जिग्नेश के अभ्युदय से डरीं मायावती!

भारत सिंह

लखनऊ। कड़क प्रशासन देने के लिए जानी जाने वाली बसपा प्रमुख मायावती यानी बहन जी को भी डर लगता है। उनमें यह डर प्रशासनिक क्षेत्र से नहीं, बल्कि राजनीतिक तौर पर समाया हुआ है। पिछले पांच साल से राजनीतिक रूप से अधोमुख बहन जी का यह डर खुद उनके मुख से निकला। इस डर को उन्होंने सीधे-सीधे सरेआम तो नहीं किया, पर जिस लहजे में वह गुजरात से पहली मर्तबा विधायक बने दलित युवा नेता जिग्नेश मेवाणी को लेकर बातें कर रही थीं, उससे यही ध्वनित हो रहा था कि वह तेजी से दलित समाज में अहम स्थान बनाने की कोशिश में लगे जिग्नेश को अपनी दलित राजनीति के लिए खतरा मान रही हैं।

बसपा प्रमुख ने गुजराती दलित युवा नेता की चमक में बताया था कांग्रेस का हाथ

बसपा के जन्मदाता स्वर्गीय कांसीराम के पद चिन्हों पर चलने वाली मायावती का यह खौफ उनके ६२वें जन्म दिन पर लखनऊ में सामने आया। इस शुभ अवसर पर उन्होंने दलित राजनीति में जिग्नेश के उभार को सकारात्मक तौर पर नहीं देखा। इसके पीछे उनका नजरिया नकारात्मक था। नकारात्मक इसलिए क्योंकि जिग्नेश कांग्रेस की उपज नहीं हैं। जिग्नेश की राजनीतिक पैदाइश गुजरात का ऊना कांड है। और बहन जी उनकी उपज के पीछे कांग्रेस का हाथ देखती हैं। सच तो यह है कि कांग्रेस ने गुजरात चुनाव के दौरान भरसक कोशिश की थी कि जिग्नेश उनकी पार्टी की सदस्यता कबूल कर लें। लाख प्रयास के बावजूद कांग्रेस जब जिग्नेश को अपने पाले में नहीं ला सकी, तो वह खुद ही इस युवा नेता को सपोर्ट करने के लिए बाध्य हो गईã। बेशक, जिग्नेश को सपोर्ट करने के पीछे कांग्रेस का मकसद व्यापक तौर पर दलित समाज का राजनीतिक लाभ उठाने का ही था।

बसपा प्रमुख का यह कहना कि कांग्रेस ही नहीं, जिग्नेश को विधायक बनाने में पाटीदारों के उभरते हुए राजनीतिक सितारे हार्दिक पटेल का भी हाथ रहा, तो इसे भी सच नहीं कहा जा सकता, क्योंकि सर्वविदित है कि जिस तरह अपने समाज के युवा तबके में हार्दिक सिरमौर बनते दिखे थे, उसी तरह जिग्नेश भी अपने समाज के राजनीतिक युवराज बनकर कम-से-कम गुजरात में तो उभरे ही थे। और, इसी उभार का फायदा कांग्रेस लेना चाहती थी। उसने इसी वास्ते हार्दिक को भी कांग्रेसी बनाना चाहा था, लेकिन कांग्रेस इसमें भी नाकाम हुई थी। अलबत्ता हार्दिक ने अपने लिए भविष्य की गुंजाइश रखते हुए महज कांग्रेस को अपना समर्थन भर दिया था। इन दो युवा नेताओं की तरह पिछड़ों में युवा नेता अल्पेश ठाकोर भी उभरे थे। ठाकोर को कांग्रेस अपने पाले में लाने में कामयाब हो गई थी। एक तरह से कांग्रेस के साथ तीन युवा नेता प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर खड़े जरूर हो गये थे, लेकिन ये तीनों अपने-अपने बूते ही अपने गृह राज्य गुजरात में छाये थे। ये सब कांग्रेस के साथ इसलिए खड़े हुए थे ताकि भाजपा की लगातार छठवीं बार सरकार न बनने पाये। इन तीनों युवाओं की मजबूत तिकड़ी का फायदा कांग्रेस को उठाते हुए देखकर भाजपा ने इस जोड़ को अपने रास्ते से हटाने के लिए ही कांग्रेस को जातीय राजनीति के कठघरे में खड़ा किया था।

