दिल आज शायर है, ग़म आज नग़मा है…

नीरज होने का मतलब सौन्दर्य और आध्यात्म का अद्भुत मिलन। प्रेम पराग की पराकाष्ठा और सौन्दर्यबोध का अनोखा जादूगर। गीत की गहराई और प्रीत की तड़प में आध्यात्म की तलाश। गीतों का दरवेश और प्रेम का सौन्दर्य उपासक। मौन का मुखर सौन्दर्य और शोखियों की अल्हड़ता का दीदार। रोमांटिज्म और रूमानियत का मिलन।

सच कहें तो नजा़कत से सराफ़त तक। मौन से मुखर तक। गीत से गज़ल तक। मन से मीत तक। दिल से जुबां तक, संवेदनाओं का अद्भुत, आलौकिक, अविस्मरणीय, कोमल स्पंदन। नारी सौन्दर्य से नारायण तक कविता की पहुँच। और उस सौन्दर्य में जन की संवेदना का मुखर गीतकार। सिनेमा से समाज तक जिनके गीतों और गज़लों ने कितनों को जु़बां दिया। गीतों को गहराई दी। महफिलों और मंचों को ऊँचाई देने वाले गोपालदास सक्सेना ‘नीरज’ आज हमारे बीच नहीं रहें लेकिन उनके नगमें हमारे दिलों और जुबां पर हमेशा बजते रहेंगे। उनके मुहब्बत के तराने हर दिल के तार झंकृत करते रहेंगे।

‘शोखियों में घोला जाए फूलों का शबाब, और फिर उसमें मिलायी जाए थोडी़ सी शराब।’ ऐसे प्रेम पराग से जो नशा तैयार होगा उसे नीरज ने ‘प्यार’ कहा। सत्तर के दशक में हिंदी फिल्मी गीतों से नीरज ने बालीवुड को एक नई ऊँचाई दी। ‘बस यही अपराध मैं हर बार करता हूँ..आदमी हूँ आदमी की बात करता हूँ।’ इस अपराध को समाज ने महसूस किया और अपनी जुबां में उनके तराने फिजाओं में गुँजने लगें। कभी गीतकार तो कभी शायर के रूप में नीरज ने समाज को जुबां दिया। ‘कारवां गुज़र गया गुबार देखते रहें’ का अजीम फ़नकार नीरज ने सिनेमा से साहित्य तक समाज को नये सरोकार और मायने दिया।

दिलों के दर्द को जुबां दिया और आने वाली पीढ़ियों को मुहब्बत के तराने दिए। उनकी स्मृतियों में “दिल आज शायर है, ग़म आज नग़मा है शब ये ग़ज़ल है सनम गैरों के शेरों को ओ सुनने वाले हो इस तरफ़ भी करम। जीवन के प्रति अगाध प्रेम,-”कुछ सपनों के मर जाने जीवन नहीं मरा करता..।”

ऐसे अपराजेय योध्दा की स्मृतियों को सादर नमन।

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