जख्म अभी भरे नहीं

नई दिल्ली: तीन दशक पहले की वह काली रात आज भी सबको याद है। उस काली रात को याद कर शहरवासी सिहर उठते हैं मानो मौत का वह भयानक मंजर दोबारा न आ जाये। वह एक ऐसी पीड़ादायक रात थी जिसे आने वाले एक सौ साल तक भुलाना संभव नहीं है। जहरीली गैस का दुष्प्रभाव अभी भी पीड़ित झेल रहे हैं। मुआवजा से शारीरिक और आर्थिक नुकसान की भरपाई मुमकिन नहीं। गैस कांड के बाद एक पूरी पीढ़ी उसके दुष्प्रभावों को झेलते-झेलते युवा हो गयी। कई लोग तो अब इस संसार में नहीं हैं। वे बूढ़ी आँखें, जिनके जवान बेटे चले गए थे, वे बेसहारा होकर जीवन से संघर्ष करते रहे और महज जिंदा लाश बनकर रह गए। पिछली सदी की भीषणतम औद्योगिक त्रासदी के रूप में इतिहास के पन्नों पर अंकित गैस त्रासदी को लगभग 32 वर्ष बीत गए हैं लेकिन पीड़ितों के पुर्नवास तथा उपचार की समस्या अब भी उन्हें सताती है। मुआवजे के रूप में उनके जख्मों पर मलहम लगाने का प्रयास किया गया जो कि नाकाफी साबित हुआ। जख्म आज भी ताजा हैं। गुजरते समय के साथ उनकी पीढ़ा भी बढ़ती गयी। लम्बा समय गुजरने के बाद भी जो पीड़ित या प्रभावित हैं वे दर-दर भटक रहे हैं। उन्हें रहने के लिए न तो मकान मिला और न ही पेंशन या अन्य तरह की कोई मूलभूत सुविधा। प्रभावितों को रोजगार से जोड़ने की कोई योजना सामने नहीं आयी।

मिक गैस के दीर्घकालीन प्रभाव के कारण अब तक 30 हजार से अधिक लोग काल के गाल में समा चुके हैं। एक लाख से ज्यादा लोग विकलांग हो चुके हैं, वहीं एक लाख से ज्यादा आँख सहित अन्य गंभीर रोगों से पीड़ित होकर जीवन से संघर्ष कर रहे हैं। उनकी काम करने की क्षमता घटी है। जब यह भीषण घटना हुयी थी उसके बाद जहरीले रसायनों के कारण यूनियन कार्बाइड के आसपास की मिट्टी तथा भूजल के स्त्रोत भी प्रदूषित हो चुके थे। यूनियन कार्बाइड के आस-पास स्थित दस बस्तियों के लगभग बीस हजार से अधिक रहवासी हैडपंप के माध्यम से जहरीला पानी पीने को विवश थे। इस कारण एक तो जहरीली गैस का असर उन पर पहले से ही था लेकिन बाद में भी उनकी बीमारी बढ़ती गयी। गैस पीड़ितों के उपचार के लिए भोपाल के करोंद क्षेत्र में खाला गया भोपाल मेमोरियल चिकित्सालय भी सुविधाओं के अभाव में नाम मात्र के लिये चल रहा है। डॉक्टर यहाँ काम करना नहीं चाहते। उनका कहना है कि जाँच के लिए मशीनों का अभाव है। आँख का उपचार करने वाले संयंत्र अब पुराने हो गये उन्हें बदला नहीं गया। वहीं दवाईयों का अभाव भी अक्सर बना रहता है। गैस पीड़ितों के अधिकारों के लिये काम कर रहे संगठनों की शिकायत है कि भोपाल मेमोरियल अस्पताल का निर्माण भारत में यूनियन कार्बाइड की सम्पत्ति को बेचने से मिले धन 200 करोड़ रुपयों से किया गया था। किन्तु अस्पताल में रुपया देकर इलाज कराने वाले बाहरी मरीजों पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है और गैस पीड़ितों की उपेक्षा की जाती है।

