दलितों की सियासी हैसियत से थर्र-थर्र कांपते सियासी दल

देश में दलित और आदिवासी सामाजिक-आर्थिक रूप से भले ही कमजोर माने जाते हों, लेकिन उनकी सियासी हैसियत इतनी बड़ी है कि देश के सियासी लोग और सियासी दल थर्र थर्र कांपते नजर आते हैं। दलित नाराज तो सियासत ख़राब। देश का कोई भी सियासी दल दलित से पंगा नहीं लेना चाहता। आइये पहले कुछ तस्वीर को देखते हैं। लोकसभा की 545 सीटों में से 84 सीटें अनुसूचित जाति और 47 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं। यानी दलित आदिवासी समाज के लिए कुल 131 आरक्षित सीटें। भारतीय राजनीति को नाथने के लिए काफी है। इन 131 आरक्षित सीटों में से फिलहाल 67 सीटें भाजपा के पास हैं। कांग्रेस के पास 13 सीटे हैं। इसके अलावा तृणमूल कांग्रेस के पास 12, अन्नाद्रमुक और बीजद के पास सात-सा सीटें हैं। यूपी में दलितों की सबसे बड़ी नेता मायावती है लेकिन पिछले चुनाव में उसकी पार्टी को कोई सीट नहीं मिली थी लेकिन उसका वोट प्रतिशत कम नहीं हुआ था।

यही वजह है कि भाजपा जहां इस वर्ग पर अपनी पकड़ मजबूत बनाने का प्रयास कर रही है तो दूसरी ओर कांग्रेस समेत विपक्षी दलों का प्रयास सामाजिक एवं आर्थिक रूप से इस कमजोर वर्ग को अपने साथ लाने का है। कोई भी राजनीतिक दल उनको नजरअंदाज नहीं कर सकता। अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निरोधक कानून पर उच्चतम न्यायालय के हालिया फैसले के बाद खड़े हुए राजनीतिक बवाल से इस बात पर फिर से मुहर लगी है। देश की कुल मतदाताओं में 20 फीसदी से ज्यादा की हैसियत दलित समाज की है। इसमें दलित और आदिवासी समाज साथ हैं। इस आंकड़े को देखकर कौन सी राजनीतिक दल दलित आवाज़ के विरोध खड़ा होने का दम रखता है ? दलितों के विरोध में जाने का मतलब है कि राजनीति से उसका पत्ता साफ़ हो जाएगा। यही वजह है कि दलित अपनी मांगो को लेकर सड़क पर उतरे हैं।

एससी-एसटी कानून पर न्यायालय के फैसले के बाद राहुल गांधी ने कहा, ‘दलितों को भारतीय समाज के सबसे निचले पायदान पर रखना आरएसएस और भाजपा के डीएनए में है। जो इस सोच को चुनौती देता है कि उसे वे हिंसा से दबाते हैं।’ लेकिन मोदी सरकार में मंत्री राहुल की बातों से इत्तेफाक नहीं रखते। केंद्रीय मंत्री अर्जुनराम मेघवाल ने कहा कि अंबेडकर के सपनों को पूरा करने की मोदी सरकार की अडिग प्रतिबद्धताएं हैं और उसके सारे प्रयासों का उद्देश्य दलितों के जीवन में बदलाव लाना है। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने लोकसभा चुनावों में दो बार अंबेडकर को हरवाया और इसके पीछे हल्के बहाने पेश किये कि संसद के केंद्रीय कक्ष में उनका चित्र नहीं लग पाए। कांग्रेस ने अंबेडकर को भारत रत्न नहीं मिलने दिया। मेघवाल आगे बहुत कुछ जोड़ते भी हैं।

कहते हैं कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2015 के माध्यम से राजग सरकार ने वास्तव में कानून के प्रावधानों को मजबूत बनाया था और यह दलित वर्गों के कल्याण की भाजपा की प्रतिबद्धता के अनुरूप था। लेकिन कांग्रेस सांसद सुनील जाखड़ ने आरोप लगाया कि भाजपा नीत राजग सरकार के शासनकाल में देश में दलितों एवं समाज के कमजोर वर्ग के लोगों पर हमले बढ़े हैं और सरकार उन्हें सुरक्षा देने में विफल साबित हो रही है। उन्होंने कहा कि अनुसूचित जाति, जनजाति अत्याचार निवारण कानून से जुड़े विषय पर सरकार उच्चतम न्यायालय में ठीक से विषय को नहीं रख सकी जिसका परिणाम हमारे सामने है। चुनावी राजनीति में दलितों और आदिवासियों के सियासी महत्व की वजह से सरकार और भाजपा बार-बार यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि वह इन वर्गों के हितों के साथ खड़ी है।

सरकार पर दलित विरोधी होने के विपक्ष के आरोपों के बीच गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने लोकसभा में कहा कि मोदी सरकार एससी-एसटी के हितों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है और एससी-एसटी कानून को कमजोर नहीं किया जाएगा। विपक्ष के आरोपों पर पलटवार करते हुए भाजपा ने यह दलील भी पेश की है कि उसके पास सर्वाधिक एससी-एसटी सांसद हैं। केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री थावरचंद गहलोत ने कहा, ‘अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के हित के संरक्षण के लिए भाजपा कटिबद्ध है। इन वर्गों के उत्थान के लिए सबसे ज्यादा काम भाजपा ने किए हैं। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में इन वर्गों के अधिकारों को मजबूती मिली है।’

भाजपा की कोशिश है दलितों और आदिवासियों के बीच अपने आधार बचाए रखने के साथ और इसे बढ़ाया जाए । वहीं कभी इस वर्ग पर राजनीतिक रूप से मजबूत पकड़ रखने वाली कांग्रेस अपना आधार फिर वापस पाने को प्रयासरत है। बसपा की पूरी राजनीति दलित पर ही टिकी है ऐसे में वह किसी भी सूरत में दलितों के खिलाफ हो रहे खेल को बर्दास्त भला कैसे करेगी। फिर अलग अलग राज्यों में क्षेत्रीय दलों की राजनीति भी दलित वोट बैंक पर ही चल रही है। ऐसे में दलित आंदोलन और तीब्र भी हो जाए तो कोई भी राजनीतिक दल इसे आगे बढ़ाने में ही भलाई समझेगा वरना दलित शाप से उसकी मौत निश्चित है।

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