दीये बनाने वाले खुद रहते अंधेरे में

लखनऊ: महंगाई ने कुंभकारों की कमर तोड़ दी है। दिवाली पर दूसरों के घर रोशन करने के लिए वे रात-दिन एक कर देते हैं, फिर भी उनके घर में अंधेरा ही रहता है। इस दुर्दशा के लिए वह महंगाई के साथ-साथ मोमबत्ती और इलेक्ट्रॉनिक दीयों को भी जिम्मेदार ठहारते हैं।

बाराबिरवा निवासी नानी के नाम से प्रसिद्ध रामकली ने बताया कि महंगाई के इस दौर में इस पेशे के साथ जीना मुश्किल हो गया है। जिंदगी का रुख बदल गया है। पेट भरने के लिए कुम्हारी का पुश्तैनी काम छोड़कर मजदूरी और छोटी-मोटी नौकरियों का रुख करना पड़ रहा है।

रामकली कहती हैं कि दीपावली से तीन माह पहले से दीये बनाना शुरू कर देते हैं, मगर त्योहार पर दाल-रोटी ही मयस्सर हो जाये तो बहुत बड़ी बात है। नये कपड़े, मिठाइयां और पटाखे तो बच्चों के लिए सपना बनकर रह गये हैं। हम दूसरों का घर रोशन करने के लिए रात-दिन एक कर देते हैं, मगर अपना ही घर रोशन नहीं कर पाते।

वहीं, नन्हकऊ कहते हैं कि पिछले साल तक एक ट्रॉली मिट्टी की कीमत 5-6 सौ थी, जो अब 15 सौ हो गई है। चूंकि आसपास के जिलों से भी दीये बिकने आते हैं, इसलिए हम लोगों को प्रतिस्पर्धा में माल सस्ता भी बेचना पड़ता है।

ये लोग कहते हैं कि एक साल पहले तक बिजनेस इतना तेज चलता था कि एक-एक कुम्हार तीन माह के अंदर 50-60 हजार दीये बना लेता था, मगर अब नौकरी करने के कारण यह भी संभव नहीं है। जो दीये बनाते हैं, वही नहीं बिक पाते हैं। अब लोग इलेक्ट्रॉनिक दीये और मोमबत्ती ज्यादा पसंद करने लगे हैं।

नोट: अगर आपको यह खबर पसंद आई तो इसे शेयर करना न भूलें, देश-विदेश से जुड़ी ताजा अपडेट पाने के लिए कृपया The Lucknow Tribune के  Facebook  पेज को Like व Twitter पर Follow करना न भूलें... --------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- --------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- ---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
Loading...
E-Paper