तीसरा मोर्चा बना तो बीजेपी की खुल जायेगी किस्मत

अखिलेश अखिल

यह बात और है कि राजद प्रमुख लालू यादव ने तीसरे मोर्चे की संभावना को सिरे से नकार दिया है और कहा है कि कांग्रेस के वगैर किसी मोर्चा की कोई संभावना नहीं है। लालू यादव के मुँह से निकले इस बयान को लेकर भी राजनीतिक हलकों में खूब चर्चा चल रही है। तो क्या माना जाय कि बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जिस तीसरे मोर्चे या फरदराल मोर्चे की बात कर रही है उसकी कोई संभावना नहीं है। और क्या यह भी मान लिया जाय कि कांग्रेस के वगैर कोई तीसरा मोर्चा नहीं बन पायेगा। राजनीतिक जानकार ऐसा नहीं मानते। कुछ लोगो का मानना है कि तीसरा मोर्चा संभव है और वह ममता बना सकती है।

ममता की दिक्कत यह है कि सबसे पहले उसे अपने इलाके बंगाल को बचाना है। ममता किसी भी सूरत में वाम दलों के साथ नहीं जा सकती क्योंकि बंगाल में उसकी असली लड़ाई आज भी वाम दलों से ही है। ऐसे में ममता की यही दिक्कत तोसरे मोर्चे की संभावना को जन्म देती लगती है। उधर तेलंगना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव शुरू से ही गैर बीजेपी और गैर कांग्रेस की रट लगाए बैठे हैं। उसके साथ ही टीडीपी नेता चंद्रबाबू नायडू भी कांग्रेस से अलग होकर ही राजनीति करना चाहते हैं। ऐसे में ममता के साथ जुड़कर इन दलों का मोर्चा बनता दिख रहा है।

जमीनी तौर पर देखें तो देश में अभी दो मोर्चा काम करता दिख रहा है। पहला मोर्चा तो स्वाभाविक रूप से भारतीय जनता पार्टी का है जिसे एनडीए कहा जा रहा है। इस मोर्चे में अभी चार दर्जन से ज्यादा दल हैं लेकिन राजनीति करने और चुनाव को प्रभावित करने वाले भी दर्जन भर दल हैं। हो सकता है आगे इस मोर्चे में और भी दल जुट जाए। दूसरा मोर्चा कांग्रेस का है। इसे यूपीए कहा जा रहा है। अब यूपीए पार्ट 3 की बात की जा रही है। इस मोर्चे आज भी वह पार्टियां लगभग शामिल हैं जो पहले भी इस मोर्चे में रह चुकी हैं। इसमें पक्के तौर पर जिन पार्टियों को शामिल किया जा रहा है उनमें लालू प्रसाद की राजद, हेमंत सोरेन की झारखंड मुक्ति मोर्चा, शरद पवार की एनसीपी, स्टालिन की डीएमके, फारूक अब्दुल्ला की नेशनल कांफ्रेंस आदि पार्टियां शामिल हैं। उत्तर प्रदेश की तीनों पार्टियां सपा, बसपा और रालोद भी इसका हिस्सा हो सकती हैं। इसके अलावे कुछ और पार्टियां भी।

अगर ममता बनर्जी की पार्टी इस दूसरे मोर्चे में शामिल होती है तो स्वाभाविक रूप से लेफ्ट पार्टियां इसका हिस्सा नहीं होंगी। फिर वे अलग राजनीति करेंगे, जैसे हमेशा भाजपा और कांग्रेस के खिलाफ तीसरा मोर्चा बनाने के लिए करते रहेंगे। परंतु अगर कांग्रेस किसी तरह से लेफ्ट को इस मोर्चे में शामिल करती है तो ममता बनर्जी की पार्टी इससे अलग रहेगी और फिर वे संघीय मोर्चा यानी तीसरे मोर्चे की राजनीति करेंगी। इस तीसरे मोर्चे में शामिल होने वाली ज्यादातर पार्टियां वो होंगी, जो राज्यों में कांग्रेस को अपना नंबर एक दुश्मन मानती हैं या जिनको कांग्रेस अपना दुश्मन मानती है। जैसे ओड़िशा में बीजू जनता दल है या दिल्ली, पंजाब और हरियाणा में आम आदमी पार्टी और इंडियन नेशनल लोकदल हैं। या आंध्र प्रदेश में तेलुगू देशम पार्टी और तेलंगाना में तेलंगाना राष्ट्र समिति है। ये सारी पार्टियां तीसरे मोर्चे का हिस्सा हो सकती है। इनको इससे फर्क नहीं पड़ता है कि इस मोर्चे का नेतृत्व ममता कर रही हैं या लेफ्ट पार्टियां कर रही हैं।

जहां तक इस तीसरे मोर्चे के असर का सवाल है तो यह जितने ज्यादा मजबूत होगा कांग्रेस को उतना ही नुकसान और भाजपा को उतना ही फायदा होगा। इसलिए भाजपा विरोध में गठबंधन बनाने का प्रयास कर रहे नेताओं की सबसे बड़ी चुनौती इस गठबंधन को छोटे से छोटा रखने की है। बता दें की इस बात की जानकारी ममता को भी है और नायडू से लेकर पटनायक को भी। लेकिन उनकी मज़बूरी केवल अपनी राजनीति कोबचाने भर से रह गयी है। उनके खेल से किसको लाभ हानि होती है इससे उनका कोई मतलब नहीं। बीजेपी इस फिराक में है कि ममता के नेतृत्व में कोई मोर्चा बने ताकि कांग्रेस को बुरी तरह से साफ़ किया जा सके।

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