जस्टिस लोया प्रकरण की सुई अमित शाह से आगे तक जाती है—-

अखिलेश अखिल


नई दिल्ली : सबसे पहला सवाल तो यही कि सीबीआई क्या है ? सरकारी तंत्र ही न। सत्ता संविधान के तहत स्थापित एक स्वतंत्र जांच एजेंसी। लेकिन सरकार से बाहर नहीं। और इस जांच एजेंसी को चलाने वाले प्रमुखों का इतहास भूगोल खंगालिए तो इनमे से बहुतों की कार्य शैली पर घिन आती है और उनके चेहरे दागदार ही नजर आते हैं। 70 साल की आजादी के बाद इस जांच एजेंसी की तमाम जांच रपटों पर भी नजर डालें तो उनमे भी अधिकतर जांच रपट या तो बेकार साबित हुए हैं या फिर अपने आका के इशारे पर घोर मठ्ठा किया हुआ ही जान पड़ता है। साफ़ है की हमारी जांच एजेंसी दूध की धूलि नहीं। यह वही करती रही है जो सरकार में बैठे लोग चाहते रहे हैं।

कांग्रेस से लेकर बीजेपी तक की सरकार के इशारे पर सीबीआई नर्तन करती रही है। इधर सुप्रीम कोर्ट से चार जजों ने जिस तरह से नाखुशी जाहिर कर देश के सामने अपनी बाते रखने की कोशिश की है उसे कही से गलत नहीं कहा जा सकता। याद रखिये उस नाखुशी में जज लोया की मौत से जुडी जांच प्रक्रिया से जुड़े मुद्दे भी शामिल रहे हैं। लेकिन सीबीआई की मुंबई अदालत ने जिस तरह से जज लोया की मौत के बाद सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ मामले को चलता किया ,कई गंभीर सवाल खड़े करते हैं। यह बात और है अब सुप्रीम कोर्ट जाकर जज लोया की मौत की जांच कर रहा है लेकिन सीबीआई ने सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ मामले से बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह को डिस्चार्ज किये जाने के बाद कोई अपील की कोशिश तक नहीं की। जबकि सीबीआई अक्सर ऐसा करती रही ताकि उसकी जांच पर उंगुली नहीं उठ सके।

इधर पिछले महीनो में जब जज लोया की मौत और सोहरबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ मामले की जांच कर रहे जज लोया के बारे में उनके पिता और बहन के बयान की कहानी सामने आयी तो भूचाल मच गया था। जब सुप्रीम विवाद के बाद फिर से लोया की मौत की जांच का मामला सामने आया तो तुरंत जज लोया के पुत्र अनुज मीडिया के सामने प्रकट हुए और कहा कि उनके पिता की मौत पर राजनीती नहीं होनी चाहिए। उनकी मौत हार्ट अटैक से ही हुयी है। गजब की कहानी है। जाहिर है इस मामले में बहुत कुछ लोचा है और इसकी जांच होनी चाहिए ताकि सबकुछ साफ़ हो जाए।

जज लोया के दोस्त ने कहा, उनकी मौत पूर्व नियोजित हत्या है। सोहराबुद्दीन शेख एनकाउंटर मामले की सुनवाई करने वाले सीबीआई जज बृजगोपाल लोया की ‘संदिग्ध’ परिस्थितियों में मौत पर कानूनविदों और पत्रकारों ने सोमवार 15 जनवरी को दिल्ली में सभा कर मामले की जांच मांग की। कार्यक्रम में जज लोया की मौत पर पहली रिपोर्ट करने वाले द कारवां के पत्रकार निरंजन टाकले, लोया के कॉलेज के दोस्त उदय गवारे और बॉम्बे हाईकोर्ट के पूर्व जस्टिस बीजी कोल्से पाटिल के साथ सुप्रीम कोर्ट की वकील इंदिरा जयसिंह भी शामिल हुईं।

इन सभी ने मामले को संवेदनशील और न्यायपालिका की प्रतिष्ठा का सवाल बताया।ज्ञात हो कि लोया की मौत 1 दिसंबर 2014 को नागपुर में हुई थी, जिसकी वजह दिल का दौरा पड़ना बताया गया था। वे नागपुर अपनी सहयोगी जज स्वप्ना जोशी की बेटी की शादी में गए हुए थे। बीते नवंबर में द कारवां पत्रिका में जज लोया की बहन और पिता के हवाले से छपी एक रिपोर्ट में उनकी मौत से संबंधित संदिग्ध परिस्थितियों पर सवाल उठाया गया था। यह रिपोर्ट निरंजन टाकले की जज लोया की बहन और पिता से बातचीत पर आधारित थी। निरंजन से बातचीत में जज लोया की बहन अनुराधा बियानी ने कहा था कि उनके भाई से मनचाहा फैसला देने के लिए उन्हें बॉम्बे हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस मोहित शाह द्वारा 100 करोड़ रुपये का प्रस्ताव दिया गया था।

