तिल चतुर्थी आज, जानिए पूजन विधि, कथा और महत्व

लखनऊ: माघ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकटा गणेश चतुर्थी का व्रत किया जाता है। इसे तिल चतुर्थी भी कहते हैं । इस बार तिल चतुर्थी 24 जनवरी दिन गुरूवार को पड़ रही है। इस दिन भगवान श्री गणेश व चंद्रमा की पूजा की जाती है।

तिल चतुर्थी व्रत की विधि-

तिल चतुर्थी या संकटा चतुर्थी के दिन सुबह स्नानादि करके स्वच्छ वस्त्र धारण करना चाहिए। उसके बाद विघ्न विनाशक भगवान श्री गणेश की पूजा करें। पूजा के दौरान भगवान गणेश की धूप-दीप आदि से आराधना करनी चाहिए। उसके बाद फल,फूल, अक्षत, रौली,मौली, पंचामृत से स्नान आदि कराने के पश्चात भगवान गणेश को तिल से बनी वस्तुओं या तिल तथा गुड़ से बने लड्डुओं का भोग लगायें। पूजा करते समय पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठना चाहिए। संध्या समय में कथा सुनने के पश्चात गणेश जी की आरती करनी चाहिए. इससे आपको मानसिक शान्ति मिलने के साथ आपके घर-परिवार के सुख व समृद्धि में वृद्धि होगी।

तिल चतुर्थी व्रत का महत्व-

मान्यता है कि इस दिन जो व्यक्ति भगवान गणेश की पूजा श्रद्धा और भक्ति भाव से करता है उस व्यक्ति की सभी व्याधियों को गणेश जी हर लेते हैं। सभी प्रकार के विघ्न तथा बाधाओं से व्यक्ति को मुक्ति मिलती है। माघ माह की कृष्ण पक्ष की गणेश चतुर्थी को जो व्यक्ति श्रद्धा और विश्वास से गणेश जी का उपवास करते हैं, गणेश जी प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद देते हैं। यह चतुर्थी सभी प्रकार के संकटों को हरने वाली होती है, इसलिए इसे संकष्ट चतुर्थी कहा गया है।

गणेश तिल चतुर्थी की व्रत कथा-

एक बार देवता अनेक विपदाओं में घिरे थे। तब वे मदद के लिए भगवान शिव के पास आए। उस समय भगवान शिव के साथ कार्तिकेय तथा गणेशजी भी थे। देवताओं की बात सुनकर शिवजी ने कार्तिकेय व गणेशजी से पूछा कि तुम में से कौन देवताओं के कष्टों का निवारण कर सकता है। तब कार्तिकेय व गणेशजी दोनों ने ही स्वयं को इस कार्य के लिए सक्षम बताया। इस पर भगवान शिव ने दोनों की परीक्षा लेते हुए कहा कि तुम दोनों में से जो सबसे पहले पृथ्वी की परिक्रमा करके आएगा वही देवताओं की मदद करने जाएगा।

यह सुनते ही कार्तिकेय तुरंत अपने वाहन मोर पर बैठकर पृथ्वी की परिक्रमा के लिए निकल गये। गणेशजी सोच में पड़ गये कि वह चूहे के ऊपर चढ़कर सारी पृथ्वी की परिक्रमा करेंगे तो उन्हें बहुत समय लग जायेगा। तभी उन्हें एक उपाय सुझा वे अपने स्थान से उठकर सात बार अपने माता-पिता की परिक्रमा करके बैठ गए। परिक्रमा करके लौटने पर कार्तिकेय स्वयं को विजेता बताने लगे। तब शिवजी ने श्रीगणेश से पृथ्वी की परिक्रमा ना करने का कारण पूछा।

तब गणेश जी बोले कि माता-पिता के चरणों में ही समस्त लोक हैं। यह सुनकर भगवान शिव ने गणेशजी को देवताओं के संकट दूर करने की आज्ञा दी। इस प्रकार भगवान शिव ने गणेशजी को आशीर्वाद दिया कि चतुर्थी के दिन जो तुम्हारा पूजन करेगा और रात्रि में चन्द्रमा को अध्र्य देगा उसके तीनों ताप – दैहिक ताप, दैविक ताप तथा भौतिक ताप दूर होगें। उस व्यक्ति को सभी प्रकार के दु:खों से मुक्ति मिलेगी। उसे सभी प्रकार के भौतिक सुखों की प्राप्ति होगी व सुख तथा समृद्धि में वृद्धि होगी।

