दलबदलुओं तुम ही हो राजनीतिक बैतरणी के नायक

दिल्ली ब्यूरो: समाज में दलबदलुओं को भले ही लोग हीन नजर से देखते हों लेकिन राजनीतिक दलों के लिए दलबदलू हीरो माने जाते हैं। दलबदलू ना हो तो राजनीति बेरंग हो जाय। फिर बेरंग राजनीति से भला लगाव किसे हो। भारतीय राजनीति में दलबदलुओं का लंबा इतिहास है। उनका तर्कशास्त्र भी है और उनकी पानी समझ भी है जो और लोगों से मेल नहीं खाती। कुछ लोग कहते हैं कि दलबदलुओं के कोई चरित्र नहीं होते ,वे कभी भी किसी को धोखा दे सकते हैं तो किसी को उपकृत भी कर सकते हैं। लेकिन दलबदलू ऐसा नहीं मानते। उनका कहना होता है कि जब लाभ ना मिले तो राजनीति कैसी ? राजनीति जब एक व्यापार है तब मान-अपमान की बात कहाँ ? जहां लाभ दिखे ,तत्काल मान मिले ,भविष्य दिखे उसका साथ देने में क्या बुराई। सभी राजनीतिक दल हमेशा दलबदलुओं पर नजर गराये रहते हैं। सरकार बनाने से लेकर बिगाड़ने में दलबदलू की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।

इधर बीजेपी की पूरी राजनीति दलबदलुओं के सहारे ही चलती नजर आती है। ऐसा कोई दाल नहीं जिसके नेता बीजेपी में शामिल नहीं हुए हों। सभी विचार के लोग बीजेपी में मौजूद हैं। जिसने बीजेपी को मदद पहुंचाया ,बीजेपी ने भी उसका ख्याल रखा। सौदा बराबर। यह बात और है कि भाजपा इस समय उत्तर प्रदेश से लेकर महाराष्ट्र तक दलबदलू नेताओं के कारण परेशानी झेल रही है। दूसरी पार्टियों से भाजपा में आकर विधायक और सांसद बने नेताओं ने भाजपा की नाक में दम कर रखा है। उत्तर प्रदेश के उन्नाव में बलात्कार के आरोपी विधायक कुलदीप सेंगर भी दल बदल करके भाजपा में शामिल हुए थे और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ मोर्चा खोलने वाले पार्टी के पांच दलित सांसद भी दूसरी पार्टियों से आकर भाजपा की टिकट से चुनाव लड़े थे।

पर ऐसा लग रहा है भाजपा ने इससे सबक नहीं सीखा है। उसने विधान परिषद के लिए अपने दस उम्मीदवारों की सूची जारी की तो उसमें चार दलबदलुओं को टिकट दे दिया। ये दलबदलू भी ऐसे नहीं हैं, जो काफी समय पहले भाजपा में आ गए हैं। पर चूंकि इन नेताओं ने बिना विधायक बने मुख्यमंत्री, उप मुख्यमंत्री और मंत्री बने भाजपा नेताओं की मदद की थी, उनके लिए अपनी सीट खाली की थी इसलिए भाजपा ने उन सबका ऐहसान उतारने का फैसला किया। समाजवादी पार्टी छोड़ कर कुछ ही दिन पहले भाजपा में शामिल हुए भुक्कल नवाब को भी विधान परिषद की टिकट दिया गया है। यह विधानमंडल में भाजपा का दूसरा मुस्लिम चेहरा है। पार्टी ने मोहसिन रजा को मंत्री बनाया हुआ है और इस बार उनको फिर से छह साल के लिए विधान परिषद का सदस्य बनाया जा रहा है। यानी भाजपा के दस उम्मीदवारों की सूची में इस बार दो मुस्लिम चेहरे हैं।

सपा से आकर भाजपा की टिकट पर विधान परिषद जाने वाले दूसरे नेता यशवंत सिंह हैं। ध्यान रहे यशवंत सिंह ने परिषद की सीट खाली थी, जिस पर योगी आदित्यनाथ चुने गए थे और भुक्कल नवाब की खाली की हुई सीट पर केशव प्रसाद मौर्य विधान परिषद के सदस्य बने थे। सो, इन दोनों का एक एक सीट का इनाम दिया गया है। इसी तरह सपा की सरोजिनी अग्रवाल ने अपनी सीट खाली की थी, जिस पर योगी सरकार के मंत्री स्वतंत्र देव सिंह विधान परिषद में गए थे। सपा के ही जयवीर सिंह की खाली की हुई सीट पर भाजपा के इकलौते मंत्री मोहसिन रजा विधान परिषद में गए थे। सो, भाजपा ने इन दोनों नेताओं का भी अहसान उतार दिया है। उत्तर प्रदेश के सरकार के दूसरे उप मुख्यमंत्री दिनेश शर्मा के लिए विधान परिषद की सीट छोड़ने वाले सपा के अशोक बाजपेयी को भाजपा ने राज्यसभा में भेजा है। इसीलिए तो कहा जा रहा है कि दलबदलू राजनीतिक बैतरणी के नायक हैं।

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