दुर्गाओं को नापाक करते असुर

अखिलेश अखिल

सेक्स एक ऐसा विषय है जिस पर हमारा समाज कभी भी सहज नहीं रहा। किसी भी पेशे में कार्यरत लोगों में से कुछ लोग अक्सर सेक्स के कारण विवादों, चर्चाओं, आरोपों से घिर जाते हैं। मीडिया भी इससे अछूता नहीं है। और फिल्मी दुनिया की तो बात हो कुछ और है। लेकिन मामला केवल फिल्म और पत्रकारिता तक ही सिमित नहीं। समाज का ऐसा कोई क्षेत्र नहीं जहां सेक्स का बाजार खड़ा नहीं। जहां सेक्स के खरीददार और विक्रेता का चलन नहीं। यह बात और है कि सेक्स के क्रेता और विक्रेता के बीच का आधार क्या है। कहीं मजबूरी है तो कहीं जिंदगी का लुत्फ। कहीं गरीबी है तो कही पद और चेहरे का अभिमान। पुराने जमाने में भी सेक्स वॢजत नहीं था। अति प्राचीन राजा महराजाओं, जमींदारों, जागीरदारों से लेकर ऋषि मुनियों से लेकर आधुनिक समाज के मठाधीशों के इतिहास को देखे तो साफ हो जाता है कि सेक्स के प्रति हमारा समाज कभी ईमानदार नहीं रहा। कम्बल ओढ़कर घी पीने की परम्परा अति प्राचीन काल में भी थी तो आज भी है। तब सेक्स का प्रदर्शन नहीं होता था लेकिन अब सब जायज है। जो लोग जिंदगी का आनंद सेक्स में ही तलाशते हैं, उनके लिए सेक्स कोई मुद्दा नहीं। कोई बहस का विषय नहीं। लेकिन जहां सेक्स मजबूरी, गरीबी या फिर पद के सामने गिरवी हो जाता है, मौका मिलते ही उफनता है और फिर समाज के सामने वह दृश्य आता है जिसे देख सुनकर हम स्तब्ध रह जाते हैं।

बाजारवाद के इस दौर में नैतिकता नाम की चीज ज्यादातर दुकानों से गायब हो चुकी है या कह सकते हैं कि इसके खरीदार बेहद कम हो गए हैं। इंद्रियजन्य सुख, भौतिक सुख, भोग-विलास सबसे बड़ी लालसा-कामना-तमन्ना है। शहरी जनता इसी ओर उन्मुख है। बाजार ने सुखों-लालसाओं को हासिल कर लेने, जी लेने, पा लेने को ही जीवन का सबसे बड़ा एजेंडा या कहिए जीते-जी मोक्ष पा लेने जैसा स्थापित कर दिया है। आप नि:शब्द होने वाली उम्र में भी सेक्स और सेंसुअल्टी के जरिए सुखों की अनुभूति कर सकते हैं, यह सिखाया-समझाया जा रहा है। आगे बढऩे के लिए प्रतिभाशाली होना मुख्य नहीं रहा। आप किसी को कितना फायदा पहुंचा सकते हैं, लाभ दिला सकते हैं, सुख व संतुष्टि दे सकते हैं, यह प्रमुख होने लगा है। लड़की है तो वह शरीर देकर फायदा पहुंचा सकती है, संतुष्ट कर सकती है, सुख पहुंचा सकती है।

लड़का है तो कंपनी को या बॉस को

आर्थिक रूप से, सामाजिक रूप से, मानसिक रूप से लाभ दिला कर फायदा पहुंचा सकता है। ग्लोबल इकोनॉमी आई है तो अपने साथ खुलापन की आंधी भी लाई है। मान्यताएं और धारणाएं धड़ाम हुईं हैं। नए जमाने के लड़के-लड़कियों के लिए सेक्स और चॉकलेट में कोई खास फर्क नहीं है। फास्ट फूड की तरह फटाफट सेक्स चलन में है। वर्जनाएं भयानक रूप से टूटी हैं और टूट रही हैं। ऐसे में यौनाचार विषय पर लिखना बड़ा मुश्किल काम है। अगर कोई दो अपरिचित लोग, आपसी सहमति के आधार पर, भले ही इस सहमति में कोई लाभ-हानि निहित हो या न हो, सेक्स संबंध जी रहे हैं, तो पारंपरिक दृष्टि से इसे रंडीबाजी कहकर, व्यभिचार मानकर इन पर पत्थर बरसाए जा सकते हैं। लेकिन आज का बाजार, आज का नैतिक शास्त्र, आज की लाइफस्टाइल इसे आजाद ख्याली और व्यक्ति की स्वतंत्रता का मामला मानता है। और इन्हीं आधार पर इसे सहज और स्वीकार्य बताता है।

