पितृ दोष क्या है? जानिए दुष्प्रभाव और उपचार

नई दिल्ली: वैदिक ग्रंथो के अनुसार पूर्वजो के द्वारा किये गए कर्मो का फल उनकी कई पीड़ियों को झेलना पड़ता है, आने वाली पीड़िया पूर्वजो द्वारा किये गए बुरे कर्मों का निवारण न करवा दे तब तक वह इस दोष से छुटकारा नहीं पा सकते हैं!

विद्वानों का मानना है की हमारे पूर्वजो का यदि पिंड दान और श्राद न किया जाए तो पूर्वज हमें काफी परेशानं करते है, जिसे पित्र दोष कहते है. जिस प्रकार पिता का लिया हुआ क़र्ज़ या पिता की कुरीति समाज में उनकी संतान को भोगनी पड़ती है, ठीक ऊसी तरह पिता अपने जीवन में बुरे कर्मों को कर के चला जाता है, तो उसकी आने वाली पीड़ियों को उसके कर्मो के फल भोगने पड़ते है, जिसे पित्र दोष कहते है.

पित्र दोष के दुष्प्रभाव :-

ज्योतिष में पितृदोष का बहुत महत्व बताया गया है. प्राचीन ज्योतिष ग्रंथों में पितृदोष सबसे बड़ा दोष है. इस दोष से पीड़ित व्यक्ति का जीवन अत्यंत कष्टमय हो जाता है. जिस व्यक्ति को यह दोष होता है उसे धन के अभाव से लेकर मानसिक क्लेश तक का सामना करना पड़ता है.

पितृदोष से पीड़ित जातक की उन्नति में सदेव बाधा रहती है. पितृदोष के कारण हमारे सांसारिक जीवन में और आध्यात्मिक साधना में कई तरह की बाधाएं उत्पन्न होती हैं. इस पर अनेक प्रकार के उपाय करने पर भी परिवार के सभी सदस्यों को कई प्रकार की समस्याओं का सामना करना ही पड़ता है.

पितृदोष के लक्षण :-

पितृदोष के कई लक्षण होते हैं. जैसे विवाह न हो पाना, वैवाहिक जीवन में अशांति, घर में कलेष आदि पितृदोष के कारण होते हैं.

पित्र दोष का निवारण कैसे करे ?

पितृ दोष का निवारण निम्न उपाय द्वारा खत्म किया जा सकता हैं. पितृपक्ष में तर्पण और श्राद्ध करना, देश के धर्म अनुसार कुल परंपरा का पालन करना और संतान उत्पन्न करके उन्हे धार्मिक संस्कार देना प्रतिदिन हनुमान चालीसा पढ़ना, तेरस, चौदस, अमावस्य और पूर्णिमा के दिन गुड़-घी की धूप देना, भृकुटी पर शुद्ध जल का तिलक लगाना, घर के वास्तु को ठीक करना और शरीर के सभी छिद्रों को अच्छी रीति से प्रतिदिन साफ-सुधरा रखने से भी यह ऋण चुकता होता है.

अपने जीवन में अच्छे कर्म करे, क्योकि आपके किये गए अच्छे कर्मो से ही आपके पूर्वजों के किये गए कर्मो की काट होगी,एवं उनकी आत्मा को शांति प्राप्त होगी. आपकी संतान भी आपके कर्मो से प्रेरित होकर अच्छी जीवन शैली को अपनाते हुसे आपके मार्गदर्शन पर चलेगी.

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