नाम है क्षेत्रीय पार्टी और कमाई में सबसे ज्यादा, पांच वर्षों में सपा की संपत्ति में 98 फीसदी का इजाफा

लखनऊ ब्यूरो: लोकतंत्र में जनता को सबका हिसाब रखने का हक़ तो है लेकिन जनता ऐसा करती नहीं। वह एक कमोडिटी की तरह नेताओं और पार्टियों की भेंट चढ़ती रहती है। देश की राजनीति ने जनता को बौना बनाकर रख छोड़ा है। उसकी औकात को इतना कमतर कर दिया गया है कि उसकी जुबान खुलती ही नहीं। इधर एडीआर ने क्षेत्रीय पार्टियों की संपत्ति के बारे में जो रिपोर्ट जारी की है वह बहुत कुछ बताती है। रिपोर्ट देखने से पता चलता है कि देश की अधिकतर क्षेत्रीय पार्टियां जनता का भला करे या न करे, लोकतंत्र को मजबूत करे या न करे लेकिन अपना भला पूरे मन से करती है। डंके की चोट पर करती है। बिना भय के, बिना लाज और शर्म के। सवाल उठ सकता है कि आखिर इतनी संपत्ति इन पार्टियों को आती कहाँ से हैं ? लेकिन सवाल करेगा कौन ?

एडीआर की रिपोर्ट के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में 2012 से 2017 तक सत्तारूढ़ रही समाजवादी पार्टी की संपत्ति में पांच वर्षों के दौरान 198 फीसदी का इजाफा हुआ है। इतने ही समय में तमिलनाडु में सरकार चला रही अन्नाद्रमुक की संपत्ति 155 फीसद बढ़ी है। महाराष्ट्र में भाजपा की सहयोगी शिवसेना की संपत्ति में 92 फीसद की बढ़ोतरी हुई है। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स द्वारा 22 क्षेत्रीय पार्टियों की संपत्ति पर जारी रिपोर्ट से इस बात की जानकारी मिली है।

वित्त वर्ष 2011-12 से 2015-16 के मध्य पार्टियों द्वारा घोषित संपत्ति के विश्लेषण पर यह रिपोर्ट तैयार की गई है। रिपोर्ट के अनुसार, 2011-12 में समाजवादी पार्टी ने अपनी संपत्ति 212.86 करोड़ रुपए बताई थी। 2015-16 में इसकी संपत्ति बढ़कर 634.96 करोड़ हो गई। इसी तरह अन्नाद्रमुक की संपत्ति इस अवधि में 88.21 करोड़ रुपए से बढ़कर 224.87 करोड़ रुपए हो गई। इसी अवधि में शिवसेना की संपत्ति 20.59 करोड़ रुपए से बढ़कर 39.56 करोड़ हो गई।

राजनीति में शुचिता का नारा देने वाली आम आदमी पार्टी की संपत्ति में भी काफी इजाफा हुआ है। नवंबर 2012 में इस पार्टी का रजिस्ट्रेशन हुआ था। 2012-13 में इसके पास 1.16 करोड़ की संपत्ति थी। 2015-16 में यह बढ़कर 3.76 करोड़ हो गई। राष्ट्रीय पार्टियां इस पर सवाल कर सकती थी। लेकिन वह किस मुँह से सवाल करे ? उनकी कमाई तो और भी ज्यादा है ? जब वे पाने कमाई का श्रोत नहीं बताते तो फिर दुसरा क्यों बताये। खेल यही है कि सब मिल बाँट कर खाओ और एक दूसरे को चोर कहकर जनता को भ्रमित करते रहो। लोकतंत्र का यह एक नया शगल है।

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