियों से अपनी जनता को बराबर अवगत कराते रहते हैं। मोदी ने इस खासियत से जनता को मरहूम रखा है। हालांकि वे अपनी बात जनता तक पहुंचाने के लिए तीन तरीके अपनाये हुए हैं। वे हैं उनके ट्विटर हैंडल, नमो एप और मन की बात। ये तीनों वन-वे डॉयलाग के तरीके हैं। न सवाल, न ही जवाब। केवल एकालाप। ऐसा भी नहीं कि वह पूरी तरह मीडिया को इग्नोर किये हुए हैं। एक-दो फ्रेंडली चैनल्स से मुखातिब भी हुए हैं, पर स्वतंत्र मीडिया से पूरी तरह परहेज किये हुए हैं।

ऐसा भी नहीं है कि मोदी अपनी बातें जनता के बीच नहीं ले जाते। सब को पता है कि मोदी शब्दों के महारथी हैं। उनके इस हुनर से जनता चुनावी रैलियों-सभाओं के जरिए ओत-प्रोत होती रही है। चंद महीनों में आठ राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों के दौरान प्रचार के बीच उन्हें फिर सुनने का भरपूर मौका मिलेगा। अगले साल 2019 में जब आम चुनाव होंगे, तो उनके सम्बोधनों की जगह-जगह झड़ी लग जाएगी। हर जगह वह बोलते नजर आएंगे। अचरज, तो यही है कि वह चुनावी सभाओं में जनता से अपनी बातों पर हामी दर हामी भरवाते हैं, पर मीडिया को क्यों दरकिनार किये हुए हैं, जबकि यही मीडिया उनकी चुनावी सभाओं की बात जनता के बीच ले जाती है। उनकी यह प्रवृत्ति सांस्थानिक जवाबदेही के प्रति उपेक्षा दर्शाती है। इसे आरटीआई (इाइट टू इंफार्मेशन) के8‚ फीसदी वे आवेदन भी बयां करते हैं जिन्हें बिना किसी कारण प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा रिजेक्ट कर दिया गया। नि:संदेह दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के लिए इस कार्य पद्यति को शुभ संकेत नहीं माना जा सकता।

गुजरात मॉडल की छाया इस बार संसद के शीतकालीन सत्र पर भी महसूस की गई। शीत सत्र को इसलिए संक्षिप्त कर दिया गया था क्योंकि तब गुजरात विधानसभा के चुनाव हो रहे थे। और उस वास्ते प्रधानमंत्री मोदी समेत उनके कई मंत्री तूफानी प्रचार अभियान में लगे थे। वैसे सत्ता पक्ष ने विपक्षी कांग्रेस द्वारा इस बाबत अंगुली उठाये जाने पर कहा था कि पहले की सरकारों ने भी कई अवसरों पर संसद सत्रों को छोटा किया था। हकीकत जो भी हो, पर गुजरात के वे पत्रकार, जिन्होंने मोदी को बतौर मुख्यमंत्री रहते हुए कवर किया है, मानते हैं कि मोदी तब भी बमुश्किल विधानसभा सत्र कराते थे। सत्र के दौरान उपस्थिति भी कम ही होती थी। हालांकि जो बीत गया सो बीत गया। जाने-अंजाने हुई गलतियों-कमियों को नये साल में लोकतंत्र की मजबूती के लिए दूर किये जाने के लिए कदम उठाये जाने की दरकार है।

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