गुर्दा मरीजों में हारमोन थेरेपी की भूमिका की जांच करेगा पीजीआई

लखनऊ: संजय गांधी पीजीआई का नेफ्रोलॉजी विभाग क्रॉनिक किडनी डिजीज के मरीजों में सब क्लीनिकल हाइपोथारायडिज्म की स्थिति में हारमोनल थेरेपी की भूमिका का अध्ययन करेगा। लगभग 500 मरीजों पर शोध कर यह देखा जायेगा कि यह थेरेपी गुर्दा मरीजों में कितनी कारगर है। पीजीआइ के नेफ्रोलाजी विभाग के डॉ. नारायन प्रसाद बताते हैं कि थायराइड स्टिमुलेटिंग हार्मोन (टीएसएच) हारमोन का स्तर सामान्य रहने पर गुर्दे से फिल्टरेशन अच्छा होता है।

अध्ययन में बीएचयू, पीजीआई चण्डीगढ़ और कोलकाता पीजी कालेज के डॉक्टर शामिल होंगे।पीजीआई के वरिष्ठ नेफ्रोलॉजिस्ट डॉ. नारायण प्रसाद बताते हैं कि इस प्रोजेक्ट को इंडियन काउंसिल आफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) से मंजूरी मिल गई है। फण्ड मिलते ही कार्य योजना पर काम शुरू हो जायेगा। डॉ. प्रसाद बताते हैं कि इस कार्य योजना में पांच सौ गुर्दा मरीज, जिनमें सब क्लीनिकल हाइपोथारायडिज्म की परेशानी है। पर पर शोध होगा।

इलाज को मिलेगी नई दिशा डॉ. प्रसाद बताते हैं कि इस शोध में मरीजों में आधे को हारमोनल थिरेपी देकर देकर उनमें जीएफआर( ग्लूमर फिल्टरेशन रेट) देखा जाएगा। आधे मरीजों को प्लेसबो पर रखा जाएगा। प्रो. नरायन प्रसाद के मुताबिक यह शोध के मिले तयों के आधार पर सब क्लीनिकल हाइपोथायरडिज्म से ग्रस्त क्रानिक किडनी डिजीज के मरीजों में इलाज की नई दिशा तय होगी। सीकेडी के 20 से 30 फीसदी मरीजों में सब क्लीनिकल हाइपोथायरडिज्म की परेशानी देखी गयी है। इस शोध में तीन अन्य संस्थानों की भूमिका होगी।

इस शोध कार्य में करीब दो वर्ष का समय लगेगा।टीएसएच हारमोन का स्तर कई सीकेडी के मरीजों में पांच से दस के बीच होता है ऐसी स्थित को सब क्लीनिकल हाइपोथायरडिज्म कहते है। इस स्थित में सीकेडी के मरीजों हारमोन थिरेपी (एलाक्ट्राक्सिन) में कई बार नहीं दिया जाता है। इस शोध से तय होगा कि इस स्थित में हारमोन थिरेपी देने से फायदा होता या नहीं। इससे इलाज की नई दिशा तय होगी।

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