पांच राज्यों से ईवीएम की ‘पवित्रता’ पर लगेगी ‘मुहर’

-अजय बोकिल

भाजपा जब तक मोदी के नेतृत्व में दिल्ली के तख्त पर काबिज नहीं हुई थी, उसे भी ईवीएम में खोट नजर आता था। उसने तो बाकायदा वोटिंग बैलेट पेपर से कराने की मुहिम छेड़ रखी थी। लेकिन जब से ईवीएम से ‘भगवा जनादेश’ निकलने लगा है, भाजपा को ईवीएम ‘देवता’ समान लगने लगी है।

मध्यप्रदेश सहित पांच राज्यों के अगले दो माह में होने वाले चुनाव सत्ता का सारथी तय करने के साथ-साथ इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) की विश्वसनीयता की अग्नि परीक्षा भी होंगे। अगर इन चुनाव नतीजों पर भी राजनीतिक दलों को संदेह हुआ, व्यापक गड़बड़ी की आशंका हुई, तो तय मानिए कि अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव में मतदान बैलेट पेपर से कराने का दबाव चुनाव आयोग और सरकार पर बढ़ जाएगा।

दो माह पूर्व शिवसेना सहित 17 राजनीतिक दलों ने आगामी लोकसभा चुनाव मतपत्रों के जरिए कराने की मांग की थी। इनमें ज्यादातर दल वे थे, जो अपने राजनीतिक वजूद को बचाए रखने के लिए चिंतित हैं और भाजपा की लगातार जीत से परेशान हैं। यह बात दूसरी है कि खुद भाजपा भी जब तक मोदी के नेतृत्व में दिल्ली के तख्त पर काबिज नहीं हुई थी, उसे भी ईवीएम में खोट नजर आता था। उसने तो बाकायदा वोटिंग बैलेट पेपर से कराने की मुहिम छेड़ रखी थी। लेकिन जब से ईवीएम से ‘भगवा जनादेश’ निकलने लगा है, भाजपा को ईवीएम ‘देवता’ समान लगने लगी है।

देश में ज्यादातर लोग यही मानते आ रहे थे कि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन में गड़बड़ी असंभव है। स्थानीय स्तर पर थोड़ा बहुत मैनेज होता भी होगा, लेकिन लाखों की संख्या में ईवीएम से मनमाफिक जनादेश निकलवा लेना नामुमकिन है। ईवीएम आने से न केवल चुनाव के दौरान होने वाला कागजों का भारी भरकम खर्च बचा, बल्कि नतीजों को लेकर लाखों लोगों के मन में कुलबुलाती उत्सुकता का शमन भी बहुत कम समय में होने लगा। ईवीएम की अक्षत विश्वसनीयता में लोगों का भरोसा तब डिगा, जब पिछले लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा कई राज्यों में चुनाव जीतती गई।

इसका क्लाइमेक्स पिछले बरस यूपी विधानसभा चुनाव में उसकी बंपर जीत के रूप में सामने आया। वहां विरोधी दलों का सफाया सा हो गया। भाजपा की इस जीत पर बसपा सुप्रीमो मायावती और सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सार्वजनिक रूप से सवाल उठाए। उन्हें शंका थी कि भाजपा की यह असाधारण जीत ईवीएम ‘मैनेज’ करने का नतीजा है। इसके बाद यूपी में स्थानीय निकाय चुनाव में तो जुमला ही चल गया कि ‘कोई भी बटन दबाओ, वोट भाजपा के खाते में।’ उधर भाजपा और चुनाव आयोग दोनों ने इस आंशका का पुरजोर खंडन किया। लेकिन इस बवाल के बाद चुनाव आयोग ने तय किया कि वह वोट की पावती देने वाली वीवीपैट मशीनों से ही मतदान कराएगा।