ज्यादातर नर-नारियों के जीवन के डार्क एरियाज में सेक्स ही होता है लेकिन कोई इसे बताना-सुनाना नहीं चाहता क्योंकि इस डार्क एरिया पर प्रकाश पड़ते ही उस शख्स की सामाजिक शख्सियत के खंडित होने का खतरा पैदा हो जाता है। यही कारण है कि सेक्स शब्द का नाम आते ही ज्यादातर लोग अति एलर्ट हो जाते हैं, आशंकाओं से भर जाते हैं, आनंद व उन्माद के शिकार होने लगते हैं, पत्थर लेकर खड़े हो जाते हैं या फिर तेरी कहानी मेरी कहानी जैसी मानकर चुपचाप आगे बढ़ लेते हैं।

इतनी लंबी भूमिका के पीछे आशय एक अभियान ‘मी टू’ को लेकर है, जो आधुनिक भारत के बड़े सफेदपोशों से लेकर कई मठाधीशों की गर्दन झुका दी है। महिलाओं और खासकर युआन हिंसा की शिकार महिलाओं के जरिए चलाया जा रहा यह अभियान कथित नैतिक समाज से लेकर नैतिकता का बाना ओढ़े उन मठाधीशों को नंगा कर रहा है जो कल तक बड़े होने का दंभ भर रहे थे लेकिन आज वही महिलाएं उनकी मुंह पर कालिख पोत रही हैं जिसे कभी उन्होंने शिकार बनाया था। महिलाओं द्वारा शुरू ‘मी टू’ कैंपेन आजाद भारत का सबसे बड़ा कैंपेन है जो भेडिय़े पुरुष के चेहरे को नंगा का रहा है। अब जरा एक नजर ‘हैशटैग मी टू’ कैंपेन से जुड़ी कंपकंपा देने वाली कहानियों पर।

कामकाजी औरतों के साथ होने वाले यौन दुव्र्यहार के खिलाफ अमेरिका के हॉलीवुड से शुरू हुआ ‘हैशटैग मी टू’ कैंपेन अब भारत की सियासत से लेकर मीडिया के सफेदपोशों और बॉलीवुड के बलात्कारियों की खुली चिट्ठी बांच रहा है। इंसानों के भेष में तमाम भेडि़ए मठाधीश उन औरतों की जुबान खुलने से कंपकंपा रहे हैं, जिनका यौन शोषण कर भले बने बैठे हैं, दुनिया-जहान के आदर्श हैं। उनमें से एक नाम महान पत्रकार रहे एमजे अकबर का भी है। इन दिनों एमजे अकबर मोदी सरकार में विदेश राज्य मंत्री हैं। जब पत्रकारों ने केंद्रीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से एमजे अकबर पर लग रहे यौन उत्पीडऩ के आरोपों के बारे में पूछा तो वह उन्होंने अपने कनिष्ठ मंत्री पर मुंह नहीं खोला। लेकिन इधर छह महिला पत्रकारों ने मुंह खोल दिया, जो एमजे अकबर के उत्पीडऩ से पत्रकारिता के दिनों में शिकार हुईं।

गौरतलब है कि जिन छह महिला पत्रकारों ने साफ-साफ कहा है कि एमजे अकबर ने यौन उत्पीडऩ किया है, वह तब की बात है जब एमजे अकबर संपादक हुआ करते थे। एमजे अकबर लंबे समय तक अंग्रेजी अखबार एशियन एज के संपादक रहे। भाजपा नेता और फिर मंत्री बनने से पहले वह इंडिया टुडे पत्रिका के संपादक थे। प्रिया रमानी के एमजे अकबर को लेकर किए खुलासे के बाद एशियन एज अखबार की कार्यकारी संपादक सुपर्णा शर्मा ने एमजे अकबर के वहशी होने की एक घटना इंडियन एक्सप्रेस से साझा की है। सुपर्णा शर्मा ने बताया, ‘यह घटना एक अखबार के लांच करने के दौरान की है, जिसमें मैंने 1993 से 1996 के बीच काम किया। उस समय मैं कोई 20 वर्ष की थी। मैं अपना पेज बना रही थी। मेरे कुर्सी के ठीक पीछे एमजे अकबर खड़े थे। तभी उन्होंने एकाएक मेरी ब्रा का पट्टा खींच दिया। मैं हतप्रभ हो उन पर चिल्ला पड़ी।’ शर्मा ने इसके अलावा कुछ और भी आरोप लगाए हैं। वह बताती हैं कि इस घटना के कुछ दिन बाद मैं एक दिन टी-शर्ट पहनकर आई जिसपर कुछ लिखा था। मैं एमजे अकबर के केबिन में गई तो वह मेरी छाती ही निहारते रहे और उन्होंने कुछ ऐसा कहा, जिसे मैंने इग्नोर किया। एशियन एज की संपादक सुपर्णा शर्मा जो पहले इंडियन एक्सप्रेस में भी नौकरी कर चुकी हैं, बताती हैं कि ‘एमजे अकबर हमेशा उन जवान लड़कियों को अपना शिकार बनाने की कोशिश में जुटे रहते थे जो महात्वाकांक्षी थीं, आगे बढऩा चाहती थीं और अपने काम को प्यार करती थीं।’

