जानिए सोशल मीडिया हब के बारे में जिससे सरकार ने यूटर्न ले लिया

दिल्ली ब्यूरो: मोदी सरकार ने मीडिया को बाँधने की तैयारी तो कर ली थी लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा नहीं होने दिया। सरकार चाहती थी कि सोशल मीडिया को पूरी तरह से अपने नियंत्रण में रखे ताकि विरोधियों की पहचान की जा सके और उसे सबक सिखाया जा सके। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उसकेइस मनसूबे पर पानी फेर दिया। और फिर केंद्र सरकार ने सोशल मीडिया पर निगरानी के लिए सोशल मीडिया हब बनाने के फैसले से यू-टर्न ले लिया है। सरकार ने साफ करा दिया है कि वह अब सोशल मीडिया हब बनाने के प्रस्ताव वाली अपनी अधिसूचना को वापस ले रही है।

आखिर सरकार चाहती क्या थी ? क्या था सोशल मीडिया हब ? आइये जानते है इसके बारे में। दरअसल ,सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने सोशल मीडिया हब बनाने का निर्णय लिया था।सोशल मीडिया एक ऐसा माध्यम है जो सरकार की पकड़ में अब तक नहीं आ रहा था। जिसे देखते हुए सूचना और प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले उपक्रम बेसिल ने 25 अप्रैल 2018 को एक टेंडर सोशल मीडिया कम्युनिकेशन हब नाम से जारी किया।यह टेंडर सोशल मीडिया एनालिटेकल टूल के लिए था।

इस टूल के माध्यम से एजेंसी आपके द्वारा भेजी गई सभी ईमेल, उनके अटेचमेंट को पढ़ सकती थी। वह फेसबुक, ट्विटर, यूट्यूब, गूगल प्लस, इंस्टाग्राम, लिंक्डइन और प्ले स्टोर पर नजर रख सकती थी। इसमें प्रयोगकर्ता के प्रत्येक अकाउंट पर नजर रखना व्यक्ति के अतीत में किए गए कमेंट, लेखों, भेजी गई मेल का भी अध्ययन करना शामिल था। इसके जरिए उस व्यक्ति का पूर्ण प्रोफाइल तैयार किया जा सकता था। यह सरकार को बता सकता था कि अब कौन सी खबरें किस मीडिया में चल रही हैं। सरकार की किस योजना पर लोगों की क्या प्रतिक्रिया है। यह सरकार को यह सुझाव दे सकता था कि किस तरह की खबरें चलाने से या जानकारी देने से खबरों के इस प्रभाव को बदला जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद केंद्र सरकार सोशल मीडिया हब बनाने के फैसले से अपने हाथ खींच लिए हैं। इस साल 13 जुलाई की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यह निगरानी राज बनाने जैसा है। सरकार सोशल मीडिया के संदेशों को टेप करना चाहती थी। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट ने दो हफ्ते का समय दिया था। केंद्र ने शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया था कि उसने सोशल मीडिया हब बनाने वाला टेंडर वापिस ले लिया है। मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, जस्टिस ए एम खानविलकर और जस्टिस धनन्जय वाई चन्द्रचूड़ की तीन सदस्यीय पीठ तृणमूल कांग्रेस की विधायक महुआ मोइत्रा की याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसमें आरोप लगाया गया था कि केंद्र की सोशल मीडिया हब नीति का नागरिकों की सोशल मीडिया गतिविधियों पर निगरानी रखने के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाएगा।

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