टाकले ने बताया कि जब उन्होंने जज लोया के अनुज से बात करने की कोशिश की तो जज लोया के पिता ने कहा कि ये किसी से बात नहीं करता और इसे किसी पर भी भरोसा नहीं है। न मीडिया, अदालत न ही सरकार पर। टाकले ने कहा, ‘अनुज को परिवार की तरफ से बोलने के लिए अब किसने कहा। पहले तो वो कुछ भी नहीं बोल रहा था और एक पत्र भी लिख चुका था। उसके मीडिया में आकर बयान देने से ऐसा नहीं है मामला ख़त्म हो गया, बल्कि अब और सवाल खड़े हो गए हैं। पहले के सवाल भी है, लेकिन अब और ज्यादा प्रश्न है, जिसका उत्तर तब ही मिल सकता है, जब मामले की सही से जांच हो और सच सबके सामने आए। ’

इसी प्रेस कॉन्फ्रेंस में लातूर बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष उदय गवारे ने जज लोया की मौत को संदिग्ध बताया और कहा उन्हें यकीन है कि यह पूर्वनियोजित हत्या है। उन्होंने बताया, ‘जिस दिन लोया का निधन हुआ, उसी दिन कई न्यायाधीशों सहित कई लोगों ने मुझे कहा कि लोया को धोखा दिया गया है। यह मामला इतना संवेदनशील था कि कोई भी शिकायत दर्ज करने की हिम्मत नहीं करता। अब मुझे लगता है, हमें इतना डरना नहीं चाहिए था. लोया की मृत्यु एक पूर्वनियोजित हत्या थी।

’सोहरबुद्दीन फ़र्ज़ी एनकाउंटर मामले पर उदय ने कहा, ‘उस मामले में 10,000 हजार पन्नों चार्जशीट थी और लोया बिना पढ़े फैसला नहीं देना चाहते थे इसलिए उन्होंने अध्ययन कर आगे बढ़ने का फैसला किया, लेकिन उनके बाद जो जज गोसावी आए उन्होंने इतने पन्नों की चार्जशीट 15 दिनों के भीतर पढ़कर फैसला सुना दिया। ’ उदय ने कहा, ‘बेहद सामान्य परिवार से आने के बाद वो इतने बड़े पद पर पहुंचे। उन्होंने मौत को गले लगाया, लेकिन ईमान नहीं बेचा। मुझे उन पर गर्व है। ’ उदय का कहना है कि पूरा सिस्टम ख़राब है। जिला अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक में गड़बड़ियां हैं। कोई इस पर बात नहीं करना चाहता है, लेकिन अब लोग बोल रहे हैं और बोलते रहना होगा।

द कारवां के पॉलिटिकल एडिटर हरतोष सिंह बल भी इस कार्यक्रम में शामिल थे. उन्होंने बताया कि जब एक जज की मौत पर प्रश्न खड़ा होने लगे और उसकी जांच न हो यह बिल्कुल भी स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। खासकर तब जब वो व्यक्ति सोहराबुद्दीन एनकाउंटर जैसा मामला देख रहा हो, तो बिल्कुल भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। हरतोष ने कहा कि राडिया टेप यूपीए काल में काला दाग था, उसी प्रकार लोया की मौत भी राजग के शासन काल में काले दाग के रूप में सामने आया है। उन्होंने बताया कि यूपीए काल में लोकतंत्र के चारों स्तम्भों में से न्यायपालिका बच गया था, लेकिन मौजूदा सरकार में न्यायपालिका भी बच नहीं पाई।

उन्होंने कहा, ‘सोहराबुद्दीन एनकाउंटर मामले के ट्रायल पर पहुंचने से पहले आपको 2002 मुस्लिम विरोधी दंगों को देखना होगा और यह कड़ी वहीं से जुड़ी है। इसकी शुरुआत राज्य के गृहमंत्री हरेन पंडया की मौत से हुई क्योंकि वो व्यक्ति सब जानता था कि 2002 दंगों में प्रशासन की क्या भूमिका थी। उनकी मौत के पर आज भी सवाल हैं। इसके बाद सोहराबुद्दीन और तुलसीराम प्रजापति की मौत और फिर जज लोया की मौत, जो और भी महत्वपूर्ण है। इन सब के मौत पर सवाल कायम है। अदालत अगर इन मामलों में न्याय नहीं दे सकती तो लोकतंत्र के मूल्यों पर सवाल खड़ा हो जाएगा। ’

