नव संवत्सर: शुक्र हैं इस वर्ष के राजा हैं सूर्य और मंत्री हैं शनि

लखनऊ: हिंदू पंचांग में नववर्ष का आरंभ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा यानी ‘गुड़ी पड़वा’ से माना जाता है जो कि इस बार 8 अप्रैल को पड़ रहा है| हिन्दू मान्यताओं के अनुसार, यह दिन सृष्टि रचना का पहला दिन है| इस दिन चैत्र नवरात्रि भी प्रारंभ होती है| हिन्दू परम्परा के अनुसार इस दिन को ‘नव संवत्सर’ या ‘नव संवत’ के नाम से भी जाना जाता है| हिंदू पंचांग के मुताबिक, इस वर्ष 18 मार्च को विक्रम संवत् 2075 प्रारंभ हो गया है| नव संवत् के राजा इस बार सूर्य व मंत्री शनि हैं। खास यह कि संवत 2075 का आगमन मीन लग्न और मीन राशि में हो रहा है। मीन लग्न में चतु‌र्ग्रही योग बना है और इसमें ही नव संवत्सर का आगमन हो रहा है। इसी दिन ब्रह्मा जी ने जगत की रचना प्रारंभ की थी इसीलिए हम चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नए साल का आरम्भ मानते हैं| हिन्दू पंचांग का पहला महीना चैत्र होता है| यही नहीं शक्ति और भक्ति के नौ दिन यानी कि नवरात्रि स्थापना का पहला दिन भी यही है| ऐसी मान्यता है कि इस दिन नक्षत्र शुभ स्थिति में आ जाते हैं और किसी भी नए काम को शुरू करने के लिए यह मुहूर्त शुभ होता है|

क्यों मनाते हैं ‘गुड़ी पड़वा’-

चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा को गुड़ी पड़वा या नववर्ष आरम्भ होता है| ‘गुड़ी’ का अर्थ होता है ‘विजय पताका’| कहा जाता है कि शालिवाहन नामक एक कुम्हार के लड़के ने मिट्टी के सैनिकों का निर्माण किया और उनकी एक सेना बनाकर उस पर पानी छिड़कर उनमें प्राण फूंक दिए| उसने इस सेना की सहायता से शक्तिशाली शत्रुओं को पराजित किया| इसी विजय के प्रतीक के रूप में ‘शालिवाहन शक’ का प्रारंभ हुआ| महाराष्ट्र में यह पर्व ‘गुड़ी पड़वा’ के रूप में मनाया जाता है| कश्मीरी हिन्दुओं के लिए नववर्ष एक महत्वपूर्ण उत्सव की तरह है|

इसी तिथि से प्रारंभ होता है विक्रम संवत्-

भारतीय इतिहास में जनप्रिय और न्यायप्रिय शासकों की जब भी बात चलेगी तो वह उज्जैन के राजा विक्रमादित्य के नाम के बगैर पूरी नहीं हो सकेगी। उनकी न्यायप्रियता के किस्से भारतीय परिवेश का हिस्सा बन चुके हैं। विक्रमादित्य का राज्य उत्तर में तक्षशिला जिसे वर्तमान में पेशावर (पाकिस्तान) के नाम से जाना जाता हैं, से लेकर नर्मदा नदी के तट तक था। उन्होंने यह राज्य मध्य एशिया से आये एक शक्तिशाली राजा को परास्त कर हासिल किया था। राजा विक्रमादित्य ने यह सफलता मालवा के निवासियों के साथ मिलकर गठित जनसमूह और सेना के बल पर हासिल की थी| विक्रमादित्य की इस विजय के बाद जब राज्यारोहण हुआ तब उन्होंने प्रजा के तमाम ऋणों को माफ करने का ऐलान किया तथा नए भारतीय कैलेंडर को जारी किया, जिसे विक्रम संवत नाम दिया गया|

इतिहास के मुताबिक, अवन्ती (वर्तमान उज्जैन) के राजा विक्रमादित्य ने इसी तिथि से कालगणना के लिए ‘विक्रम संवत्’ का प्रारंभ किया था, जो आज भी हिंदू कालगणना के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण माना जाता है| कहा जाता है कि विक्रम संवत्, विक्रमादित्य प्रथम के नाम पर प्रारंभ होता है जिसके राज्य में न तो कोई चोर हो और न ही कोई अपराधी या भिखारी था| वहीँ, अगर ज्योतिष की माने तो प्रत्येक संवत् का एक विशेष नाम होता है| विभिन्न ग्रह इस संवत् के राजा, मंत्री और स्वामी होते हैं| इन ग्रहों का असर वर्ष भर दिखाई देता है| सिर्फ यही नहीं समाज को श्रेष्ठ (आर्य) मार्ग पर ले जाने के लिए स्वामी दयानंद सरस्वती ने इसी दिन को ‘आर्य समाज’ स्थापना दिवस के रूप में चुना था|

