पूरा भारत जीतिए साहेब लेकिन हम पर रहम कीजिये

नई दिल्ली: वैसे तो इस साल होने वाले 8 चुनावी राज्य बीजेपी के निशाने पर है। और अभी तक तो यही देखा गया है कि बीजेपी का निशाना खाली नहीं जाता। संभावना इस बात की भी बढ़ रही है कि लोक सभा चुनाव भी इस साल हो जाय। जिस तरह से एक साथ चुनाव कराने के लिए चुनाव आयोग पर सरकार दबाब दाल रही है और निति आयोग से चर्चा कर रही है उससे लगता है कि देश इस साल केवल चुनाव ही लड़ेगा। जनता भौचक है और निराश भी। अच्छे दिन की आस आज भी लगी है पता नहीं कब क्या मिल जाए। सच यही है कि मिलना कुछ भी नहीं है। चुनाव के दौरान कुछ बेरोजगारी भत्ता पर नजर रखिये और बीजेपी की जीत का आनंद मनाये। यही है अच्छे दिन। उधर दूसरी खबर यह है कि अकेले कर्नाटक में पिछले 5 साल में 3515 किसान आत्महत्या कर चुके हैं।

इतनी ज्यादा संख्या में किसानों की आत्महत्या पर प्रधानमंत्री विचलित हुए हों, ऐसी कोई खबर नहीं है। लेकिन कहानी देखिये कि पीएम बनने से पहले मोदीसाहब सबसे ज्यादा किसानो की ही बात करते फिरते थे। मोदी जी बोलने से तो बाज आते नहीं। किसानो की कहानी बताते गए और 42 फीसदी किसानो की आत्महत्या की दर बढ़ गयी अब तक। गजब का नजारा। दूसरी तरफ पिछले साल भर तक पूरे देश में किसान आंदोलन चलते रहे ,किसान मरते रहे ,किसान नेता जेल जाते रहे मोदी जी भाषण देते रहे लेकिन किसानो की कोई मांग मानी नहीं गयी। नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने से पहले किसानों से वादा किया था कि यदि वे सत्ता में आएंगे तो किसानों को कृषि में लागत से 50 प्रतिशत अधिक का मुनाफा देंगे, स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश लागू करेंगे, किसानों की आय दोगुनी करेंगे।

लेकिन अब मौन साधे हुए हैं।अब किसानो के बारे में कुछ नहीं बोलते। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने बार बार दोहराया कि केंद्र किसानों का कर्ज माफ नहीं कर सकता। राज्य अगर ऐसा करते हैं तो इसका खर्च वे खुद उठाएंगे। केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में भी हलफनामा लगाया कि किसानों की कर्जमाफी संभव नहीं है। नतीजा यह है कि देश भर में किसान ताबड़तोड़ आत्महत्या कर रहे हैं। आगे भी करते रहेंगे। कल ही मध्य प्रदेश ने एक और किसान ने अपनी जान गवां दी।

अब ज़रा किसानो की आत्महत्या पर एक नजर दाल लें। कर्नाटक में पिछले पांच सालों में 3515 किसान आत्महत्या कर चुके हैं। कर्नाटक के कृषि विभाग के मुताबिक अप्रैल 2013 से लेकर नवंबर 2017 के बीच 3515 किसानों ने सूखे और फसल बर्बाद होने की वजह से आत्महत्या की है। राज्य के कृषि निदेशक बीवाई श्रीनिवास का कहना है कि 2015-16 में आत्महत्या के सबसे ज्यादा मामले सामने आए। अभी यहां पर सत्ता में कांग्रेस की सरकार है लेकिन उसने कितने कदम उठाये इस पर चर्चा करना व्यर्थ है। कांग्रेस की कहानी के क्या कहने !

कर्नाटक से सटे तेलंगाना की कहानी तो और भी दर्द से भरा है। तेलंगाना राज्य बनने के बाद से अब तक वहां पर 3,000 से ज़्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं। एक अन्य रिपोर्ट के मुताविक राज्य बनने के बाद से तेलंगाना में अब तक 3,026 किसानों ने आत्महत्या कर ली है। एक एनजीओ के हवाले से इस रिपोर्ट में कहा गया है कि 2014 में 792, 2015 में 1147 और 2016 में 784 किसानों ने आत्महत्या की। पिछले साल भी करीब 400 किसानो ने आत्महत्या की है।

छत्तीसगढ़ के विधानसभा के शीतकालीन सत्र में सरकार ने बताया कि छत्तीसगढ़ में मौजूदा वित्तीय वर्ष के आठ माह में 61 किसानों ने आत्महत्या की है। इसके अलावा पिछले ढाई सालों में राज्य में 1344 किसानों ने आत्महत्या कर ली। इसी तरह महाराष्ट्र में पिछले 17 साल में 26,339 किसानों ने जान दी है। महाराष्ट्र सरकार ने छह महीने पहले किसानों की क़र्ज़ माफ़ी की घोषणा की थी, लेकिन क़र्ज़ माफ़ी का कर्मकांड भी किसानों के लिए नाकाफी साबित हुआ है। क़र्ज़ माफ़ी के बाद छह महीने में 1497 किसानों ने आत्महत्या कर ली है।

मध्य प्रदेश में 13 साल में 15,129 ने की खुदकुशी की है। यहां सालों से बीजेपी की सरकार है। उत्तर प्रदेश में किसानो की आत्महत्या की घटना कम होती थी लेकिन वहाँ भी अब यह रोग हो गया है। कनौज ,लखीमपुर में आत्महत्या की कई घटनाएं घटी है। उधर ओडिशा ,पंजाब से भी आत्महत्या की घटनाएं सामने आती जा रही है। आधा पंजाब तो खेती के नाम पर कैंसर ग्रस्त हो चुका है। वह एक अलग कहानी है। सरकार अब भी नहीं चेतेगी तो पंजाब समाप्त हो जाएगा।

ऐसे में सवाल अब यह है कि पीएम बनने से पहले मोदी जी रोजगार ,किसान अच्छे दिन की वकालत करते थे। उम्मीदे जगी और लोगों ने उन पर ऐतवार कर सत्ता सौप दिया। अब तो रोजगार और किसान की बात ही नहीं करते मोदी साहब। अच्छे दिन आये या नहीं शायद ही किसी को मालुम हो लेकिन अब प्रधानमंत्री न्यू इंडिया की बात करते हैं। क्या यही न्यू इंडिया है जहां देश के प्रधानमंत्री एक के बाद एक चुनाव लड़ेंगे और किसान हज़ारों की संख्या में आत्महत्या करते रहेंगे? अभी तक तो किसान ही मर रहे हैं। अब बेरोजगारों की भी बारी है।

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