गुदगुदा रही है नरेश अग्रवाल की राजनीतिक पैंतरेबाजी

खबर तो बस यही है कि सपा नेता नरेश अग्रवाल सपा को त्यागकर बीजेपी में शामिल हो गए। क्यों शामिल हो गए बीजेपी में और क्यों त्याग दिया सपा को इसके जबाब में कहा जा रहा है कि समाजवादी पार्टी ने उन्हें फिर से राज्यसभा में नहीं भेजा इसलिए वे बीजेपी के साथ चले गए। क्या मान लिया जाय कि बातें सिर्फ इतनी भर है? अगर यही बात है तो यह कहा जा सकता है कि क्या नरेश अग्रवाल सिर्फ सांसद बने रहने की राजनीति करते रहे हैं? जो उन्हें सांसद बना दे उनके साथ चले जाएंगे? फिर यह भी सवाल है कि क्या वही एक नेता है जिनपर सपा यकीन करे और बाकी नेता सपा के लिए कुछ भी नहीं।

नरेश अग्रवाल के साथ तो कई और नेता राज्य सभा से विदा हो रहे हैं तो क्या यह भी मान लिया जाय वे सब सपा को त्याग देंगे? ये कुछ ऐसे सवाल है जो बहुतेरों को कुरेद रही है। हालांकि नरेश अग्रवाल कोई पहले नेता नहीं है जो सपा को छोड़ बीजेपी में गए हैं। यह सिलसिला आजादी के बाद से ही चलता आ रहा है। लेकिन एक बात साफ़ है कि ऐसे नेताओं की कोई विचारधारा नहीं होती। ऐसे नेताओं की राजनीति स्वार्थ पर टिकी होती है और उनकी सबकी सबसे बड़ी कमजोरी राजनीतिक सत्ता होती है। कल तक नरेश अग्रवाल सपा और नेता जी के विचारों को आगे बढ़ाते नहीं थक रहे थे अब अचानक उनकी राजनीति दूसरे विचारधार की राजनीति में कैसे फीट बैठ जायेगी। सच यही कि राजनीति पाखण्ड पर टिकी होती है और नेता दोहरे मापदंड वाले प्राणी होते हैं। वे कुछ भी कर सकते हैं और कोई भी विचार धारण कर सकते हैं।

लोग कहते हैं कि जया बच्चन को राज्यसभा भेजे जाने से नरेश अग्रवाल पार्टी से नाराज चल रहे थे। दूसरा सच ये भी है कि यूपी में एसपी के 47 विधायक हैं और वह केवल एक उम्मीदवार को राज्यसभा में भेजने की स्थिति में है। ऐसे में सपा क्या करे ? अग्रवाल जी को जबाब देना चाहिए था। लेकिन इसका जबाब अब उनके पास नहीं है। जो खबर मिल रही है उसके मुताबिक़, अग्रवाल साहब पिछले चार महीने से बीजेपी से सम्बन्ध जोड़ रहे थे। इस बारे में उनकी बीजेपी के कई नेताओं से बात चल भी रही थी। जानकारी यह भी मिल रही है कि नरेश अग्रवाल और बीजेपी के सम्बन्धो को जानकारी सपा प्रमुख को भी लग गयी थी। लेकिन राजनीति के दोनों खिलाड़ी वक्त का इन्तजार कर रहे थे। सोमवार को वही हुआ जिसकी कल्पना की गयी थी। नरेश अग्रवाल भाजपा का दामन थाम लिए। कल तक लोहिया को पढ़ रहे थे अब संघ और मोदी की राजनीति को आगे बढ़ाएंगे। बता दें कि दिल्ली स्थित भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय मुख्यालय में केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने नरेश अग्रवाल को औपचारिक रूप से सदस्यता ग्रहण कराई।

एक बात और। बड़ा सवाल है कि नरेश अग्रवाल आखिर किस विचारधारा के नजदीक सबसे ज्यादा हैं? इसका जबाब शायद ही इस देश के लोगों को मिले। ऐसे बहुत सारे नेता हैं जिनके बारे में शोधार्थी भी नहीं जान पाए कि उनकी विचारधारा क्या थी और राजनीति किसके लिए करते दीखते थे। नरेश जी सपा से पहले बसपा की राजनीति भी करते थे। कांशीराम और मायावती की जयकारे भी लगाते थे। इससे पहले वे एक अलग पार्टी भी चलाते थे, नाम था लोकतांत्रिक कांग्रेस। पार्टी कुछ कर नहीं पायी तो थक हार कर बसपा में चले गए थे। लेकिन असली बात यह है कि नरेश जी ने अपनी राजनीति की शुरुआत कांग्रेस से की थी। लम्बे समय तक कांग्रेस की राजनीति के वे वाहक रहे और हरदोई की जनता में छाए रहे। कांग्रेस से भी भंग हो गया। तब की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस थी जहां से उनकी राजनीति शुरू हुयी थी और आज की सबसे बड़ी पार्टी बीजेपी है जहां इनकी राजनीति अब शायद विराम ले ले। पार्टियों की ऐसी परिक्रमा नरेश जी को मुबारक हो।

नोट: अगर आपको यह खबर पसंद आई तो इसे शेयर करना न भूलें, देश-विदेश से जुड़ी ताजा अपडेट पाने के लिए कृपया The Lucknow Tribune के  Facebook  पेज को Like व Twitter पर Follow करना न भूलें... --------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- ---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
E-Paper