ट्रेन के सामने जानवर या इंसान आने के बाद भी क्यों नहीं रुकती है ट्रेन, जानिए क्या है वजह

भारतीय रेलवे भारत में यातायात और माल ढुलाई की दृष्टि से सबसे बड़े साधनो में से एक है. देश में इसके लिए हजारो किलोमीटर रेलवे लाइन बिछाई गई है. इसी के चलते ऐसे कई जंगली इलाकों है जहा से ट्रेन को गुजरना पड़ता है. ऐसे में जब ट्रेन जब इन जंगलो से होकर गुजरती है तो आए दिन जंगली हाथी से लेकर कई जंगली जानवर तक ट्रेन हादसे का शिकार हो जाते हैं, और लोग इसका दोषी ट्रेन ड्राइवर को ही मानने लगते है लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि ट्रेन के ड्राइवर जब किसी व्यक्ति को ट्रेन के सामने आते हुए देखते हैं तो वह ट्रेन को बाकी वाहनों की तरह रोक क्यों नहीं लेते? यदि नहीं! तो चलिए हम आपको बताते है..

सबसे पहले हम उदहारण के तौर पर एक 24 डिब्बों की ट्रेन जोकि 100 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चल रही है को लेते है. अब यदि इसमें लोकोपायलट अचानक से इमरजेंसी ब्रेक लगा दे, तब ब्रेक पाइप का प्रेशर पूरी तरह खत्म हो जाएगा और ऐसे में गाड़ी के हर पहिए पर लगा ब्रेक शू पूरी ताकत के साथ रगडा खाने लगेगा। फिर भी ट्रेन 800 से 900 मीटर तक जाने के बाद ही पूरी तरह रुक पाएगी।

वही मालगाड़ी केस में इस बात पर निर्भर करती है कि गाड़ी में आखिर कितना माल लदा है। नॉर्मली देखा जाए तो मालगाड़ी में इमरजेंसी ब्रेक लगाने पर वो भी 1100 से 1200 मीटर जाकर रुकती है। वही जब आप कभी डिब्बे में लगी इमरजेंसी चेन खींचते हैं, तब भी कमोबेश यही होता है. तब ब्रेक पाइप का प्रेशर बड़ी तेज़ी से कम होता है और फिर पूरी ताकत से ब्रेक लग जाते हैं। ये वैसा ही है, जैसे ड्राइवर या गार्ड पूरी ताकत से ब्रेक लगाएं।

जैसा की अभी बताया उस जानकरी के आधार पर अब आप समझ गए होंगे कि ड्राइवर अगर इमरजेंसी ब्रेक लगाये भी, तो वो कुछ नहीं कर सकता। नॉर्मली रेल हादसों में लोग, जानवर या गाड़ी अचानक ट्रेन के सामने आ जाते हैं। तब ड्राइवर के पास इमरजेंसी ब्रेक लगाने का समय ही नहीं होता। और ऐसे में इमरजेंसी ब्रेक लगाने की कोशिश की जाए तो टक्कर हो ही जाती है। अगर पटरी पर मोड़ हो तो ट्रैक पर कुछ भी देखना और मुश्किल हो जाता है। ऐसे में मामूली से मामूली मोड़ तक पर कोई चीज़ तभी नजऱ आती है जब वो बिलकुल पास आ जाती है। रात को इमरजेंसी ब्रेक का इस्तेमाल और मुश्किल हो जाता है।

यदि रात के समय की बात करे तो रेल ड्राइवर को उतना ही ट्रैक नजर आता है, जहां तक इंजन के लाइट की रोशनी पहुचती है। अगर रात के वक्त ट्रैक पर भीड़ हो, तो ड्राइवर को लगभग एक किलोमीटर के दायरे में होने पर ही नजर आएगी, तब इमरजेंसी ब्रेक लगाकर भी गाड़ी रोकना बहुत मुश्किल होता है। ऐसे में ड्राइवर अब इंजन में लगा हॉर्न हो बजा सकता है और वो भी लगातार बजाता है। कई बार भारतीय रेल के लोकोपायलट कहते हैं, कि कोई जानबूझकर अपनी गाड़ी से किसी को नहीं कुचलता। अगर ट्रैक पर कुछ नजऱ आता है और ड्राइवर के पास उसे बचाने का कोई भी रास्ता होता है तो उसे जरूर अमल में लाया जाता है।

कब लगाये जाते है इमरजेंसी ब्रेक?
इमरजेंसी ब्रेक के सम्बन्ध में कहा जाता है की भारतीय रेल का लोकोपायलट उस स्थिति में इमरजेंसी ब्रेक लगा सकता है, जिसमें तुरंत ट्रेन रोकना बेहद ज़रूरी लगता है। सामने कुछ आ जाए, पटरी में खराबी दिखे, ट्रेन में कोई खराबी हो, कुछ भी कारण हो सकता है। और इमरजेंसी ब्रेक भी उसी लीवर से लगता है जिससे सामान्य ब्रेक। दरअसल लीवर को एक तय सीमा से ज़्यादा खींचने पर इमरजेंसी ब्रेक लगता हैं।

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