पद्मावती याद हो तो रानी भवानी और बाईसा और किरण देवी क्यों नहीं

नई दिल्ली: सालों से हम यह रोना रोते आए हैं कि भारतीय फिल्मकारों को हॉलीवुड का नशा चढ़ा है। करोड़ों-अरबों की फिल्म में भारत के इतिहास-नायकों और संस्कृति को जगह ही नही मिलती और अब जब हिन्दुस्तानी सिनेमा या कोई निर्माता-निर्देशक ऐसा साहस और सामथ्र्य जुटा रहा है तो हम गर्दभ-राग और भेंड़चाल अपनाए हुए हैं? भंसाली साहब ने रानी पदमावती का परिचय पूरी दुनिया से कराने जा रहे हैं, इसके लिए उनका मिलेनियम शुक्रिया। रानी पदमावती की तरह ही रानी भवानी और बाईसा किरणदेवी, तीनों ऐसी राजपूताना सिंहणियां थी जिन्होंने युदध लडक़र, जीतकर या जान गंवाकर अपने सतीत्व की रक्षा की थी जबकि उनके समक्ष सम्राट अकबर, नवाब सिराजुददौला और अलाउद्दीन खिलजी जैसे शासक थे.

भारत एक बार फिर से उबल पड़ा है। इस बार जो हलचल और हलातोल मचा है, वह बॉलीवुड की नई फिल्म पदमावती को लेकर है। दिसंबर में रिलीज होनी थी मगर राजपूताना संगठन और वैचारिक चमचागिरी का मक्खन पोंछने में माहिर धर्म-संस्कृति के तथाकथित ठेकेदारों की आपत्ति के बाद सरकार ने रिलीज—डेट को धकिया दिया है। बहस-मुबाहिसा और राजपूताना धमकियों से गुजरने के बाद तय किया गया है कि फरवरी में सेंसर बोर्ड की एक कमिटी फिल्म की स्क्रीनिंग करेगी और उसके बाद ही तय होगा कि पदमावती बड़े पर्दे पर जौहर दिखा पाती है या नही?

पहले तो साफ कर दूं कि मैं फिल्म के विरोध में नही हूं। सालों से हम यह रोना रोते आए हैं कि भारतीय फिल्मकारों को हॉलीवुड का नशा चढ़ा है। वे चोरी की स्क्रिप्ट और तकनीक का इस्तेमाल कर हमें फिल्मी पर्दे की ओर खींचते हैं और मुनाफा कमाते हैं। यह भी सच था कि करोड़ों-अरबों की फिल्म में भारत के इतिहास-नायकों और संस्कृति को जगह ही नही मिलती थी, पर अब जबकि ट्रेण्ड बदला है और हिन्दुस्तानी सिनेमा या कोई निर्माता-निर्देशक ऐसा साहस और सामथ्र्य जुटा रहा है तो हम गर्दभ-राग और भेड़चाल अपनाए हुए हैं? भंसाली साहब रानी पदमावती का परिचय पूरी दुनिया से कराने जा रहे हैं, इसके लिए उनका मिलेनियम शुक्रिया। मुगलेआजम और बाहुबली जैसी फिल्मों के निर्माता भी भारतीय स्वाभिमान को रंग-संसार में स्थापित कर चुके हैं।

भारतीय नारियां सर्जक हैं तो अपनी इज्जत और सम्मान के लिए विध्वंसक भी हो जाती हैं। इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है। रानी पदमावती की कहानी तो जुबां—जुबां पर आ चुकी है लेकिन पश्चिम बंगाल से लगे नाटौर राज्य की स्वामिनी रानी भवानी के शौर्य की कहानी अभी भी इतिहास की गर्द में ही दबी है जबकि दोनों ही रानियों ने कामपिपासु मुस्लिम आक्रांताओं से जंग लडी। पदमावती ने यदि जौहर रचा तो रानी भवानी ने 50 हजार सैनिकों के साथ नवाब सिराजुददौला से मुकाबला किया और मुगल बादशाह की सेना को पराजित कर अपने राज्य की रक्षा की थी।

