‘चंबल’ के बीहड़ों में ‘अरावली’ की स्थापना से पिघलता ‘इको-सिस्टम’

कांग्रेस से भाजपा के नेता बने ज्योतिरादित्य सिंधिया के सुदर्शन और सजीले व्यक्तित्व में ’टाइगर’ की काली-पीली रेखाओं का उभार राजनीति में ऐसे खूंखार वायरस के संक्रमण का विस्तार है, जो लोकतंत्र की शालीनता के लिए प्राणलेवा साबित होने वाला है। लोकतांत्रिक मूल्य, सैद्धांतिक राजनीति और निष्ठाओं के तटबंधों को तोड़ने के बाद वो भाजपा के घाटों पर सत्ता का चरणामृत पीने की ओर अग्रसर हैं। अब सिंधिया भाजपा के राज्यसभा सदस्य हैं और मात्र सौ-सवा सौ दिनों में उन्होंने भाजपा में वो राजनीतिक-हैसियत हासिल कर ली है, जो अभी तक किसी भी ताजातरीन नेता को हासिल नहीं हो पाई थी।

कांग्रेस के साथ भी उनकी पंद्रह-बीस साल पुरानी राजनीतिक-यात्रा के ‘माइल-स्टोन’ काफी चमकीले रहे हैं। उनके दो दशकों के सियासी-सफर में बीता एक साल ही धुंधला रहा है, जबकि भाजपा के एक नामालूम से नेता ने उन्हें गुना संसदीय चुनाव में चौंकाने वाली मात दी थी। बहरहाल, कांग्रेस-भाजपा में उनके विरोधी तीरंदाजों के विप्लव और विलापों को पीछे छोड़ते हुए अब वो नए मुकाम के लिए निर्धारित अपने रोड मैप पर आगे बढ़ चले हैं। ज्योतिरादित्य सिंधिया के अगले सियासी सफर के मामले में राजनीतिक पंडितों के अपने अनुमान, आकलन और आशंकाएं है।

कांग्रेस मध्य प्रदेश में होने वाले चौबीस विधानसभा उपचुनावों के मद्देनजर उनका राजनीतिक मूल्यांकन कर रणनीति बना रहे हैं, जबकि भाजपा में सिंधिया की आमद पर एक अजीबोगरीब दहशतजदा सन्नाटा है। भाजपा में सिंधिया की आमद पर मची खलबली अभी शांत नहीं हुई है। भाजपा ने अपनी सबसे सघन, सक्रिय और सशक्त बटालियन की पॉलिटिकल परेड में एक ऐसे कमांडर को उतार दिया है, जिसके पैरों की धमक का अपना वजूद है। उसके कदमताल की अपनी लय, अपना तरीका और सलीका है। भाजपा का यह राजनीतिक प्रयोग ग्वालियर-चंबल संभाग के घने बागी बीहड़ों में अरावली की ऊंची पर्वत-श्रृंखलाओं को स्थापित करने जैसा उपक्रम है।

राजनीतिक पर्वतों की स्थापना के अपने नफा-नुकसान होते हैं, जिसका आकलन भाजपा में सिंधिया की आमद के पहले भी हुआ होगा और आने के बाद भी हो रहा है। हर पर्वत की अपनी तासीर और अपना ’इको-सिस्टम’ होता है। ज्योतिरादित्य सिंधिया का भी अपना ’इको-सिस्टम’ है, जो ऊपर से नीचे तक अपने तरीके से राजनीति की आबोहवा को नियंत्रित करता है। कांग्रेस में सिंधिया के ‘इको-सिस्टम’ को लेकर कोई विवाद या टकराव नहीं था, क्योंकि कांग्रेस काडर-बेस्ड पार्टी नहीं है। लेकिन भाजपा का अपना ’इको-सिस्टम’ है, जो सत्ता और समाज के हर कोने में मौजूद है। भाजपा के इको-सिस्टम का अपना प्रोटोकोल है, जिसे अभी तक पत्थर की लकीरों जैसे मजबूत माना जाता रहा है। सिंधिया की आमद के बाद पत्थर की लकीरों में पिघलन महसूस होने लगी है। कैबिनेट पुनर्गठन के घटनाक्रम इस पिघलन की ताकीद कर रहे हैं।सिर्फ भाजपा इको-सिस्टम में बदलाव की चुनौतियों से मुखातिब नहीं है।

इस मसले में सिंधिया की राजनीति भी दांव पर लगी है। इसका असर सिंधिया के राजनीतिक व्यक्तित्व में पसरने लगा है। सिंधिया जैसे प्रभावशाली वक्ता के सुरों में यह बदलाव उनकी मजबूरियों को रेखांकित करता है। सौ दिन पहले तक जो जुबान अपने शब्दों के तेजाब से नरेन्द्र मोदी, अमित शाह अथवा शिवराज सिंह चौहान के चेहरों पर फफोले पैदा करती थी, उसमें एकाएक चाशनी घोलना आसान नहीं हैं। वफादारी सिद्ध करने के अपने पैमाने होते हैं। भाजपा के प्रति वफादारी सिद्ध करने के लिए कांग्रेस के खिलाफ सिंधिया को अपने शब्दों के तेजाब को तेज करना पड़ेगा। उनके भाषणों में ’टाइगर जिंदा है’ कि एन्ट्री उसका सूचक है। ’टाइगर’ के बाद ’चील-कौए’ भी उनकी शब्दावली का हिस्सा बनने लगे हैं।शब्दों का यह स्तर सिंधिया की स्वाभाविक भाषण शैली का स्थायी भाव नहीं है। कांग्रेस में उनकी गिनती संसद के सबसे प्रभावी प्रखर वक्ताओं में होती थी। अपनी प्रस्तुति को वो तर्कों से गढ़ते थे। पिछले दो-तीन भाषणों में यह क्रम टूटता नजर आ रहा है।

टाइगर के रूप में उनकी प्रस्तुति की प्रभावशीलता पर कई सवाल उठ रहे हैं। एक सेनाधिकारी कर्नल शेरजंग ने शेरों की आवाजों का विवरण देते हुए 1967 में अंग्रेजी में एक किताब लिखी थी- ’ट्रिस्ट विद टाइगर्स’। शेरजंग प्रकृति प्रेमी तथा वनों और वन्य जीवों के आशिक थे। दिल्ली के राधाकृष्ण प्रकाशन ने इस पुस्तक का हिन्दी अनुवाद ’शेरों से मेरी मुलाकात’ नाम से 2002 में प्रकाशित किया था। शेरजंग लिखते हैं कि शेर अनेक प्रकार की आवाजें निकाल सकता है। वह कर्कश चीत्कार से लेकर ऊंची आवाज मे गरज भी सकता है। वह गुर्राता है और खुले दहाड़ता भी है। लेकिन संकटमय स्थितियों में सहसा घिर जाने के बाद क्रोध में उसकी ऊंची गुर्राहट में खांसने की आवाज मिल जाती है, जो उसकी गर्जना को कमतर कर देती है। सिंधिया को अपनी गर्जना की गुणवत्ता का ध्यान रखना होगा। सही है कि अपने पुराने संगी-साथियों के खिलाफ बोलने के लिए उन्हें नए मुहावरों की जरूरत होगी, लेकिन उसके एवज में उनकी भाषा में चील-कौए कांव-कांव करने लगें, यह भी मुनासिब नहीं हैं। अन्यथा लगेगा कि कांग्रेस से बेवफाई के बाद नई वफादारी की मजबूरियों में वो अपनी गुणवत्ता खो रहे हैं।

उमेश त्रिवेदी/सुबह सबेरे से साभार

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