तो विपक्ष के आरोपी नेताओं पर टिकी है बीजेपी की नजरें

अखिलेश अखिल

समुद्र की ताकत के सामने नदियों की क्या विसात! अपने अपने इलाके में नदियाँ चाहे जितनी भी तेवर में रहती हों,समुद्र का सामना होते ही उसके तेवर ख़त्म हो जाते हैं। बाद में ये नदियाँ समुद्र में डर और भय से विलीन होकर समाप्त हो जाती है। यही हाल कुछ राजनीति की भी है। मौजूदा राजनीति भी कुछ इसी ढर्रे पवार चल रही है। सत्ता के सामने सब नतमस्तक हैं। सत्ता चाहे जो न कर दे। मौजूदा दौर में बीजेपी की जो हालत है वह किसी समुद्र से कम नहीं। उसकी विस्तार राजनीति अब देश को दिखने लगी है। उसके साम ,दाम दंड और भेद की राजनीति के सामने सब पस्त हैं।

एक तरफ विपक्ष की राजनीति करने वाली पार्टियां एकाबनाकर बीजेपी को नाथने की संभावना तलाश रही है तो दूसरी तरफ बीजेपी के कलाबाज लोग विपक्ष की उन पार्टियों की सूची तैयार कर रहे हैं जिनके दामन पर दाग लगे हैं। एक सूची ऐसी पार्टियों और नेताओं की भी बन रही है जिनपर दबाव बनाकर पाने संग लाया जा सकता है। बीजेपी ने पूर्वोत्तर की राजनीति लगभग इसी पैटर्न पर की और पूरे पूर्वोत्तर में छा गयी। पूर्वोत्तर में ना कोई ऐसी पार्टी और नेता बचे थे जिनपर भ्रष्टाचार के आरोप नहीं लगे हों ,साम ,दाम ,दंड और भेद की राजनीति के सामने सब गिर गए और केसरिया रंग में रंगा गए। इसीलिए विपक्ष की एकता की बात चाहे जितनी हो जाए बीजेपी के निशाने पर कई नेता और पार्टियां है जो अभी विपक्ष के साथ जाने को सोच रहे हैं।

2019 के चुनाव में विपक्षी पार्टियां एक होना चाहती है जबकि बीजेपी ऐसा होने देना नहीं चाहती। इसके लिए साम ,दाम दंड और भेद अपनाये जा सकते हैं। गुजरात चुनाव में बीजेपी ऐसा कर भी चुकी है। गुजरात चुनाव में मायावती और शरद पवार की पार्टी मिलकर चुनाव लडे थे और कर्नाटक में इस बार मायावती और जेडीएस मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं। यह बीजेपी की कूटनीति ही तो है। जहां त्रिकोणात्मक लड़ाई होगी बीजेपी की जीत हो जाती है। गुजरात में ऐसा ही हुआ था। जहां कांग्रेस से सीधा मिक़बला होता है वहाँ बीजेपी की लड़ाई कमजोर हो जाती है।

राजनितिक जानकार मानते हैं कि लोकसभा चुनाव से पहले मोदी-शाह की मुट्ठी में बंद क्षत्रपों का राजनीतिक इस्तेमाल होगा। साम यानी बातचीत, सुलह समझौते के सहारे उनको अपनी ओर करने का प्रयास होगा, जैसा प्रयास बिहार में हुआ। भाजपा को सबसे ज्यादा खतरा बिहार में था। लालू प्रसाद और नीतीश कुमार का गठबंधन अजेय था तो उसे तोड़ दिया गया। नीतीश को अपनी ओर मिला लिया गया। दाम यानी खरीद फरोख्त के जरिए कुछ लोगों को अपने साथ किया जाएगा। पूर्वोत्तर के राज्यों में पिछले तीन साल से इसी से राजनीति हुई है।

दंड और भेद का उपाय उन क्षत्रपों पर आजमाया जाएगा, जो किसी न किसी कानूनी पचड़े में फंसे हैं या फंसने का अंदेशा है। शरद पवार की पार्टी और परिवार के कई सदस्य आरोपों से घिरे हैं। उनके भतीजे अजित पवार के ऊपर सिंचाई घोटाले के आरोप हैं। उनकी पार्टी के बड़े नेता सुनील तटकरे भी आरोपी हैं। पार्टी के नंबर दो प्रफुल्ल पटेल के खिलाफ विमानों की सीटों का सौदा करने के मामले की जांच चल रही है। ये सारे नेता जेल में बंद छगन भुजबल के हस्र को देख कर डरे हुए होंगे। इसी तरह आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी भ्रष्टाचार के मामले में कई साल जेल काट चुके हैं और उनकी सैकड़ों करोड़ की संपत्ति ईडी ने जब्त की हुई है। उन्हें इस सारे जंजाल से मुक्ति चाहिए। यूपी में अखिलेश यादव से लेकर उनके चाचाओं और परिवार के दूसरे सदस्यों पर कई किस्म के सच्चे झूठे आरोप हैं। शिवपाल यादव ने खुद रामगोपाल यादव और उनके बेटे पर भ्रष्टाचार के आरोप और भाजपा से समझौते के आरोप लगाए थे।

बहुजन समाज पार्टी की मायावती और उनके भाई आनंद के ऊपर भी कई आरोप हैं। झारखंड में हेमंत सोरेन और तमिलनाडु में करुणानिधि परिवार भी किसी न किसी आरोप के घेरे में है। ममता बनर्जी की पार्टी के आधा दर्जन सांसद किसी न किसी चिटफंड के घोटाले से घिरे हैं तो हरियाणा में चौटाला परिवार के दो सदस्य सजा काट रहे हैं। ध्यान रहे सजा काट रहे या जमानत पर छूटे या मुकदमा दर्ज होने का इंतजार कर रहे प्रादेशिक क्षत्रपों का किसी भी तरह का इस्तेमाल हो सकता है। इनको डरा कर साथ मिलाया जा सकता है, डरा कर अपने खिलाफ गठबंधन करने से रोका जा सकता है। इसके अलावा एक उपाय यह भी हो सकता है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई का हल्ला बनाने के लिए इनमें से कुछ को पकड़ कर जेल भेजा जाए।

यदि लगा कि सिर्फ लालू प्रसाद के खिलाफ कार्रवाई से बात नहीं बन रही है तो कुछ दूसरे क्षत्रपों पर कार्रवाई भी हो सकती है। याद कीजिये हिमंता बिस्वा सरमा, मुकुल रॉय, नारायण राणे, सुखराम, नरेश अग्रवाल क्या थे और आज ये सभी बीजेपी के साथ चले गए। बाकी का इन्तजार है।

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