लेकिन मामला केवल एमजे अकबर तक का ही नहीं है। अकबर की तरह न जाने कितने मठाधीशों ने महिलाओं की मजबूरी का नाजायज फायदा उठाया है। जिस तरह से महिलाओं ने अपनी बातें रखनी शुरू की हैं जाहिर है देश के बहुत सारे भेडिय़ों की पहचान जल्द सामने आएगी। ‘मी टू’ अभियान ने क्रमश: भारत में अपने विस्तार के संकेत देने शुरू कर दिए हैं। ‘मी टू’ आंदोलन के तहत सोशल मीडिया पर पत्रकारिता जगत से जुड़े कई पत्रकारों पर यौन शोषण के गंभीर आरोप लगाए गए हैं। अंग्रेजी अखबार हिंदुस्तान टाइम्स के राजनीतिक संपादक प्रशांत झा पर शोषण के आरोप लगने के बाद उन्हें भी उनके पद से हटा दिया गया है।

‘मी टू’ आंदोलन के तहत महिलाएं सोशल मीडिया पर यौन शोषण से जुड़े अपने अनुभव साझा कर रहे हैं। बॉलीवुड में तनुश्री दत्ता ने नाना पाटेकर के संदर्भ अपने अनुभव का जिक्र करके भारत में इस जिस नए ‘मी टू’ अभियान की शिखा जलाई है, उसकी रोशनी अब क्रमश: हमारे समाज के दूसरे अंधेरे कोनों को भी प्रकाश में लाने लगी है। अब तक दर्जन भर से ज्यादा फिल्मी मठाधीशों पर सेक्स और यौनाचार के आरोप लग गए हैं। अदालती कार्रवाई शुरू हो गई है। समाज के भीतर से ही विरोध की आवाजें उठनी शुरू हो गई है। जिस तरह से महिलाएं खुलासा कर रही हैं, उससे साफ लगता है कि भारतीय समाज कम्बल ओढ़कर घी पीने का आदी है। इकोनॉमिस्ट पत्रिका ने अपने नए अंक (29 सितम्बर-5 अक्तूबर 2018) में ‘मी टू’ को अपनी कवर स्टोरी बनाया है और इससे समाज के कथित संभ्रांतों और ताकतवरों के द्वारा अपने पद और अधिकारों का प्रयोग करके औरतों का शोषण करने के निकृष्ट आचारणों के उद्घाटनों की गहनता और व्यापकता को देखते हुए यहां तक लिखा है कि ‘यह एक ऐसा आंदोलन है जिसका प्रारंभ एक कथित बलात्कारी से हुआ है, लेकिन यह औरतों की समानता के लिए उन्हें मतदान के अधिकार के बाद एक सबसे शक्तिशाली बल साबित हो सकता है।’

यह आंदोलन साल भर पहले हॉलीवुड के एक बड़े फिल्म निर्माता हार्वे विंस्टीन की कहानी से शुरू हुआ था, जब एक के बाद एक अभिनेत्रियों ने उसकी फिल्म में काम पाने के लिए उसे अपने शरीर को सौंपने के दर्दनाक अनुभवों का बयान करना शुरू किया। विंस्टन एक आदतन बलात्कारी है, इसे कई सालों से हॉलीवुड के लोग जानते थे, लेकिन वह इतना ताकतवर था कि कोई बोलने का साहस नहीं कर पा रहा था। मान कर चला जा रहा था कि ताकतवर पुरुष अपनी मर्जी का मालिक होता है, वह कुछ भी कर सकता है। लेकिन इस एक साल में ही अब अमेरिका में इस बद्धमूल मान्यता को करारी चोटें लग रही हैं। अब वहां जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में ऐसे निरंकुश ताकतवरों की पशुता के किस्से सामने आने लगे हैं। बल्कि, सिर्फ अमेरिका में ही नहीं, सारी दुनिया में इसका सिलसिला चल पड़ा है।

