दलगत राजनीति को आइना दिखाती सिद्धार्थ की खरी-खरी

दमोह: राजनीति में सिद्धार्थ न्याय का प्रतीक बनकर जब तब प्रकट होते रहते हैं। ताज़ा मामला दमोह ज़िले से है। यहाँ सिद्धार्थ मलैया ने पिता की हत्या के मामले में न्याय के लिए दर दर भटक रहे सोमेश चौरसिया को दलगत राजनीति से ऊपर उठकर मदद का भरोसा दिलाया है। सिद्धार्थ भाजपा के क़द्दावर नेता और पूर्व मंत्री जयंत मलैया के बेटे हैं।वहीं सोमेश के पिता कांग्रेस नेता देवेंद्र चौरसिया की हत्या कांग्रेस सरकार के समय हुई थी। हत्या का आरोप पथरियाँ से बसपा विधायक राम बाई के परिजनों और रिश्तेदारों पर लगा था। मामला भी दर्ज हुआ था गिरफ्तारियां भी हुई लेकिन विधायक के पति को जाँच में ही क्लीन चिट दे दी गई।आप विधायक के टारगेट पर पीड़ित परिवार है। विधायक राम बाई पहले कमलनाथ सरकार को समर्थन दे रही थी तो अब भाजपा सरकार को समर्थन दे रही है। कमलनाथ सरकार में मंत्री बनने के हठ का त्याग उन्होंने इस हत्याकांड के बाद ही किया था। इसके बाद उनका मुख्य फ़ोकस हत्याकांड कि यह फ़ाइल भी रही है।

सिध्दार्थ की बात करें तो पिता की राजनीतिक विरासत के उत्तराधिकारी अब वही है। सोमेश से उनकी हमदर्दी इसलिए प्रिय लग रही है क्योंकि फ़िलहाल वह राजनीति से परे दलगत भावना से ऊपर उठकर न्याय की बात कर रहे हैं।यह भी स्वीकार कर रहे हैं कि इस अन्याय के ख़िलाफ़ उन्हें पहले ही सोमेश का साथ देना चाहिए था। न वह कमलनाथ सरकार की निंदा कर रहे हैं न शिवराज सरकार की वाहवाही कर रहे हैं।उनके केन्द्र में है तो पीड़ित को न्याय दिलाने की बात। उनकी संवेदनशीलता सामने आ रही है तो इसलिए कि वह पीड़ित के साथ ख़ुद भी फूट फूटकर रो रहे हैं।इसमें कोई श़क नहीं है कि सिद्धार्थ के साथ भविष्य में उनका राजनीतिक सफ़र साथ साथ चल रहा है लेकिन अन्याय के ख़िलाफ़ लड़ाई, दलगत राजनीति से ऊपर उठकर न्याय की ख़ातिर क़दम ताल करने का जज़्बा निश्चित तौर से मानवीयता न्यायप्रियता का बेहतरीन उदाहरण है। वर्तमान वैमनस्यता की राजनीति के दौर में सिद्धार्थ निश्चित तौर से सराहना से के पात्र हैं।

उनका यह क़दम राजनीतिक अवसरवादिता पर भी कड़ा प्रहार है। जिसमें क्षेत्र के विकास और जनता की आवाज़ के नाम पर निर्दलीय और निर्दलीय जैसे दूसरे विधायकों ने नैतिकता, प्रतिबद्धता और मर्यादा को ताक पर रखकर ख़ुद को सरेआम बाज़ार में खड़ा कर दिया है। जहाँ दम वहाँ हम की बात चरितार्थ करते समय इन विधायकों पर क्षेत्रीय जनता के मंसूबों को भी खुलकर नीलाम करने और ख़ुद की बोली लगाने के आरोप भी लग रहे हैं पर इसकी परवाह करने का समय इनके पास नहीं है। कांग्रेस सरकार हो या भाजपा सरकार सभी के दरवाज़े इन विधायकों के लिए खुले हैं और ये विधायक भी अवसरवादिता के साथ ही सरकार की जय जयकार करने में कोई कोताही नहीं बरत रहे हैं। एक हाथ से देकर दूसरे हाथ से लेने की परंपरा का निष्ठापूर्वक निर्वाह कर रहे हैं। ऐसी विषम परिस्थितियों में सिद्धार्थ का सच्चाई और पीड़ित के साथ खड़ा होना वाक़ई अनुकरणीय माना जा सकता है।दलगत राजनीति को आइना दिखाती सिद्धार्थ की खरी-खरी निश्चित तौर से मायने रखती है जब राजनीति केवल अवसरवादिता का पर्याय नज़र आ रही है।

कौशल किशोर चतुर्वेदी

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