दुनिया की 95 प्रतिशत आबादी दूषित हवा में सांस लेने को मजबूर

वॉशिंगटन। अमेरिका के हेल्थ इफेक्ट्स इंस्टीट्यूट की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया में 95 फीसदी से भी अधिक लोग प्रदूषित हवा में सांस ले रहे हैं। रिपोर्ट बताती है कि 2016 में वायु प्रदूषण ने दुनियाभर में तकरीबन 60 लाख लोगों की जान ली। जहरीली हवा दुनिया में मृत्यु का चौथा सबसे बड़ा कारण है। सिर्फ चीन और भारत में ही वायु प्रदूषण से होने वाली कुल मौतों में से 50 फीसदी मौतें होती हैं। वायु प्रदूषण का सर्वाधिक प्रतिकूल असर गरीब देशों में देखने को मिल रहा है।

सर्वाधिक प्रदूषित और सबसे कम प्रदूषित देशों के बीच का अंतर तेजी से बढ़ रहा है। यानी गरीब देशों में प्रदूषण के चलते अधिक बीमारियां और संकट पैदा हो रहे हैं। अमीर देश वायु प्रदूषण के खतरनाक असर से तुलनात्मक रूप से सुरक्षित हैं। भारत में अब भी ठोस ईंधन जलाया जाता है। चीन में भी कोयले पर पूरी तरह रोक नहीं लग सकी है। इससे होने वाले घरेलू प्रदूषण का असर आसपास के क्षेत्र में भी फैलता है। यही वजह है कि दुनिया में वायु प्रदूषण से होने वाली हर चार मौतों में से एक भारत में और हर पांच मौतों में से एक चीन में होती है।

1990 में दुनिया में कुल 3.6 अरब लोग ठोस ईंधन जलाने के कारण प्रदूषण का शिकार होते थे। 2016 में यह आंकड़ा घटकर 2.4 अरब रह गया है। अगर आने वाले कुछ वर्षों में दुनिया में लकड़ी और कोयले के जलावन पर पूरी तरह रोक लगाई जा सके तो इससे काफी सुधार हो सकता है। चीन ने कोयले का इस्तेमाल रोकने के लिए कड़े प्रयास शुरू कर दिए हैं। भारत में भी खाना पकाने के लिए ग्रामीण व गरीब आबादी को एलपीजी सिलेंडर दिए जा रहे हैं। ऐसे प्रयासों का सकारात्मक नतीजा देखने को मिल सकता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों के अनुसार पीएम 2.5 सूक्ष्म कणों की वायु में मौजूदगी 10 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। वायु प्रदूषण से होने वाली कुल मौतों में चीन और भारत की संयुक्त हिस्सेदारी 51 फीसदी है।

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