पहचान मिटाने की साजिश

‘मीडिया शेड्यूल कास्ट (अनुसूचित जाति) से जुड़े लोगों का जिक्र कर करते वक्त ‘दलित’ शब्द के उपयोग से बचे।’ यह एडवायजरी जारी की है सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने। सरकार का कहना है कि चूंकि संविधान में ‘अनुसूचित जाति’ शब्द का ही उल्लेख है, इसलिए ऐसी जातियों को ‘दलित’ कहना ठीक नहीं होगा। सरकार के इस आदेश से भाजपा और सहयोगी दलों के मंत्री नाराज हो गए हैं। उन सब का मानना है कि ‘दलित’ शब्द चलन से बाहर करना दलितों की पहचान मिटाने की सोची-समझी चाल है।

मोदी-सरकार में मंत्री और आरपीआई नेता रामदास अठावले ने सूचना प्रसारण मंत्रालय की एडवायजरी पर असहमति जताते हुए कहा कि जब दलित शब्द के उपयोग पर दलितों को ही कोई आपत्ति नहीं है, तो सरकार को क्यों है? अठावले का तर्क है कि ‘दलित’ शब्द के दायरे में केवल अनुसूचित जातियां ही नहीं हैं, वे जातियां भी हैं, जो सामाजिक और आॢथक रूप से पिछड़ी हुई हैं। भाजपा के सांसद उदित राज का भी मानना है कि ‘दलित’ एक ऐसा शब्द है जिससे समाज और राजनीति दोनों जुड़े हैं। दलित शब्द दलितों को उनकी स्थिति के बारे में याद दिलाता है। उन्हें लडऩे के लिए प्रेरित करता है।

ऐसे में यह सवाल उभरता है कि क्या इस एडवायजरी को लागू कराया जाना चाहि? खासकर तब, जब स्वयं दलित समाज इस एडवायजरी के खिलाफ हो और खुद सरकारें ‘दलितों’ को दलित कहकर रात-दिन रिझाने में लगी हों। ठीक है कि संविधान में दलित शब्द का प्रयोग नहीं है, लेकिन निर्जीव संज्ञा और जीवंत पहचान में जमीन-आसमान का फर्क होता है। जो पूरा घटनाक्रम चल रहा है, उसमें दिखता है कि दलित शब्द और दलित वोट मोदी-सरकार के गले की हड्डी बनता जा रहा है। मोदी, मोदी-सरकार और राज्यों में भाजपा की सरकारें जितना ज्यादा दलित प्रेम दिखा रही हैं, पांसे उतने ही उलटे पड़ते दिख रहे हैं। आज जब दलित खुद को दलित कहलाना पसंद करता है, दलित शब्द में उसका आत्मविश्वास झलकता है, तो फिर सरकार शब्दों की भूलभुलैया में क्यों भटकाना चाहती है?

यह सही है कि हिंदू धर्म की चातुर्वण्र्य-व्यवस्था में दलित जैसा शब्द पहले नहीं था। सबसे निचले पायदान पर वर्ण शूद्र था। दलित शब्द का संबोधन उन जातियों के लिए गढ़ा गया, जो अस्पृश्य या अछूत माने गए। मतलब वे जातियां जिनके जिम्मे समाज के ऐसे काम रहे हैं, जिन्हें बाकी जातियों ने नहीं करना चाहा। 13वीं सदी में संत ज्ञानेश्वर ने समाज के दबे-कुचले तबके के लिए ज्ञानेश्वरी में ‘दुरित’ शब्द का प्रयोग किया है। कह सकते हैं कि यही बदले रूप में ‘दलित’ हुआ। महात्मा ज्योतिबा फुले ने इनके लिए ‘अति शूद्र’ शब्द का इस्तेमाल किया है। आजाद भारत में बाबा भीमराव रामजी अंबेडकर ने इन जातियों के लिए ‘डिप्रेस्ड क्लासेस’ शब्द का प्रयोग किया।

महात्मा गांधी अछूत समझी जाने वाली जातियों को हरिजन कहा। लेकिन इस संबोधन को दलितों ने स्वीकार नहीं किया। दरअसल, सत्तर के दशक में महाराष्ट्र में हुए दलित पैंथर आंदोलन से दलित शब्द को जगह मिली, उसे दलितों ने आत्मसात कर लिया। दलित चिंतकों का मानना है कि दलित होना एक आंदोलनात्मक स्थिति है। जबकि ‘अनुसूचित जाति’ महज एक प्रशासनिक शब्द है। शब्दों के चक्के को खंगालें, तो पता चलेगा कि संविधान में आदिवासियों के लिए अनुसूचित जनजाति शब्द है। लेकिन आदिवासियों ने आदिवासी कहलाना ही पसंद किया। क्योंकि यह सब उनकी सांस्कृतिक, सामाजिक तथा ऐतिहासिक पहचान, आस्थाओं और परंपराओं को भी पूरी ताकत से प्रतिबिंबित करता है। इसी तरह दलित शब्द भी दलितों के लिए संघर्षशीलता और गरिमा का प्रतीक है। दरअसल, इस शब्द में सामाजिक दलन, शोषण और तिरस्कार का निचोड़ समाहित है। साथ ही इस थोपी गई अवस्था से स्थाई मुक्ति की चाहत भी दलित शब्द में है।

मोदी-सरकार की एडवायजरी से तो यही संदेश निकल रहा है कि सरकार उनकी पहचान को एक बेजान शब्द से मिटाने की कोशिश कर रही है। हो सकता है कि सरकार की ऐसी मंशा न हो, लेकिन दलितों को ऐसा क्यों लगने की छूट दी जा रही है कि सरकार का दलित प्रेम महज एक राजनीति स्वांग है।

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