ईवीएम विवाद ठंडा होता, इसके पहले राख में दबी शंकाओं को हवा तब मिली, जब पिछले माह दिल्ली विवि के चुनाव में ईवीएम गड़बडिय़ों की बात सामने आई। बवाल बढ़ा तो पता चला कि विवि ने उसी कंपनी से ईवीएम खरीदी थी, जो चुनाव आयोग को भी सप्लाई करती है। ईवीएम गड़बड़ी से घंटों मतगणना रुकी रही। बाद में परिणाम एबीवीपी के पक्ष में घोषित किए गए, जिससे हारने वालों का शक और गहरा गया। ईवीएम में आस्था को बड़ा झटका खुद अमेरिका में लगा, जहां मिशिगन विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने साबित किया कि ईवीएम में छेड़छाड़ संभव है।

इस प्रोजेक्ट का नेतृत्व कर रहे प्रो. जे. एलेक्स ने बताया कि चिप की मदद से मोबाइल फोन से संदेश भेज कर ईवीएम का परिणाम बदला जा सकता है। यह काम वोटिंग और काउंटिंग दोनों के समय हो सकता है। अमेरिका की टॉप वोटिंग मशीन निर्माता कंपनी इलेक्शन सिस्टम एंड सॉफ्टवेयर ने माना कि उसके द्वारा बेची गईं कुछ मशीनों में रिमोट टूल इंस्टॉल किए गए थे। हालांकि इसका प्रमाण नहीं है कि इनमें से कुछ भारत भी आई थीं। इधर भारत में ‘आप’ विधायक ने दिल्ली विधानसभा में डेमो देकर सिद्ध करने की कोशिश की कि ईवीएम में गड़बड़ी की जा सकती है। इसी संदर्भ में मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने कहा कि आगामी लोकसभा चुनाव में पहले से ज्यादा सेंसिटिव मार्क थ्री ईवीएम का उपयोग किया जाएगा। कोई इसमें छेड़छाड़ की कोशिश भी करेगा, तो मशीन फैक्टरी मोड में चली जाएगी।

राज्यों के चुनावों में भाजपा फिर जीती तो विपक्षी दलों का ईवीएम पर से बचा खुचा विश्वास भी उठ जाएगा। बैलेट पेपर से चुनाव की मांग तेज होगी। इसका अर्थ यह नहीं है विपक्ष की ‘संतुष्टि’ के लिए भाजपा को हार जाना चाहिए। लेकिन ईवीएम के विकल्प के तौर पर सुझाए जा रहे बैलेट पेपर भी मैनिपुलेशन से मुक्त है, केवल खाम खयाली है। उल्टे कई सरकारों को इसमें ‘सुविधा’ भी हो सकती है। संभव है कि ‘बूथ लूटने’ या थोक में ठप्पे लगाने का युग लौट आए। ऐसा भी नहीं है कि ईवीएम से होने वाले चुनावों में सत्ता परिवर्तन नहीं होता। अगर सब ‘मैनेजेबल’ ही होता, तो भाजपा कुछ राज्यों अथवा उपचुनावों में हारती क्यों? फिर भी लोगों को लगता है कि कहीं कुछ तो गड़बड़ है।

दरअसल इस ‘शक’ के लिए भी भाजपा ज्यादा जिम्मेदार है, क्योंकि बीते चार सालों में उसने चुनाव को इवेंट की तरह ऑर्गनाइज और मैनेज करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। यह मैनेजमेंट बूथ, वोटर से लेकर मुद्दे गढऩे और अपने पक्ष में हवा बनवाने या वैसा दिखाने तक है। कोशिश रही है कि वोटर अपने घुटने का दर्द भूलकर पार्टी और सरकार के हो-हल्ले में भांगड़ा करने लगे। नेताओं के दौरे अब रोड शो में तब्दील हो गए हैं। पहले ऐसे काम माल बेचने के लिए ही किए जाते थे। लिहाजा वोटर के मानस से लेकर जब सब ‘मैनेज्ड’ है, तो ईवीएम का कौमार्य भी अक्षत रहेगा, इस बात पर भरोसा कठिन हो जाता है। पांच राज्यों के चुनाव नतीजे जनादेश की पवित्रता के साथ-साथ ईवीएम की ‘पवित्रता’ पर भी ‘मुहर’ लगाएंगे, यह तय है।

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