न तुम बेवफा हो…न हम बेवफा हैं..!

जब-जब चुनावी मौसम होता है उस समय दलबदल भी आम हो जाता है। कोई सुबह कहीं, दोपहर में कहीं और शाम को कहीं और नजर आता है। आस पर ही आसमान टिका है और कभी-कभी जब तक आस टूट न जाये तब तक उस खूंटे से बंधे रहते हैं जो उनके लिए बेगाना हो चुका होता है, लेकिन समझते हुए भी जब तक खूंटा ही न उखाड़ लिया जाए उस दर पर चिपके रहते हैं जहां कोई उन्हें साथ रखना भी गवारा नहीं करता। इशारों-इशारों में मंशा जाहिर कर दी जाती है लेकिन यदि कोई इशारा न समझना चाहे तो उसकी हालत कुछ वैसी ही होती है जैसी छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री और छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस (जे) के अध्यक्ष अजीत जोगी की पत्नी और कांग्रेस विधायक डॉ. रेणु जोगी की हो गयीं। अंतत: कांग्रेस ने जब उनकी टिकिट काट दी तब कहीं जाकर रेणु ने कांग्रेस को अलविदा कहा और अपने पति की पार्टी का दामन थाम लिया।

इस अवसर पर उन्होंने केवल इतना कहा कि-न तुम बेवफा हो न हम बेवफा हैं मगर क्या करें अपनी राहें जुदा हैं। रेणु जोगी ने फिल्म के जिस गाने से अपनी बात की शुरुआत की वह उनके हालातों पर भी मौजू है जिस पर उनकी और उनके पति की राहें जुदा-जुदा हो गयीं और इस पर भी मौजू है कि अब पति और उनकी राहें तो एक हो गईं और हमसफर एक ही दल में आ गए, पर सोनिया गांधी और कांग्रेस से उनकी राहें जुदा हो गयीं। रेणु जोगी ने हमेशा यह दलील दी कि वे कांग्रेस में रहेंगी क्योंकि उनके सोनिया गांधी से अति विश्‍वासपूर्ण आत्मीय रिश्ते हैं। उन्हें जब कांग्रेस विधायक दल के उपनेता पद से हटा दिया गया और कांग्रेस में चुनाव संबंधी किसी भी कमेटी में नहीं रखा गया तब भी वे इस आस में बैठी रहीं, कि कम से कम उन्हें चुनाव में कांग्रेस की एक अदद टिकिट तो मिल ही जायेगी।

जब कांग्रेस ने टिकिट काट दी तब उन्होंने सोनिया गांधी को भावनाओं से भरी और उलाहनों से पटी चिट्ठी लिख डाली, और पति की पार्टी में जा पहुंचीं। हालांकि दो दिन पूर्व ही उनके नाम से कोटा सीट से छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस से उम्मीदवारी का फार्म खरीद लिया गया था,जिसको लेकर रेणु ने कहा था कि न तो मैंने किसी को अधिकृत किया है और न फार्म खरीदने को कहा है, लेकिन बाद में वही फार्म उनके काम आया।

दल बदलने वाला कोई न कोई ऐसा तर्क गढ़ ही लेता है जिसे वह समझता है कि उसकी राहें जुदा होने का यही कारण है। कांग्रेस के सांसद व विधायक रहे प्रेमचंद गुड्डू और उनके बेटे अजीत बोरासी ने भाजपा की सदस्यता ले ली तब उन्हें लगा कि मध्यप्रदेश में कांग्रेस राजा-महाराजाओं के हवाले हो गयी है। अब गुड्डू का चश्मे का नम्बर या तो बदल गया है या फिर उन्हें पहले यह आभास नहीं था कि मध्यप्रदेश कांग्रेस में कब राजा-महाराजाओं का दबदबा नहीं रहा। केवल उस स्थिति को छोड़कर जबकि प्रदेश की बागडोर द्वारकाप्रसाद मिश्र, श्यामाचरण शुक्ल और और प्रकाशचंद सेठी के हाथों में रही।

जब गुड्डू का राजनीतिक कैरियर कांग्रेस में बन रहा था तब तो कांग्रेस में अर्जुनसिंह, माधवराव सिंधिया और दिग्विजय सिंह तथा कमलनाथ का ही बोलवाला था, और आज भी कमलनाथ,दिग्विजय सिंह, ज्योतिरादित्य और अजयसिंह का बोलवाला है। अब इससे तो यही कहा जायेगा कि गुड्डू ने राहें जुदा करने से पूर्व चश्मे का नम्बर बदल लिया है। और कोई न कोई बहाना बनाना था तो राजा महाराजाओं पर ठीकरा फोड़ दिया।

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