दीपोत्सव-2020 कृत्रिम प्रकाश पर प्राकृतिक दीयों की विजय का उत्सव: पर्यटन मंत्री

 

लखनऊ: भारत में दीपावली का त्यौहार अंधेरे पर प्रकाश के विजय के प्रतीक के तौर पर देखा जाता है. दीपावली या दिवाली का अर्थ दीपों की माला है, लेकिन समय के साथ प्रकाश के इस उत्सव में दीपों की जगह आर्टिफीसियल लाइट्स और मोमबत्तियों ने अपनी जगह बना ली और मिटटी के दीयों से उठने वाली प्रकाश की लौ मद्धम पड़ती गई. काशी की देव दीपावली हो या अयोध्या में विगत कुछ वर्षों में मनाया जाने वाला दीपोत्सव, दोनों ने ही दीयों की महत्ता को एक बार फिर वही पहचान वापस दिलाने का प्रयास किया है.

अयोध्या में उत्तर प्रदेश सरकार के पर्यटन विभाग द्वारा आयोजित किया जाने वाला दीपोत्सव गिनीज बुक ऑफ़ वर्ल्ड रेकॉर्ड्स में अपनी जगह बना चुका है. ख़ास बात यह है कि दीपोत्सव में प्रज्ज्वलित होने वाले दीयों की संख्या निरंतर बढती जा रही है और यह आयोजन प्रति वर्ष अपने ही रिकॉर्ड को बेहतर करने की ओर लगातार अग्रसर है. उत्तर प्रदेश शासन के पर्यटन मंत्री डॉ नीलकंठ तिवारी जी ने कहा, “दीपावली पर तेल के दिए जलाना न केवल परंपरा का हिस्सा हैं बल्कि इनसे पर्यावरण को कोई नुकसान भी नहीं है. शास्त्रों के अनुसार तेल के दिए जलाने से न केवल वातावरण शुद्ध होता है बल्कि नकारात्मक ऊर्जा भी दूर होती है. इसीलिए सनातन धर्म की मान्यताओं के अनुसार शुभ अवसर और पूजा पाठ में तेल या घी के दिए जलाने को पवित्रता का प्रतीक माना जाता है. उसके उलट क्रत्रिम प्रकाश से न केवल प्रकाश-प्रदूषण में बढ़ोतरी हो रही है बल्कि मानव स्वास्थ्य पर भी इसके प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहे हैं.”

प्रकाश प्रदूषण को अंग्रेज़ी में फोटो पॉल्यूशन या लुमिनस पौल्यूशन के नाम से पुकारा जाता है. विदेशों में उत्सवों और जश्न के लिए कृत्रिम प्रकाश करने की परम्परा है. पश्चिमी देशों में अब कृत्रिम प्रकाश के दुष्परिणाम अब सामने आने लगे हैं. फ्रांस की सरकारी स्वास्थ्य निगरानी संस्थान (ANSES) की रिपोर्ट के अनुसार कृत्रिम प्रकाश आँखों के रेटिना पर बुरा प्रभाव डालती है. इससे पहले आँखों की प्रकाश कम होती है और फिर आगे चलकर अंधेपन का भी कारण बन सकती है. यहीं नहीं महिलाओं में कृत्रिम प्रकाश के चलते ब्रैस्ट कैंसर का और पुरुषों में प्रोस्ट्रेट कैंसर का भी खतरा बढ़ जता है. रात में ज्यादा देर क्रत्रिम प्रकाश में रहने से शरीर की जैविक घड़ी पर भी दुष्प्रभाव पड़ता है. वहीं दीयों की प्राकृतिक प्रकाश में ऐसा कोई दुष्प्रभाव देखने को नहीं मिला है. यहीं नहीं कृत्रिम प्रकाश के लिए इस्तेमाल होने वाली विद्युत् उर्जा के लिए लाखों टन कोयला या पेट्रोलियम पदार्थ जलाना पड़ता है, जो न केवल महंगा है बल्कि पर्यावरण को प्रदूषित करने का भी बड़ा कारण है.

मिट्टी के दीयों के प्रचलन में आने से सबसे ज्यादा नुकसान इन्हें पारम्परिक तौर पर तैयार करने कुम्हारों को हुआ. दीयों की जगह पहले बिजली की लड़ियां आईं, फिर इनकी जगह चीन से आने वाली बिजली की झालरों ने ले ली. दीपावली गरीब कुम्हारों के घर जाने वाली लक्ष्मी सीधे चीन जानें लगीं. दीपोत्सव के चलते एक बार फिर दीयों के प्रचलन में आने से कुम्हारों के चेहरों पर प्रसन्नता लौटी है. एक अनुमान के मुताबिक़ दीपोत्सव-2020 के दौरान लाखों लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिलेगा. उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग की योजना है कि इस बार 5,51,000 दिए जलाकर आधुनिकता के चलते हाशिये पर पहुंच चुके कुम्हारों की जिन्दगी में उजाला बिखेरा जाए.

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