नीतीश की नई राजनीति बीजेपी को घायल करेगी

अखिलेश अखिल

नई दिल्ली: बिहार की राजनीति फिर करवट लेती दिख रही है। लालू प्रसाद के जेल जाने के बाद जहां एक तरफ यादव वोट बैंक पर बीजेपी की नजरें टिकी हुयी है वहीँ नीतीश कुमार भी राजनीति के नए गुना भाग के जरिए नए जमात की राजनीति को रंगीन करने में जुटे हैं। बिहार का यादव वोट अगले लोक सभा चुनाव तक किस करवट बैठेगा और बीजेपी यादव समुदाय को कितना प्रभावित कर लालू प्रसाद से जुडी उनकी माया को तोड़ पाएगी अभी इसके लिए इन्तजार करना पड़ सकता है लेकिन यह बात साफ़ है कि नीतीश कुमार आगामी राजनीती को धार देने के लिए कई जमातों की राजनीति के जरिये जदयू को मजबूत कर बीजेपी को भी चुनौती देने की जुगत बना रहे हैं। नीतीश कुमार की नयी राजनीति महादलित ,अतिपिछड़ा और दलितों को एक मंच पर लाकर राजनीति की नयी धारा बहाने की है। नीतीश की यह राजनीती बीजेपी को भी घायल कर सकती है।

मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू होने के बाद पिछले तीन दशक में पहले बीस साल पिछड़ा राजनीति हुई, फिर अगले करीब दस साल अतिपिछड़ा राजनीति हुई और अब दलित राजनीति का दांव चलने की तैयारी है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार यह दांव चलने वाले हैं। बताया जा रहा है कि भाजपा से आशंकित नीतीश कुमार की पार्टी अतिपिछड़ा, दलित और महादलित का समीकरण बना रही है। नीतीश कुमार के इस सियासी खेल में दलित नेता रामविलास पासवान भी खड़े दीखते हैं। आपको बता दें कि पासवान अभी बीजेपी की सहयोगी है और काफी भरोसेमंद भी।

बताया जा रहा है कि देश भर में इस समय जैसे दलितों का आंदोलन शुरू हुआ है और हर जगह भाजपा को दलित विरोधी बता कर निशाना बनाया गया है, उससे पासवान परेशान हुए हैं। उन्होंने सहारनपुर से लेकर उना और भीमा कोरेगांव की घटना पर चुप्पी साधे रखी। पर अब उनसे सवाल पूछे जा रहे हैं। इसलिए कहा जा रहा है कि वे दुविधा में हैं। अगर नीतीश कुमार भाजपा से अलग कोई लाइन लेते हैं तो पासवान की पार्टी उनके साथ जा सकती है। इधर जब से नीतीश कुमार ने पासवान के भाई को मंत्रिमंडल में शामिल किया है नीतीश के प्रति पासवान का नुराग कुछ ज्यादा ही बढ़ गया है।

नीतीश कुमार की समझ यह है कि पासवान दलित राजनीति को बिहार में आगे बढ़ाएं जबकि अति पिछड़ी राजनीति का चेहरा वे खुद ही हैं। महादलित राजनीति को आगे बढ़ाने के लिए नीतीश कुमार प्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष अशोक चौधरी को जदयू में लाना चाहते हैं। नीतीश यह भी चाहते हैं कि ना सिर्फ चौधरी जदयू में आये वल्कि कुछ विधायकों को भी लाये। खेल जारी है। अशोक चौधरी का मन भी डोल रहा है और वे अब कांग्रेस का भी विश्वास खो बैठे हैं। जाहिर है अशोक को क्या करना है इसका निर्णय अब उनके ऊपर है। जदयू में जाकर वे न सिर्फ महादलित जमात के नेता बनेंगे वल्कि सरकार में मंत्री भी बनेंगे। दोनों हाथ में लड्डू।

बिहार की राजनीति यह भी दिखाती है कि पासवान और नीतीश के साथ सवर्ण वोट भी है। यह एक अजीब इत्तेफाक है। बिहार का सवर्ण मतदाता बटा हुआ है। सवर्ण बीजेपी के पास भी है और पासवान -नीतीश के पास भी। इसके कई कारण हैं। अगर सब कुछ ठीक ठाक चलता रहा तो बहुत जल्द ही बिहार में अति पिछड़ा ,महादलित और दलित नेताओं का संगम होगा और टारगेट पर कांग्रेस ,राजद के साथ बीजेपी भी होगी।

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