अभी अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट में ट्रंप ने एक जज की नियुक्ति की- ब्रेट कावनॉ की। उस पर भी यह अभियोग लगा कि कई दशक पहले जब वह छात्र था, उसने एक लड़की पर कामुक हमला किया था। यह अभियोग क्रिस्टीन ब्लासे फोर्ड नामकी महिला ने लगाया। इस उद्घाटन के बाद सारे अमेरिका में एक तहलका मच गया। अमेरिका की सर्वोच्च न्यायपीठ पर एक ऐसे कामुक और हमलावर व्यक्ति की स्थायी नियुक्ति के भविष्य में कितने दुष्परिणाम हो सकते हैं, इसके कयास पर तमाम स्तरों पर पुरजोर चर्चा शुरू हो गई। अमेरिकी सिनेट की न्याय कमेटी के सदस्यों ने कावनॉ से सीधे पूछताछ की और उसकी नियुक्ति पर आशंका के बादल मंडराने लगे थे। अभी दो दिन पहले जब उसकी नियुक्ति पर अंतिम मुहर लगी तो अनेक हलकों से उसे अमेरिका के इतिहास का एक काला दिन बताया गया है।

यह पूरा घटनाक्रम ‘मी टू’ आंदोलन के तेजी से विस्तार के संकेत दे रहा है। इसका अंतिम हश्र क्या होगा, कोई नहीं कह सकता। लेकिन अमेरिकी समाज के लिए इसे इसलिए एक सबसे बड़ी बात माना जा रहा कै क्योंकि यह दर्शाता है कि उस समाज में सकारात्मक और प्रगतिशील परिवर्तन की भूख आज भी बाकायदा बची हुई है। ‘इकोनॉमिस्ट’ ने इसका बुरा पक्ष यह भी बताया है कि कहीं यह ‘मी टू’ आंदोलन भी औरतों के शरीर से जुड़ी कहानियों पर चटखारे लेने वाली उपभोक्तावादी संस्कृति की खुराक न बन जाए!

लेकिन अमेरिका के विभिन्न स्तरों पर इस बारे में औरतों की अपनी गवाहियों को जितनी गंभीरता से लिया जा रहा है, वह इस आंदोलन का सबसे अधिक महत्वपूर्ण आयाम है। अन्यथा अब तक तो इस प्रकार के अभियोग लगाने वाली औरतों को ही समाज में बदचलन घोषित करके दुष्चरित्र पुरुषों के पापों को ढंकने की परिपाटी चलती आ रही है। अदालतों के कठघरों में औरतों को जलील करना वकीलों के लिए एक आम बात रही है। आज अमेरिका में ऐसी गवाहियां देने वाली औरतों को कोई संदेह के दायरे में नहीं ला रहा है।

भारत में भी तनुश्री दत्ता ने अनायास ही सभ्यता विमर्श से जुड़े इस महत्वपूर्ण आंदोलन की एक लौ जला दी है। इसीलिए हमारे सामाजिक इतिहास में उन्हें इसके लिए हमेशा याद रखा जाएगा। अब क्रमश:, इससे हमारे समाज में आगे और कैसा और कितना आंदोलन पैदा होगा, यह तो भविष्य ही बताएगा। लेकिन जिस तरह से महिलाएं मुखर होकर अपनी बातें कह रही हैं उससे तो साफ है कि आंदोलन की गर्मी और बढ़ेगी और बहुत सारे भेडिय़े नंगे होंगे।
कोई भी नजारा अच्छा है या बुरा ये सीधे तौर पर हमारे देखने के नजरिए पर निर्भर करता है। इस अभियान का किसी ने समर्थन किया तो किसी ने विरोध। कुछ ने कहा कि ये सिर्फ ‘पब्लिसिटी’ पाने का तरीका है। अगर हम मान भी लें कि ये सब पब्लिसिटी पाने के लिए किया गया है तो क्या इस अभियान का हिस्सा बनने वाली हर महिला पब्लिसिटी के लिए अपनी आपबीती साझा कर रही है? ऐसा सोचना भी गलत है। क्योंकि इस बात को हम आप अच्छी तरह से जानते है कि हमारे समाज में जब कभी भी महिला अपने विचार अभियक्त करती है तब उसे आलोचना और विरोध का शिकार होना पड़ता है और ऐसे में अगर महिला अपने साथ हुई यौन-उत्पीडऩ की घटना के बारे में अपने अनुभव साझा कर रही है, तो ऐसे में विरोध होना लाजमी है।’क्योंकि हमारे यहाँ तो इसे घर की इज्जत बाजार में उछालना कहा जाता है।

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