नीतीश और पासवान की युगलबंदी से नए सियासी समीकरण के संकेत

अखिलेश अखिल

लम्बी चुप्पी के बाद जब कोई नेता बोलता है तो उसका कोई सियासी मतलब ही होता है। बेमतलब नेता नहीं बोलते। नेतागिरी करना और नेता होना दोनों अलग अलग बातें है। स्थानीय स्तर की नेतागिरी में लम्पटता भी होती है लेकिन सियासी नेता के बोल वर्तमान और भविष्य की राजनीति को इंगित करने वाले होते हैं। बिहार में अभी कुछ ऐसा ही दिख रहा है। केंद्र सरकार में वरिष्ठ मंत्री रामविलास पासवान 4 सालों में पहली बार मोदी सरकार में रहते हुए बीजेपी पर अप्रत्यक्ष रूप से दलितों और अल्पसंख्यकों के हितों की उपेक्षा करने का आरोप लगाते हैं और उसके अगले दिन बिहार के सीएम नीतीश कुमार उनकी बातों के समर्थन में आ जाते हैं तो इसका कुछ अर्थ तो होगा ही।

राजनीति में दोनों मंझे हुए खिलाड़ी है। कई लोग इसे संयोग मानकर ख़ारिज कर रहे हैं। लेकिन यह महज संयोग नहीं है। रामविलास पासवान और नीतीश कुमार की युगलबंदी नये सियासी समीकरण का संकेत है जो बीजेपी को बड़ा संदेश देना चाहती है। दोनों की चिंता बिहार से लेकर दिल्ली तक न सिर्फ उनकी उपेक्षा को लेकर है बल्कि सहयोगी रहते हुए भी उनके राजनीतिक स्पेस में हस्तक्षेप का मुद्दा भी है।

मालूम हो कि दो दिन पहले नीतीश कुमार ने पटना में कहा था कि वह किसी भी गठबंधन के साथ रहें, लेकिन उनकी मूल अवधारणा में बदलाव नहीं हुआ है। उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार और समाज को तोड़ने व बांटने वाली नीति से समझौता नहीं कर सकते। उन्होंने इशारों में पिछले कुछ दिनों में बिहार से केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह के भड़काऊ बयानों पर ऐतराज जताया था। नीतीश कुमार ने रामविलास पासवान के उस बयान का भी समर्थन किया जिसमें उन्होंने बीजेपी से दलित, अल्पसंख्यक के हित के लिए और गंभीरता से सोचने को कहा था।

जेडीयू और एलजेपी नेताओं से बात करने से पता चलता है कि अभी दोनों दलों का एनडीए से अलग होने का कोई इरादा नहीं है। लेकिन दोनों दल के नेता इस बात को स्वीकार करते हैं कि बीजेपी ने उन्हें सहयोगी होने का उचित स्थान भी नहीं दिया है। दलित नेता के रूप में स्थापित रामविलास पासवान को पिछले 4 सालों में राजनीतिक रूप से कोई मंच नहीं दिया और दूसरे दलित नेताओं को सामने लाया गया।

दूसरी तरफ जिस उत्साह से नीतीश कुमार को आरजेडी से गठबंधन तोड़कर एनडीए में शामिल किया गया, बाद में यहां भी इन्हें हाशिए पर रखने की कोशिश की गई। यही बात रामविलास और नीतीश दोनों को करीब लाने वाला कॉमन फैक्टर बना। सूत्रों के अनुसार पिछले कुछ दिनों से दोनों लगातार संपर्क में हैं और सियासी घटनाक्रम को लेकर दोनों एक साझा रणनीति पर काम कर रहे हैं। दोनों की चिंता 2019 में सीटों के हिस्से को लेकर भी है।

सूत्रों के अनुसार नीतीश कुमार ने बीजेपी नेतृत्व से बार-बार इस बारे में अभी से स्थिति साफ करने का कहा ताकि पार्टी कार्यकर्ताओं में उलझन न रहे लेकिन उनकी बात नहीं मानी गई। यही स्थिति रामविलास को लेकर है। जेडीयू के एक नेता ने बताया कि अगर नीतीश कुमार और रामविलास पासवान की ताकत को एक साथ जोड़ ले तो वे बिहार में अब भी सियासी समीकरण में सबपर भारी पड़ेंगे। नीतीश कुमार ने रामविलास पासवान के साथ नजदीकी कर यह भी संदेश दे दिया।

इन दोनों नेताओं की अगली राजनीति क्या होगी, कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन इतना तो साफ़ हो गया है कि पासवान जी की बोली ऐसे समय में आयी है जब देश में लोकसभा चुनाव का चौसर बिछ चुका है। संभव हो कि अपनी बात से वे बीजेपी को संकेत दे रहे हों लेकिन इस बात की संभावना भी जताई जा रही है कि बीजेपी को बाँधने के लिए जो संभावित मोर्चा बनता दिख रहा है उसमे भी वे अपनी भूमिका तलाश रहे हों।

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