जब दिल्ली तिहाड़ में कैदी नंबर 2265 थीं दुनिया की सबसे खूबसूरत महारानी, आखिर क्यों?

साल 1975 का वक्त और दिल्ली की तिहाड़ जेल में उस समय हर किसी की नजर उस चेहरे पर टिक गई थी, जिसे कभी वैग पत्रिका ने दुनिया के 10 सबसे खूबसूरत महिलाओं के तौर पर चुना था। महारानी के जेल में आने का इंतजार हर कोई कर रहा था। यह महारानी और कोई नहीं जयपुर की महारानी गायत्री देवी थी।

ग्वालियर रानी की महारानी राजमाता विजयराजे सिंधिया उस दौर में दो-दो राजघरानाओं के परिवार से ताल्लुक रखती थी। ऐसे में एक महारानी को जेल होने के पीछे का कारण था…प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा लागू की गई इमरजेंसी। सभी बड़े विपक्षी नेताओं के साथ-साथ विजयराजे सिंधिया भी गिरफ्तार हो गई थी, लेकिन विदेशी अखबारों की दिलचस्पी नेताओं की गिरफ्तारी से ज्यादा महारानी गायत्री देवी की गिरफ्तारी न थी।

राजमाता की आत्मकथा राजपथ से लोकपथ में इस बारे में विस्तार से लिखा गया है कि किस तरह आपातकाल के दौरान उन्होंने अपनी जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा तिहाड़ जेल में सामान्य कैदियों के साथ बिताया। इस किताब का 17 अध्याय आपातकाल शीर्षक से है, जबकि 18 अध्याय मैं सरकारी मेहमान और 19 वां अध्याय कैदी क्रमांक 2265। इन तीनों ही अध्याय में राजमाता गायत्री देवी के जेल में बिताए गए दिनों के बारे में बताया गया है। बता दें कैदी क्रमांक 2265 उनका कैदी नंबर था।

राजमाता ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि 3 सितंबर 1975 को जब उन्हें तिहाड़ जेल ले जाया गया, तो उन्हें एक कार्ड दिया गया जिस पर तारीख के साथ अंकित किया गया था कि उन्हें आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा उत्पन्न करने के कारण गिरफ्तार किया गया है।

इंदिरा गांधी और गायत्री देवी एक समय में एक साथ शांति निकेतन में पढ़ाई करते थे। दोनों के बीच पहचान थी। कूचबिहार के महाराज की बेटी गायत्री की शादी जयपुर के महाराज मानसिंह से हो गई। वह उनकी तीसरी पत्नी थी। गायत्री देवी की खूबसूरती के चर्चे देश नहीं बल्कि विदेशों में भी थे। विदेशी मैगजीन ने उनकी खूबसूरती के चलते उन्हें दुनिया की 10 सबसे खूबसूरत महिलाओं में गिना था।

इंदिरा गांधी की आंखों में गायत्री देवी उस समय खटकी जब लंदन में पली-बढ़ी गायत्री देवी कांग्रेस में शामिल होने के बजाय स्वतंत्र पार्टी की टिकट पर साल 1962 में लोकसभा चुनाव में खड़ी हुई। इस दौरान उन्होंने भारी मतों से जीत हासिल की। विदेशी अखबारों में इस दुनिया की सबसे बड़ी जीत बताया गया। इंदिरा गांधी के पिता नेहरू को भी कभी इतने वोट नहीं मिले थे। वह हर बार कांग्रेस के चुनाव में हार जाए करती थी। ऐसे में इंदिरा का चिढ होना स्वभाविक था।

संसद के गलियारों में इंदिरा गांधी पर उनकी टिप्पणी का जिक्र भी इस किताब में किया गया है। इंदिरा को लगने लगा था कि उन्हें गायत्री देवी को सबक सिखाना चाहिए। ऐसे में इमरजेंसी का मौका उनके लिए काफी था। एमरजेंसी का मौका देखकर उन्होंने गायत्री देवी को तिहाड़ जेल भेज दिया। गायत्री देवी ने तिहाड़ जेल में साढे 5 महीने बिताए। उनके इन 5 महीनों को लेकर इस किताब में कई बातें लिखी गई है। गायत्री देवी को एक जेल कैदी की तरह जीवन व्यतीत करना पड़ा था। सभी के साथ एक ही शौचालय का उपयोग करना पड़ा, जहां नल भी नहीं था। जमीन में एक सुराग था, जिसमें जेल का स्वीपर दिन में दो बार आके एक बाल्टी पानी डाल दिया करता था।

गायत्री देवी को इस दौरान लो ब्लड प्रेशर की समस्या थी। इसलिए उन्हें आमलेट आदि प्रोटीन वाला खाना मिल जाता था। उनकी एक तरफ महिलाओं की सेल और दूसरी तरफ राजनीतिक मर्द कैदियों की। महिलाओं की सेल में जहां वेश्याएं चिल्लाती थी तो वही दूसरी तरफ कैदी अक्सर देशभक्ति का गाना गाते। ऐसे में उन्होंने अपनी आत्मकथा द प्रिंसेस रिमेंबर्स में लिखा कि- तिहाड़ जेल उनके लिए एक मच्छी मार्केट था जो कुछ शुद्र चोरों और वेश्याओं की चीक से भरा हुआ है।

गायत्री देवी की हालत को देखते हुए उनके परिवार और करीबियों ने उन्हें राजनीति से संन्यास लेने की सलाह दी। साथ ही सभी ने दबाव बनाते हुए कहा कि इमरजेंसी और इंदिरा के 20 सूत्रीय कार्यक्रम को समर्थन देने वाले पत्र पर हस्ताक्षर कर दो…छूट जाओगी। लेकिन उन्होंने किसी की बात नहीं मानी और हर बार मना कर दिया। वही यह प्रस्ताव लेकर पांचवीं बार जब उनकी बहन आई तो उन्हें साइन करना पड़ा। ऐसे में जनवरी 1976 में उन्हें पेरोल पर ऑपरेशन के लिए बाहर भेजा गया, हालांकि इसके बाद माउंटबेटन ने भी उनके लिए इंदिरा गांधी से बात कर उनकी रिहाई की बात की।

thehindutimes.in से साभार

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