बॉम्बे हाईकोर्ट के पूर्व जस्टिस बीजी कोल्से पाटिल ने लोया की मौत की जांच को पूरे न्यायपालिका की प्रतिष्ठा की बात बताई। उन्होंने बताया कि न्यायपालिका की इज्जत दांव पर लगी है जिसे सभी को और अदालत को मिलकर बचाना है। कोल्से पाटिल ने कहा कि आज भी देश में डर का माहौल बना हुआ है और लोया की मौत दरअसल संदेश था, उन तमाम जजों को कि यह तो 100 करोड़ ले लो या मर जाओ. यह मामला बहुत कुछ खोल सकता है। उन्होंने कहा कि ऐसे संदिग्ध मौत की जांच खुद सरकार को करवाना चाहिए और सरकार को क्या तकलीफ है जांच करवाने में। पाटिल ने कहा, ‘जैसे सीता को अग्निपरीक्षा देनी पड़ी थी, उसी प्रकार न्यायपालिका को भी अग्निपरीक्षा देनी होगी और अपनी ईमानदारी साबित करनी होगी। ’ सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ वकील इंदिरा जय सिंह ने सुप्रीम कोर्ट जस्टिस अरुण मिश्रा को लोया की मौत का मामला मिलने पर सवाल खड़ा करते हुए कहा कि उनका पुराना इतहास है कि उन्होंने गुजरात सरकार के पक्ष में फैसला दिया है, जो 20 साल से ज्यादा समय से सत्ता में है.

इधर पूर्व आईपीएस बीएन राय ने एक आलेख के जरिये कई सवाल खड़ा किया है। उनका कहना है कि क्या जज लोया को इसलिए मरना पड़ा कि उन्हें बदला नहीं जा सकता था? उनसे पूर्व सोहराबुद्दीन फर्जी पुलिस मुठभेड़ की सुनवाई करने वाले सीबीआई जज को, जो अमित शाह की अदालत के सामने उपस्थिति पर जोर दे रहा था, बदल दिया गया था। ऐसे में लोया को भी बदलने का मतलब बेवजह सर्वोच्च न्यायालय का ध्यान इस न्यायिक फर्जीवाड़े की ओर खींचना होता।

सुप्रीम कोर्ट का निर्देश था कि पूरे मामले की सुनवाई पूरी होने तक सीबीआई जज को बदला न जाये। लिहाजा लोया को बदलने के बजाय उन्हें खरीदने की कोशिश हुयी। और, अंततः, उनकी अकाल मृत्यु ने अवसर दिया कि एक लचीले जज को लगाकर अमित शाह को ‘डिस्चार्ज’ करा लिया गया। लोया और उनके पूर्ववर्ती जज उत्पट, दोनों अमित शाह की सीबीआई कोर्ट में उपस्थिति पर जोर क्यों दे रहे थे? और क्यों अमित शाह उनके समक्ष आने से बच रहे थे? क्योंकि मामला ‘चार्ज’ लगाने के लिए लंबित था। न्यायिक प्रक्रिया के अनुसार ‘चार्ज’ लगाने के समय अभियुक्त को अदालत में होना चाहिए। यदि उत्पट और लोया अमित शाह की उपस्थिति पर जोर दे रहे थे तो इसका मतलब यही था कि वे शाह पर ‘चार्ज’ तय करने जा रहे थे।

लोया की मृत्यु के बाद आये लचीले जज ने लोया को ‘डिस्चार्ज’ करते हुए यहाँ तक टिप्पणी की कि अमित शाह को राजनीतिक कारणों से मामले में फंसाया गया लगता है। कमाल है, न सीबीआई की चार्जशीट में किसी राजनीतिक आयाम का जिक्र आया था और न अदालती कार्यवाही अभी उस स्टेज पर पहुँची थी कि किसी गवाही या दस्तावेज से इस तरह की टिप्पणी का औचित्य बनता। इस जज का व्यवहार ही संदेहास्पद नहीं है, स्वयं सीबीआई का रवैया भी घोर आश्चर्यजनक रहा। अब तक सीबीआई सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की निगरानी वाली एजेंसी हो चुकी थी। उन्होंने अमित शाह के ‘डिस्चार्ज’ के विरूद्ध अपील न करने का निर्णय लिया। इतने बड़े मामले में, जिसमें सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप हो चुका हो, सीबीआई का अपील न करने का निर्णय अभूतपूर्व ही कहा जाएगा।

अहम सवाल है, स्वयं सुप्रीम कोर्ट तब क्या कर रही थी? एक पूर्णतया गलत न्यायिक आदेश से अमित शाह को ‘डिस्चार्ज’ किया गया और जांच एजेंसी सीबीआई अपील करने से भी मना कर रही थी, वह भी उस मामले में जो सुप्रीम कोर्ट के आदेश से सीबीआई को दिया गया था- सुप्रीम कोर्ट क्यों सोती रही? जज लोया की अकस्मात् मौत को लेकर हुयी पेटीशन ने आज सुप्रीम कोर्ट को भी दो फाड़ कर दिया है। यह चमत्कार कर पाना अकेले अमित शाह के बस का नहीं। न सीबीआईको इस कदर उल्टा नाच नचाना ही। दरअसल,सोहराबुद्दीन की हत्या के समय जो राजनीतिक सत्ता समीकरण गुजरात राज्य में सत्ता पर काबिज था, वही आज केंद्र में एकछत्र बना हुआ है। इस समीकरण का बस एक छोर हैं अमित शाह! दूसरा और महत्वपूर्ण छोर स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं।

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