इतिहास के पन्नों पर अंकित गैस त्रासदी की पीड़ा झेलने वाले लोग, विशेषत ऐसी विधवाओं के लिए जिनका पूरा परिवार उक्त दुर्घटना में मारा गया, वे बेसहारा हो गयीं। उनके आर्थिक पुनर्वास के लिए भोपाल के ही बैरसिया रोड स्थित हाउसिंग बोर्ड कालोनी में दो हजार चार सौ छियासी मकान निर्मित किए गए थे। दड़बेनुमा इन मकानों का निर्माण करते समय सीवेज एवं पीने के पानी की पाइप लाइनों में निकासी की उचित व्यवस्था नहीं की गयी, जिससे कहीं-कहीं सीवेज और पाइप लाइन मिल गयी हैं। विधवाएं गंदा पानी पीने को विवश हैं। एक तो वे पहले से ही अस्वस्थ हैं, इस प्रदूषण का भी उनके स्वास्थ्य पर अत्याधिक दुष्प्रभाव पड़ रहा है। इस कालोनी में निवासरत 65 वर्षीया रईसा बी के अनुसार नगर निगम उनसे पानी वितरण के लिए 250 रुपये प्रतिमाह ले रहा है। रोजगार उपलब्ध नहीं है, ऊपर से पानी के लिए 250 रुपए कहाँ से लायें। वे चाहती हैं कि उन्हें निशुल्क पेयजल उपलब्ध हो। यही कहना है 50 वर्षीया कुसुमलता का। गैस कांड में पति संतोष की मौत के बाद बेसहारा हो गयी कुसुम को कुछ दिन तो शासकीय मदद मिली, पर अब कोई खैर-खबर भी नहीं लेता। गैस पीड़ित विधवाओं को प्रतिमाह मासिक पेंशन मिलती थी, लेकिन अब वह भी बंद कर दी गयी है। गैस राहत विभाग ने रोजगार के लिए शेड इत्यादि बनाये थे, जहाँ अब ताला लगा है। रईसा बी और कुसुमलता ही नहीं, विधवा कालोनी की अनेक गैस पीड़ित महिलाओं ने इसी तरह अपनी समस्याएं सुनायीं।

गैस त्रासदी के बाद समय बीतता गया। एक सरकार बनती है, चली जाती है लेकिन गैस पीड़ितों की मुश्किलें कम नहीं हुयीं। आज आवश्यकता इस बात की अधिक है कि गैस पीड़ितों के आर्थिक पुनर्वास और चिकित्सा सुविधाओं को जुटाने के हर संभव प्रयास किए जाएं। अब तक अरबों रुपए गैस पीड़ितों के पुर्नवास पर खर्च करने के बाद भी स्थिति यह है कि जल, थल और वायु प्रदूषण का असर उनके शरीर पर स्पष्टत देखने को मिलता है। उक्त दिशा में जो कार्यक्रम मध्यप्रदेश सरकार ने चलाए थे वे पूर्णत असफल साबित हो चुके हैं।

वर्तमान स्थिति बड़ी दयनीय तथा चिंताजनक है। गैस पीड़ित तो उपचार से वंचित रह जाते हैं जबकि सम्पन्न लोग आसानी से चिकित्सा सुविधाएं प्राप्त कर लेते हैं। पीड़ितों के लिए बनायी गयीं आवास कालोनियां जर्मन यातना शिविरों से कम नहीं। विश्व की इस भीषणतम त्रासदी की पीढ़ा सह चुके कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्हें अब तक कोई राहत अथवा पुर्नवास नहीं मिला। वे उपयुक्त चिकित्सा सुविधा से भी वंचित रहे। ऐसे पीड़ितों की पहचान कर उन्हें यथोचित चिकित्सा सुविधा एवं पुर्नवास देने की नितांत आवश्यकता है।

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