धनधारियों के बीच होगा 2019 का महासंग्राम

अखिलेश अखिल

सबसे पहले इन आंकड़ों पर एक नजर दौड़ाइए तो समझ जाएंगे कि गरीबी मिटाने के नाम चुनावी नारे लगाने वाली राजनीतिक दलों की असलियत क्या है। आंकड़े बता रहे हैं कि बीजेपी ने चुनाव आयोग को दी जानकारी में बताया है कि उसने 2014 के चुनाव अभियान पर 714 करोड़ रुपये खर्च किए थे। कांग्रेस ने 516 करोड़ रुपये खर्च किए। शरद पवार की एनसीपी जैसी एक राज्य में दखल रखने वाली पार्टी ने 51 करोड़ रुपये खर्च किए। इसी तरह के आंकड़े देश की तमाम राजनीतिक दलों ने चुनाव आयोग को दिए हैं।

लेकिन इस जानकारी और आंकड़ों में वे खर्च शामिल नहीं है जो छुपा कर किये गए। जो खर्च उम्मीदवारों ने किये। जो खर्च पार्टी के सहयोगी सेठों ने किये और जो खर्च पार्टी के समर्थकों ने किये। कहा जाता है कि लोक सभा चुनाव में बड़े नेताओं द्वारा 10 -12 करोड़ की राशि खर्च की जाती है। पैसे के दम पर चुनाव को प्रभावित किया जाता है। जिसके पास जितना माल उसके जितने की संभावना ज्यादा हो जाती है। धनहीन उम्मीदवार वही जीत पाता है जिसकी पकड़ जनता में मजबूत होती है और जनता भी यह तय कर चुकी होती है कि चाहे उसे ही जीताना है। वरना गरीबो के लिए राजनीति किसी सपने से कम नहीं।

इन आंकड़ों से ही आप अनुमान लगा सकते हैं कि अगले लोक सभा चुनाव में खर्च की सीमा कितनी बढ़ जायेगी। कल्पना से परे। माना जा रहा है कि 2019 में उपरोक्त आंकड़ों के दोगुना और तीन गुना खर्च होने की संभावना है।एक आकलन है कि मई 2019 से पहले कम से कम 25000 करोड़ रुपये इधर से उधर होंगे। अगर आपको लगता है कि ये रकम बहुत ज्यादा है, तो आपको बता दें किहाल में ही’ में छपे एक अध्ययन में बताया गया है कि 2017 के उत्तर प्रदेश चुनाव पर लगभग 5,500 करोड़ रुपये खर्च हुए थे।

सिर्फ यूपी में साढ़े पांच हजार तो पूरे देश के बारे में आप खुद सोंच सकते हैं और वह भी लोकसभा चुनाव।अखबार और टीवी चैनल राजनीतिक प्रचार से अतिरिक्त कमाई करेंगे। इनमें से ज्यादातर प्रचार-विज्ञापन खबरों की तरह होंगे। बता दें कि राजनीतिक दल बिना किसी भावनात्मक दबाव के इस बात का आकलन और प्रयास करेंगे कि कैसा गठजोड़ उन्हें ज्यादा से ज्यादा फायदा पहुंचाएगा। कुछ नेता बाद में बड़े फायदे की उम्मीद में शुरुआती लाभ को छोड़ते हुए अपने विकल्पों को खुला रखेंगे। और ये सारे खेल पैसे से होते हैं। पैसे से बड़े बड़े राजनीतिक समीकरण बदलते देर नहीं लगते।

तो साफ़ है कि अगला लोक सभा चुनाव धनबल के सहारे लड़ा जाएगा। जो जितना बड़ा धनधारी होगा उसकी ठसक ज्यादा दिखेगी।उसके पैतरे ज्यादा मोहक होंगें और उसकी जेब में अधिकतर गोदी मीडिया होगी जो पैसे के लिए हर झूठी खबर को सच बना कर जनता के सामने पेश करने में कोई कमी नहीं करेगी। लेकिन असली सवाल है कि चुनाव लड़ने के लिए इतने धन आएंगे कहाँ से ? इस सवाल का जबाब तो आजतक कोई नहीं जान पाया। और इसका कोई जबाब दे भी तो उसमे सच्चाई की बू कम ही होगी। लेकिन इस सवाल के बीच एक जबाब भी हमारे सामने हैं। और वह तार्किक भी है।

राष्ट्रीय दलों की संपत्ति में पिछले 10 सालों में कई सौ गुना बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है। इसमें बीजेपी का स्थान पहला है। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स की एक रिपोर्ट में 2004-05 से 2015-16 के बीच बीजेपी की संपत्ति में 627 प्रतिशत की बढोत्तरी दर्ज की गई है। उसकी संपत्ति 122.93 करोड़ से 893 करोड़ रुपये पहुंच गई है। इसी दौरान कांग्रेस की संपत्ति 167 करोड़ से 758 करोड़ रुपए पहुंच गई है। बीजेपी, कांग्रेस, एनसीपी, बीएसपी, सीपीआई, सीपीआई-एम और तृणमूल कांग्रेस की संपत्ति पिछले 10 सालों में करीब 530 प्रतिशत की बढ़ी है।

इतना ही नहीं इन राष्ट्रीय पार्टियों की संपत्ति में भी तेजी से इजाफा हुआ है और पिछले 10 साल में उनकी संपत्ति पांच गुना से ज्यादा बढ़ी है। 2004-05 में इन दलों की औसत संपत्ति 61.62 करोड़ थी, जो 2015-16 में 388.45 करोड़ रुपये हो गई। अनुमान लगा सकते हैं कि पार्टियों की ये संपत्ति कहाँ से आ रही है। तो साफ़ है कि जिस पार्टी के पास जितने संपत्ति है उसी के मुताविक वह खेल भी करेगी। फिर बाहर से दाव लगाने वाले लोग और कंपनियां अलग से हैं। कह सकते हैं कि राजनीति गरीबी की होगी और चुनाव धनधारियो के बीच। आजाद भारत का खेल पूरी दुनिया देख कर विष्मित हो जाएगी।

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