संस्कृति से जोड़ता है विक्रम संवत्-

गुलामी के बाद अंग्रेजों ने हम पर ऐसा रंग चढ़ाया ताकि हम अपने नववर्ष को भूल उनके रंग में रंग जाए| उन्ही की तरह एक जनवरी को ही नववर्ष मनाये और हुआ भी यही लेकिन अब देशवासियों को यह याद दिलाना होगा कि उन्हें अपना भारतीय नववर्ष विक्रमी संवत बनाना चाहिए, जो आगामी 8 अप्रैल को है| वैसे अगर देखा जाये तो विक्रम संवत् ही हमें अपनी संस्कृति से जोड़ता है| भारतीय संस्कृति से जुड़े सभी समुदाय विक्रम संवत् को एक साथ बिना प्रचार और नाटकीयता से परे होकर मनाते हैं और इसका अनुसरण करते हैं| दुनिया का लगभग हर कैलेण्डर सर्दी के बाद बसंत ऋतु से ही प्रारम्भ होता है| यही नहीं इस समय प्रचलित ईस्वी सन बाला कैलेण्डर को भी मार्च के महीने से ही प्रारंभ होना था|

आपको बता दें कि इस कैलेण्डर को बनाने में कोई नयी खगोलीय गणना करने के बजाए सीधे से भारतीय कैलेण्डर (विक्रम संवत) में से ही उठा लिया गया था| 12 महीनों के नाम- ऐसा कहा जाता है कि पृथ्वी द्वारा 365/366 दिन में होने वाली सूर्य की परिक्रमा को वर्ष और इस अवधि में चंद्रमा द्वारा पृथ्वी के लगभग 12 चक्कर को आधार मानकर कैलेण्डर तैयार किया और क्रम संख्या के आधार पर उनके नाम रखे गए हैं| हिंदी महीनों के 12 नाम हैं चैत्र, बैशाख, ज्‍येष्‍ठ, आषाढ, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ और फाल्‍गुन|

नव संवत का राजा सूर्य और मंत्री शनि होने को ठीक संकेत नहीं माना जा रहा लेकिन भारत का विश्व में प्रभुत्व बढे़गा। ख्यात ज्योतिषाचार्य पं. ऋषि द्विवेदी के अनुसार राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय व्यापार में पूंजी निवेश की अभिवृद्धि होगी। मित्र देशों का सहयोग समर्थन प्राप्त होगा। स्त्री हित में तमाम नए कानूनादि का निर्माण होगा। हालांकि बड़े नेताओं या केंद्र-राज्य की सत्ता व नौकरशाहों में मतभेद दिखेगा। देश के पश्चिमोत्तर में हिंसक घटनाओं की अधिकता हो सकती है। पड़ोसी राष्ट्रों से अत्यधिक सावधान रहने की आवश्यकता होगी। शेयर बाजार में भारी उतार चढ़ाव देखने को मिलेगा। इस संवत में अच्छी और समय पर बारिश की उम्मीद जताई जा रही है। इससे अनाज और फलों की पैदावार अच्छी होगी। लोग सुविधाओं का अधिक इस्तेमाल कर सकेंगे। किसान और व्यापारी वर्ग का लाभ बढ़ेगा।

इस मार्च महीने में सूर्य, मंगल, बुध और शुक्र राशि बदलेंगे। वहीं गुरु ग्रह की चाल टेढ़ी हो जाएगी। सितारों की ये स्थिति कुछ लोगों की लाइफ में बड़े बदलाव कर सकती है। इन ग्रहों के कारण वृष, सिंह और मीन राशि वाले नौकरीपेशा लोगों को तरक्की मिल सकती है। नौकरी बदलने की सोच रहे हैं तो बहुत अच्छे आॅप्शन मिल सकते हैं। करियर में आगे बढ़ने के अच्छे मौके मिल सकते हैं। वहीं मेष, कर्क, कन्या, तुला, धनु और कुंभ राशि वालों की आर्थिक स्थिति में सुधार होगा। बिजनेस करने वालों को रुका हुआ पैसा मिल सकता है। फायदे वाले निवेश होंगे और कुछ लोगों को अचानक धन लाभ भी हो सकता है। इनके अलावा अन्य राशि वाले लोगों के लिए ये महीना मिला-जुला रहेगा। इन सितारों का आपकी सेहत पर भी असर पड़ेगा।

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