धरती पर है एक ऐसी जगह, जहां हर 41 साल बाद लोगों से मिलने आते हैं हनुमान

नई दिल्ली: यकीन करों या न करो लेकिन सच है, आप लोगों ने आजतक सिर्फ कहानियों में या किताबों में भगवान के बारे सुनो होगा। लेकिन आज हम आपको बता रहे है जिन्दा भगवान के बारे में, जी हा आपने रामायण काल में शिव के ग्यारहवें अवतरण के रूप में जन्में हनुमान का वर्णन महाभारत काल में भी सुना होगा । इतने समय बीत जाने के बाद भी आज के गूगल युग में भी एक ऐसे भगवान के बारे में मिलता है जो आज भी जीवित हैं और वह है भगवान हनुमान जी। हनुमान ही एक ऐसे भगवान है जिनको आज भी देखा जा सकता है।

हमारे पुराणों, शास्त्रों में ऐसे पात्र जो आज भी जिंदा है जिनकी संख्या सात बतायी जाती है। इनमें से कुछ तो हजारों सालो से हैं तो कुछ लाखों सालों से जीवित हैं। इन्हीं में से हनुमान जी भी एक हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि इन्हें खुद भगवान ने चिरंजीवी होने का वरदान दिया था और वह आज भी साकार रूप में इस पृथ्वी पर अलग-अलग स्थानों पर विचरण करते हैं। यहां यह हम नहीं कह रहे हैं बल्कि सेतु एशिया नामक एक वेबसाइट ने दावा किया है कि इस धरती पर एक ऐसी जगह है जहाँ के लोगों से मिलने हनुमान जी प्रत्येक 41 साल बाद आते हैं और कुछ दिन वहां रहने के बाद वापस चले जाते है।

अब सवाल उठता है कि आखिर हनुमान जी यदि आते हैं तो उन लोगों से ही क्यों मिलते हैं और क्यों 41 साल के अंतर में आते हैं। इस बारे में सेतु एशिया ने अपनी वेबसाइट पर विस्तृत शोध प्रकाशित किया है।इसके साथ ही अभी तक कई अन्यों ने भी इसका दावा किया है कि हनुमान आज भी जिंदा है और वह इस पृथ्वी पर ही विचरण करने के साथ जगत कल्याण के लिए तपस्यारत हैं।

सेतु एशिया के शोधानुसार श्रीलंका के जंगलों में एक ऐसा कबीलाई समूह रहता है जोकि पूर्णत: बाहरी समाज से कटा हुआ है। उनका रहन.सहन और पहनावा भी अलग है। उनकी भाषा भी प्रचलित भाषा से अलग है। यह मातंग आदिवासी समुदाय है। सेतु एशिया के अनुसार हनुमान जी हर 41 साल में इनसे मिलने आते हैं। इस आध्यात्मिक संगठन का केंद्र कोलंबों में है जबकि इसका साधना केंद्र पिदुरुथालागाला पर्वत की तलहटी में स्थित एक छोटे से गांव नुवारा में है। इस संगठन का उद्देश्य मानव जाति को फिर से हनुमानजी से जोडऩा है। सेतु नामक इस आध्यात्मिक संगठन का दावा है कि इस बार 27 मई 2014 हनुमानजी ने इन आदिवासी समूह के साथ अंतिम दिन‍ बिताया था। इसके बाद अब 2055 में फिर से मिलने आएंगे हनुमानजी।

सेतु संगठन अनुसार इस कबीलाई या आदिवासी समूह को मातंग लोगों का समाज कहा जाता है। यहाँ यह बात उल्लेखनीय है कि हनुमान जी का जन्म भी मतंग ऋषि का आश्रम में हुआ था। श्रीलंका के पिदुरु पर्वत के जंगलों में रहने वाले मातंग कबीले के लोग संख्या में बहुत कम हैं और श्रीलंका के अन्य कबीलों से काफी अलग हैं। सेतु संगठन ने उनको और अच्छी तरह से जानने के लिए जंगली जीवन शैली अपनाई और इनसे संपर्क साधना शुरू किया। संपर्क साधने के बाद उन समूह से उन्हें जो जानकारी मिली उसे जानकर वे हैरान रह गए।

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अध्ययनकर्ताओं अनुसार मातंगों के हनुमानजी के साथ विचित्र संबंध हैं जिसके बारे में पिछले साल ही पता चला। फिर इनकी विचित्र गतिविधियों पर गौर किया गया तो पता चला कि यह सिलसिला रामायण काल से ही चल रहा है। इन मातंगों की यह गतिविधियां प्रत्येक 41 साल बाद ही सक्रिय होती है। मातंगों अनुसार हनुमानजी ने उनको वचन दिया था कि मैं प्रत्येक 41 वर्ष में तुमसे मिलने आऊंगा और आत्मज्ञान दूंगा। अपने वचन के अनुसार उन्हें हर 41 साल बाद आत्मज्ञान देकर आत्म शुद्धि करने हनुमानजी आते हैं। सेतु अनुसार जब हनुमानजी उनके पास 41 साल बाद रहने आते हैं, तो उनके द्वारा उस प्रवास के दौरान किए गए हर कार्य और उनके द्वारा बोले गए प्रत्येक शब्द का एक.एक मिनट का विवरण इन आदिवासियों के मुखिया बाबा मातंग अपनी हनु पुस्तिका में नोट करते हैं। 2014 के प्रवास के दौरान हनुमानजी द्वारा जंगल वासियों के साथ की गई सभी लीलाओं का विवरण भी इसी पुस्तिका में नोट किया गया है।

सेतु ने दावा किया है कि हमारे संत पिदुरु पर्वत की तलहटी में स्थित अपने आश्रम में इस पुस्तिका तो समझकर इसका आधुनिक भाषाओँ में अनुवाद करने में जुटे हुए हैं ताकि हनुमानजी के चिरंजीवी होने के रहस्य जाना जा सके लेकिन इन आदिवासियों की भाषा पेचीदा और हनुमानजी की लीलाएं उससे भी पेचीदा होने के कारण इस पुस्तिका को समझने में काफी समय लग रहा है। यह पर्वत श्रीलंका के बीचोबीच स्थित है जो श्रीलंका के नुवारा एलिया शहर में स्थित है। पर्वतों की इस श्रृंखला के आसपास घंने जंगल है। इन जंगलों में आदिवासियों के कई समूह रहते हैं।

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