दुनिया की हर विवाहित स्त्री के लिए उसका सतीत्व बेहद अहम होता है जिसकी रक्षा वह जान चुकाकर करती है। पं. माधवराव सप्रे जी ने सन् 1901 में छत्तीसगढ़-मित्र में रानी भवानी के साहस और शौर्य की गाथा प्रकाशित की थी। इस युद्ध के धरातल में भी मुस्लिम शासक की कामपिपासा ही थी। दरअसल सिराजुददौला की बुरी नजर महारानी भवानी की खूबसूरत सुपुत्री पर पड़ गई थी। उसने रानी को हुकुम दिया कि वह अपनी बिटिया को उसके हरम में भेजे अन्यथा उसे युद्ध का सामना करना पड़ेगा। निश्चित ही उस समय रानी के समक्ष आत्मसमर्पण अन्यथा युदध करने के विकल्प मौजूं रहे होंगे मगर रानी ने हथियार डालने के बजाय पचास हजार सिपाहियों के साथ नवाब सिराजुददौला से मुकाबला किया और मुगल बादशाह की सेना को पराजित कर अपने राज्य तथा बेटी के सम्मान की रक्षा की थी।

हमने बचपन से ही दो महान राजाओं को जाना है। एक था अकबर महान और दूसरे राजा अशोक। सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक संदेश को समझें तो किवदंती हैं कि अकबर प्रतिवर्ष दिल्ली में नौरोज का मेला आयोजित करता था जिसमें पुरूषों का प्रवेश वर्जित था लेकिन एक दिन खुद अकबर स्त्रियों के भेष में उस मेले के अंदर पहुंचा जहां चित्तौडग़ढ़ के महाराणा प्रताप सिंह के छोटे भाई महाराज शक्ति सिंह की पुत्री बाईसा किरणदेवी मौजूद थी। अकबर की बुरी नजर किरणदेवी पर पड़ गई और उसने धोखे से उन्हें कैदकर अपने महल में बुला लिया। जैसे ही अकबर ने बाईसा को स्पर्श करने की कोशिश की, बहादुर किरणदेवी ने अकबर को नीचे पटककर उसकी छाती पर पैर रखकर कटार गर्दन पर लगा दी और दुबारा ऐसा दुस्साहस ना करने को चेताया। उसके बाद अकबर ने उस मेला को बंद करवा दिया था। पूरी घटना का वर्णन संगत—रासो नामक पुस्तक के 632वें पृष्ठ पर मिलता है।

यह विरोध हमेशा होता आया है और होना भी चाहिए कि भारतीय इतिहास नायकों को महज मनोरंजन और कमाई के लिए मोहरा नही बनाया जा सकता। विश्वविजेता बनने का सपना देखते हुए सिकंदर महान भारत की कश्मीर घाटी में पहुंचा था जहां उसका मुकाबला राजा पोरस से हुआ था। लम्बे संघर्ष के बाद सिकंदर को करारी शिकस्त मिली थी और मेसेडोनिया का राजा टूटे सपने के साथ भारत से विदा हुआ था। मान लें कि कल से कोई निर्माता निर्देशक इस कहानी पर फिल्म बनाता है तो क्या सिकंदर को हीरो और पोरस को महज छोटे लड़ाके के तौर पर स्थापित कर देगा?

फिर दूध का जला छांछ भी फूंककर पीता है मगर फिल्म पदमावती के निर्माता निर्देशक भंसाली को शायद अपनी इज्जत से ज्यादा फिल्म से होने वाली कमाई की फिक्र है अन्यथा एक साल पहले जयपुर में पदमावती फिल्म की शूटिंग के दौरान उनके चेहरे पर जब थप्पड़ रसीद हुआ था तभी संज्ञान हो जाना था कि आगे की राह कितनी दुर्गम है? पदमावती फिल्म विवाद से एक और बू आ रही है, वह है राजनीतिक धु्रवीकरण की। पहले गुजरात और फिर राजस्थान में होने वाले विधानसभा चुनाव को देखते हुए इस विवाद का पूरा फायदा उठाया जा रहा है।

संज्ञान है कि फिल्म में हिन्दु—मुस्लिम रसायन का जबरदस्त मिश्रण है और यही दो वोट बैंक, भारतीय राजनीति को खासा प्रभावित करते रहे हैं इसलिए विवाद को लम्बा खिंचवाया जा रहा है। राजस्थान से सटे गुजरात की 25 विधानसभा सीटों पर करणी सेना का खासा प्रभाव है। सेंसर बोर्ड भी किसी की उंगलियों पर नाच रहा दिखता है सो फिल्म की रिलीज—डेट धकियाई जा रही है। रही बात भंसाली की तो उन्हें बैठे—बिठाए वह पब्लिसिटी मिल रही है जो टीवी—चैनलों को करोड़ों के विज्ञापन देने के बाद भी शायद ही प्राप्त होती। अलबत्ता भारतीयों को चाहिए कि वे फिल्मों का अर्थशास्त्र, हिट कराने का फार्मूला और बाजारी विवशताओं को समझें अन्यथा हॉलीवुड का जयकारा लगाते रहिएगा।

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