इसके अलावा गणेश संकष्ट चतुर्थी व्रत की एक अन्य कथा है जो सबसे अधिक प्रचलित है-

प्राचीन समय में एक नगर में एक कुम्हार राज्य के बर्तन बनाने का कार्य करता था। जिसमें मिट्टी के बर्तन पकाए जाते हैं उसे आँवा कहते हैं। आँवा लगाने के एक वर्ष में बर्तन पक कर तैयार होते थे। एक बार उस कुम्हार ने आँवा लगाया परन्तु बर्तन पके ही नहीं। इससे वह कुम्हार परेशान होकर राजा के पास गया। राजा ने आँवा ना पकने का कारण राजपण्डित से पूछा। राज पण्डित ने कहा कि जब भी आँवा लगाया जाएगा तब एक बच्चे की बलि देने से आँवा पकेगा अन्यथा आँवा नहीं पकेगा। राजा ने आज्ञा दी कि प्रत्येक वर्ष एक घर से एक बच्चे की बलि दी जाएगी। इस प्रकार आँवा पकाने के लिए हर वर्ष एक बच्चे की बलि देने का प्रचलन चल पडा़।

कुछ वर्षों बाद राज्य में रहने वाली एक बुढि़या के बेटे की बारी आई। बुढि़या का उसके बेटे के अलावा कोई अन्य सहारा नहीं था। बुढि़या को अपने बेटे के जाने का बहुत दु:ख था। वह सोचने लगी कि मेरा तो एक ही बेटा है और वह भी मुझसे जुदा हो जाएगा। उसने अपने कलेजे पर पत्थर रख कर अपने बेटे को बलि के लिए भेज दिया। बुढि़या ने उस दिन संकष्ट चतुर्थी का व्रत रखा हुआ था। उसने अपने बेटे के हाथ में थोडे़ से तिल देकर कहा कि जब तुम आँवे में बैठोगे तब अपने चारों ओर यह तिल डाल देना बाकि भगवान गणेश पर छोड़ देना वो जैसा चाहेगें वैसा करेंगें। उस दिन वह स्वयं भगवान गणेश की पूजा करती रही और रो-रो कर यही प्रार्थना करती रही कि मेरे बच्चे कि रक्षा करना। उसके बेटे ने अपनी माँ के दिए तिलों को आँवे में बैठने के बाद अपने चारों ओर बिखेर दिया और भगवान गणेश का ध्यान करने लगा।

आँवे में मिट्टी के बर्तनों को पकने में एक वर्ष का समय लगता था परन्तु उस दिन एक दिन के बाद ही आँवा ठण्डा हो गया और बर्तन पक गए। कुम्हार को बहुत हैरानी हुई कि यह कैसे हुआ। उसने आँवा हटाया और यह देखकर हैरान हो गया कि बुढि़या का बेटा जीवित बैठा है और गणेश जी का ध्यान कर रहा है। उसके साथ नगर के अन्य बालक भी जीवित थे। कुम्हार ने राजा को इस बात की सूचना दी। राजा ने सम्पूर्ण वृतान्त के बारे में बुढि़या के बेटे से पूछा, उसने अपनी माँ द्वारा रखे गये उपवास तथा गणेश जी की महिमा के बारे में बताया। सारी बातें जानने के पश्चात राजा ने बुढि़या तथा उसके बेटे को बहुत से उपहार और इनाम दिए। साथ ही सारे नगरवासियों से निवेदन किया कि अपने परिवार और राज्य की रक्षा के लिए माघ मास की कृष्ण पक्ष की गणेश संकष्ट चतुर्थी का व्रत करें। इससे सभी की बाधाएं दूर होगी तथा मनोकामनाएं भगवान गणेश पूर्ण करेंगें।

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