गौर के ठौर पर बैठने की जद्दोजहद में राजनेता

भाजपा के कार्यकर्ता महाकुंभ में 25 नवम्बर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पूर्व मुख्यमंत्री तथा गोविंदपुरा विधानसभा क्षेत्र से विधायक बाबूलाल गौर जब मंच पर मिले तो उनकी जो बॉडी लैंग्वेज थी उससे यह अंदाजा लगाया गया था कि गौर को एक बार और मौका मिलेगा। लेकिन उनकी सीट से भाजपा ने अभी तक कोई उम्मीदवार घोषित नहीं किया। पहली सूची में नाम न होने से गौर के समर्थकों को आशंका हो गयी कि गौर परिवार की उम्मीदवारी पर प्रश्‍नवाचक चिन्ह लग गया है। आनन-फानन में उनके समर्थक इकट्ठा हुए और गौर को नहीं तो उनकी पुत्रवधु कृष्णा गौर को टिकिट देने की मांग करने लगे तथा उन्होंने दबाव बढ़ाया कि यदि टिकिट नहीं मिलती है तो कृष्णा गौर निर्दलीय चुनाव लड़ें। श्रीमती गौर ने भी कह दिया कि गोविंदपुरा से उनके परिवार का लम्बा रिश्ता रहा है और वे यह सीट नहीं छोड़ेंगी।

इसके साथ ही उन्होंने यह संकेत भी दिया कि मौका आने पर वे निर्दलीय उम्मीदवार भी हो सकती हैं। जहां तक मोदी और गौर की तस्वीर का सवाल है तो संभवत: पहली बार प्रदेश के किसी नेता से इस प्रकार खिलखिलाकर मोदी मिले थे। उसी तस्वीर में प्रदेश भाजपा के संगठन महामंत्री सुहास भगत की जो भावभंगिमा है वह कुछ और ही दर्शाती है। उम्रदराज होने के आधार पर यदि गौर को उम्मीदवार नहीं बनाना था तो फिर उनकी पुत्रवधु कृष्णा गौर को स्थान दिया जा सकता था। वास्तव में गोविंदपुरा एक “हाटकेक“ सीट है जिस पर भाजपा के हर उस नेता की नजर है जो कहीं और से चुनाव जीत ही नहीं सकता। गौर से बड़ी गर्मजोशी से हाथ मिलाते हुए मोदी ने कहा था- गौर साहब एक बार और, इस पर गौर ने भी खिलखिलाते हुए कहा था बिलकुल। मोदी ने गौर की टिकिट को एक प्रकार से सार्वजनिक तौर पर उसी समय हरी झंडी दे दी थी, तब आखिर पेंच कहां उलझा है इसका उत्तर तो भाजपा नेतृत्व ही दे सकता है लेकिन हो सकता है कि वह उत्तर गले उतरने लायक न हो।

एक तरफ तो जिन विधायकों या मंत्रियों के टिकिट कटे उनके पुत्रों या परिवार वालों को तो टिकिट मिल गयी, जबकि वे सभी पैराशूट से उतरे थे। इसके विपरीत कृष्णा गौर जनता से निर्वाचित भोपाल की महापौर रह चुकी हैं और महिला मोर्चे में भी काफी सक्रिय रही हैं फिर भी उन्हें टिकिट देने से आखिर परहेज क्यों। गोविंदपुरा सीट का पेंच इसलिए उलझा है कि भोपाल के महापौर आलोक शर्मा की इस सीट पर नजर लगी हुई है, जबकि एक और दावेदार भाजपा के प्रदेश महामंत्री वी.डी. शर्मा भी यहां से चुनाव लड़ना चाहते हैं क्योंकि दोनों को दूसरा कोई सुरक्षित क्षेत्र नजर नहीं आ रहा है। गौर परिवार के अलावा किसी और को टिकिट देना है तो फिर संघ के समर्पित तपन भौमिक का दावा कहीं अधिक मजबूत है। ऐसा नहीं है कि गौर की टिकिट पर पहली बार कोई संकट आया है उमा भारती भी उनको गोविंदपुरा से टिकिट देने के पक्ष में नहीं थीं और उस समय सुषमा स्वराज ओर अटलबिहारी वाजपेयी ने उनकी टिकिट बचाई थी। देखने की बात यही होगी कि मोदी की बॉडी लैंग्वेज में गौर के लिए हरी झंडी छिपी हुई थी या नहीं।

सुबह सबेरे से साभार

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