चार साल यूँ ही गुजर गए अब लोकपाल की राजनीति

अखिलेश अखिल

सरकार अब लोकपाल गठन की तैयारी करती दिख रही है। लोकपाल का गठन होगा या नहीं लेकिन अब आगामी चुनाव को देखते हुए और किसान से लेकर अन्ना हजारे की धमक को भांपते हुए मोदी सरकार लोकपाल को लेकर कानाफूसी करती दिख रही है। अंजाम क्या होगा अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन इस पर राजनीति शुरू हो गयी है। कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे लोकपाल समिति की बैठक में जाने से मना कर दिया है। सरकार के निमंत्रण कजो टुकड़ा दिया है। खड़गे ने पीएम मोदी को पत्र लिखकर इस बैठक में शामिल होने से साफ़ इन्कार किया है।

उन्होंने अपने पत्र में कहा है कि विशेष आमंत्रण विपक्ष के स्‍वतंत्र आवाज को दबाने का संयुक्‍त प्रयास है जो महत्‍वपूर्ण भ्रष्‍टाचार रोधी वॉच डॉग के चयन के लिए की गई है। बैठक में ना जाने को लेकर खड़गे ने मीडिया से कहा कि मैं सिर्फ कांग्रेस नहीं बल्कि पूरे विपक्ष की आवाज हूं। यह बिल सरकार की तरफ से उपयुक्त इरादे, प्रतिबद्धता और निष्पक्षता की जरूरत को लगातार कमजोर करता है। भागीदारी के अधिकार के बिना बैठक में मेरी मौजूदगी महज आईवॉश होगा। उल्‍लेखनीय है कि चयनित लोकपाल को देश के शीर्ष अधिकारियों समेत प्रधानमंत्री और केंद्रीय मंत्रिमंडल के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच करने का अधिकार होगा।

आपको बता दें कि लोकपाल चयन समिति की बैठक बुलाई गई है, जिसमें मल्लिकार्जुन खड़गे को विशेष रूप से आमंत्रित किया गया था। इस बैठक में लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन, पीएम नरेंद्र मोदी और सीजेआई दीपक मिश्रा भी हिस्सा ले रहे हैं। ज्ञात हो कि लोकपाल के कामकाज के नियमों का मसौदा तैयार करने के लिए 15 जून तक का वक्त तय किया है।एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि 15 जून तक नियमों को अंतिम रूप देने के बाद मंत्रालय को सार्वजनिक पत्र और सरकार कानूनी दस्तावेज के जरिए अधिसूचना जारी करनी होगी। तब लोकपाल लागू हो सकेगा। गौरतलब है कि लोकपाल और लोकायुक्त कानून साल 2013 में दोनों सदनों (लोकसभा व राज्यसभा) की सहमति से पास हुआ था। पिछले चार साल से लोकपाल कानून सरकारी अधिकारियों की फाइलों में अटक कर रह गया है। इस बिल में साफ-साफ लिखा गया है कि भ्रष्टाचार से जुड़े हम मामले की जांच लोकपाल के जरिए होगी।

मोदी सरकार के करीब चार साल गुजर रहे हैं। पिछले चार साल से लोकपाल की मांग की जाती रही है। लेकिन पहले सरकार के लोग यह कहते जा रहे थे कि चुकी लोकपाल के गठन कमिटी में विपक्षी नेता का होना भी जरुरी होता है और अभी तक कोई मुख्य विपक्षी नहीं है इसलिए इसमें देरी हो रही है। बता दें कि पिछले लोक सभा चुनाव में कांग्रेस को मात्र 44 सीटें ही मिली थी और वह कानूनन मुख्य विपक्षी कहलाने के योग्य नहीं रही थी। लेकिन बाद में अदालत के निर्णय के बाद माना गया कि कांग्रेस इस बैठक में शामिल हो सकती है या नहीं भी होने पर लोकपाल का गठन किया जा सकता है। अब देखना होगा कि लोकपाल का गठन होता है या नहीं क्योंकि सरकार अब चुनावी मोड में जा चुकी है।

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