चिदंबरम के पीछे लगी है सारी सरकारी मिशनरी ,आखिर क्यों ?

अब 70-80 की दशक वाली राजनीति नहीं रही जब संसद के भीतर और बाहर सत्ता पक्ष के नेता ही सरकार के मंत्रियों पर जनविरोधी आचरण के आरोप लगाने से पीछे नहीं रहते थे। तब पार्टी के भीतर ही विरोधी खेमा होता था। तब संसद भी खूब चलती थी। जनता और देश के मसलों पर खूब बोला जाता था। संसद की कार्रवाइयों पर देश की नजरें भी लगी रहती थी। लेकिन अब ऐसा नहीं है। अब बिरले लोग ऐसे मिलेंगे जो अपनी पार्टी के खिलाफ कुछ बोलते नजर आते हों। जो खिलाफ गया उसकी राजनीति समाप्त कर दी जाती है।

आज की राजनीति बदले की राजनीति हो गयी है। चूंकि देश का मानस भ्रष्टाचार वाला है इसलिए जब भी कोई सरकार बदलती है ,पहला काम यह होता है कि उस सरकार की खबर ली जाए। उसको सताया जाय और जलील किया जाय ताकि जनता में यह सन्देश जाय कि शाम वाला भारी चोर और बेईमान था और हम ठहरे साधू संत। पूर्व वित्त मंत्री चिदंबरम के साथ कुछ इसी तरह की राजनीति चल रही है। दोनों बेटा -पुत्र राजनीति के शिकार होते दिख रहे हैं। कहा जा रहा है कि चुकी चिदंबरम सरकार में रहकर बीजेपी और संघ के नेताओं को परेशान किया था इसीलिए उन्हें भी परेशान किया जा रहा है।

सारी सरकारी मशीनरी आजकल पूर्व केन्द्रीय वित्त मंत्री पी. चिदम्बरम व उनके पुत्र कार्ति के पीछे पड़ी हुई है। चिदंबरम परिवार पर दो मामले से जुड़े केस दर्ज किये गए हैं। एक मामला है आई.एन.एक्स. मीडिया मामला जो 2006 से 2008 के समय के हैं। तब कांग्रेस की ही सरकार थी और पी. चिदम्बरम केन्द्रीय वित्त मंत्री थे। दूसरा मामला है 20:80 की सोने की आयात योजना से सम्बंधित। यह भी एक पुराना मामला है और अब तक इस संबंध में किसी पर भी कोई आरोप नहीं लगा था।मोदी सरकार आने के बाद यह मामला अचानक सामने आ गया।

सोना आयात मामला का खेल यह है कि 7 निजी कम्पनियों जिसमें मेहुल चोकसी की कम्पनी भी शामिल थी, को इस योजना अंतर्गत 15 मई, 2014 को पी. चिदम्बरम ने सोने के आयात की आज्ञा दी थी। उसके अगले दिन ही लोकसभा के चुनावों के नतीजों का ऐलान होना था। पी. चिदम्बरम को चाहिए था कि वह यह फैसला आने वाली अगली सरकार पर छोड़ देते। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने भी 20:80 सोना योजना संबंधी मामले में भ्रष्टाचार के कोई भी आरोप नहीं लगाए हैं।

इस योजना को मोदी सरकार ने उसी वर्ष अर्थात 2014 के नवम्बर महीने में रद्द करदिया था। अगस्त, 2013 में सोने के आयात पर पाबंदियां लगाई गई थीं क्योंकि करंट अकाऊंट डैफिसिट (सी.ए.डी.) 4.7 बिलियन डालर तक आ गया था। योजना यह थी कि ज्यूलर्स जितना सोना एम.एम.टी.सी./एस.टी.सी. से खरीदेंगे उसका 20 प्रतिशत हिस्सा आयात कर सकेंगे। तब सोने की इम्पोर्ट ड्यूटी 2 प्रतिशत से बढ़ाकर 10 प्रतिशत कर दी गई थी। ऐसा करने से सी.ए.डी. एक साल के अंदर ही 1.5 बिलियन डालर तक पहुंच गया।

आपको बता दें कि 15 मई, 2014 को चिदम्बरम ने प्राइवेट व्यापारियों को सोने के सीधे आयात की आज्ञा दी व इस संबंधी फाइल को एक दिन में ही 9 अधिकारियों ने क्लीयर किया था । अब ई.डी. व सी.बी.आई. रोजाना वित्तीय व गृह मंत्रालय की फाइलों पर पड़ी धूल को हटाने में लगी हुई हैं ताकि पी. चिदम्बरम के खिलाफ कोई पक्का सबूत प्राप्त हो सके। लेकिन अभी तक कोई पक्का सबूत मिला नहीं है। लेकिन जांच एजेंसियों पर भारी दबाब है।

ऐसा क्यों हो रहा है? सब राजनीतिक रंजिश से जुड़ा मसला है। संघ के एक प्रमुख नेता हैं एस. गुरुमूर्थि। उन्होंने संघ व सरकार को कहा है कि पी. चिदम्बरम को जरूर पकड़ा जाना चाहिए क्योंकि वह चिदम्बरम ही हैं जिन्होंने गृह मंत्री होते हुए बयान दिया था कि संघ एक भगवा दहशत है। गुरुमूर्थि की संघ परिवार में अच्छी पहचान है। गुरुमूर्थि के संघ में मौजूद व्यक्तियों ने कहा है कि मोदी सरकार ने किसी भी कांग्रेसी नेता को जेल में नहीं भेजा, चाहे वह राबर्ट वाड्रा हों या वीरभद्र सिंह। पी. चिदम्बरम के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की जाती जबकि उन्होंने भाजपा के प्रधान अमित शाह को जेल भिजवाया था व संघ की नेता साध्वी प्रज्ञा एवं अन्य के खिलाफ झूठे मामले दर्ज करवाए थे। इस पर अंतिम फैसला किया गया कि पी. चिदम्बरम के खिलाफ कार्रवाई की जाए क्योंकि वह कांग्रेस में एक आसान निशाना हैं।

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