हकीकत यह है कि जिग्नेश ऊना कांड से उभरे, गुजरात चुनाव में कांग्रेस की जरूरत बने

बसपा प्रमुख को जिग्नेश से यह दिक्कत नहीं है कि एक और दलित विधायक बन गया, बल्कि दिक्कत यह दिख रही है कि जिग्नेश इन दिनों दलितों का बड़ा नेता बनने की राह पर कदम बढ़ा रहे हैं। गुजरात में तो जिग्नेश ने छाप छोड़ी ही छोड़ी है, नये साल के शुरू में ही उनका महाराष्ट्र के भीमा कोरेगांव घटना के परिप्रेक्ष्य में एकाएक सुर्खियां बन जाना भी उनकी राजनीतिक बढ़त को दर्शाता है। भीमा कोरगांव की ऐतिहासिक पृष्ठिभूमि में दलितों के विजय की दास्तां का बखान है। यह बखान हर दलित को लुभाता होगा, चाहे वह महाराष्ट्र का हो या देश के किसी में कोने में ही क्यों न रह रहा हो। ऐसे में इससे किसी राजनीतिक शख्स के जुड़ाव का परिदृश्य व्यापकता दे ही देता है।

इसी आईने में शायद जिग्नेश ने खुद को देखा और समय गंवाये बिना उस घटना के बाद ही दिल्ली का रुख कर लिया था। रैली की इजाजत न मिलने के बावजूद जिग्नेश ने अपनी बात देश की राजधानी से पूरे देश में फैला दी थी। जिग्नेश ने वहां कई सवाल ठोंके लेकिन अहम बात यह कि उन्होंने चंद्गशेखर रावण की बाबत जुबान खोलकर उत्तर प्रदेश के दलितों का ध्यान भी अपनी ओर आकर्षित कर लिया। जिग्नेश ने न केवल चंद्गशेखर की रिहाई की मांग उठाई थी बल्कि जेल में भी उससे मिलने की कोशिश की थी। हालांकि वह मुलाकात करने में कामयाब नहीं हो सके थे। उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में दलित बनाम सवर्ण के बीच हुए संघर्ष के दौरान चंद्गशेखर सुर्खियां बना था। उस वक्त सोशल मीडिया पर एक वर्ग में वह कई दिनों तक बना रहा।

भीमा कोरेगांव प्रकरण से आये सुर्खियों में, दिल्ली में चंद्गशेखर रावण पर पहली बार बोले

राजनीतिक गलियारों में चर्चा तो यही है कि मायावती को जिग्नेश का चंद्गशेखर रावण की तरफ झुकाव ही नागवार गुजरा है। उत्तर प्रदेश ही तो वह राज्य है जिसने मायावती को न केवल मुख्यमंत्री पद पर बिठाया था, बल्कि उच्च सदन में भी सुशोभित किया था। स्वाभाविक ही प्रतीत होता है कि और भी कोई दलित नेता उत्तर प्रदेश के दलितों का नेता बनने का मंसूबा पालेगा, तो मायावती को अखरेगा ही। शायद इसी लिए मायावती ने जिग्नेश को राजनीतिक वाक्पटुता के जरिए कांग्रेस के खेमे में डालकर भविष्य में खुद की राजनीति पर पड़ने वाले मेवाणी के असर को अभी से ही भोथरा कर देना चाहती हैं।

चंद्गशेखर के पक्ष में बोलने के चलते ही मायावती में समाया राजनीतिक जमीन खिसकने का खौफ

राजनीति में दिलचस्पी रखने वालों का यह भी आकलन है कि जिग्नेश बड़ी सूझ-बूझ के साथ राष्ट्रीय राजनीति के फलक पर अपने कदम रोपने के प्रयास में लगे हैं। जिग्नेश ने शायद मौजूदा समय में टॉप दलित नेताओं के बारे में थाह ले ली है कि मायावती, रामविलास पासवान, रामदास अठावले, उदित राज, यहां तक कि संविधान निर्माता बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर के पोते प्रकाश अंबेडकर ही क्यों न हों, इनमें से किसी में पहली जैसी धार नहीं बची है। इसी आकलन पर संभवत: जिग्नेश दलित समाज में अपने लिए बड़ी गुंजाइश बनते हुए देख रहे हैं। फिलहाल, इस नजरिये पर अभी कयास का ही दौर है, पर यह २‚१९ में लोकसभा चुनाव आते-आते साफ हो जाएगा कि जो भी शीर्ष दलित नेता हैं, उनकी राजनीतिक धार फिर से लौट आएगी या फिर कोई नया नेता उनके बीच स्थान बनायेगा।

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